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पश्चिम बंगाल: सालिसी सभाओं पर नहीं लग पा रही लगाम

सूबे के ग्रामीण इलाकों में स्थानीय पंचायतों की बढ़ती सक्रियता पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। स्थानीय भाषा में इनको सालिसी सभा भी कहा जाता है। इनमें किसी भी स्थानीय विवाद की स्थिति में फौरन फैसला सुनाया जाता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।

अक्तूबर के पहले सप्ताह में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक पंचायत के आदेश पर एक युवक को जिंदा जला दिया गया। कसूर-उसका अपने चाचा के साथ जमीन का विवाद चल रहा था। इसी महीने के दूसरे सप्ताह में बीरभूम जिले में 75 साल के एक वृद्ध की दसों अंगुलियां काट दी गईं। ऐसा करने वालों में उसका पुत्र भी शामिल था। वजह-गांव वालों ने उस पर जादू-टोना करने का आरोप लगाया था। इससे पहले ऐसी ही एक पंचायत के दौरान मोबाइल चोरी के आरोप में अपमानित होने वाली एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली थी। तीन साल पहले बीरभूम जिले में ऐसी ही एक अदालत ने बदचलनी के आरोप में एक महिला के साथ गांव वालों के सामने सरेआम सामूहिक बलात्कार की सजा सुनाई थी। उस घटना ने देश-विदेश में काफी सुर्खियां बटोरी थीं। ऐसा कोई महीना नहीं बीतता जब राज्य के किसी कोने से ऐसी पंचायतों और उनके अजीबोगरीब फैसलों की खबरें सामने नहीं आती हों।

सूबे के ग्रामीण इलाकों में स्थानीय पंचायतों की बढ़ती सक्रियता पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। स्थानीय भाषा में इनको सालिसी सभा भी कहा जाता है। इनमें किसी भी स्थानीय विवाद की स्थिति में फौरन फैसला सुनाया जाता है। इन पंचायतों के फैसले असंवैधानिक और गैर-कानूनी होते हैं। राज्य में वाममोर्चा सरकार के जमाने से ही ऐसी पंचायतें होती रही हैं। सात साल पहले सरकार बदलने के बावजूद जमीनी हकीकत में खास बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक दल भले ही इंकार करें, ऐसी तमाम पंचायतों को स्थानीय राजनेताओं का संरक्षण हासिल होता है। यही वजह है कि इनके गैर-कानूनी फैसलों के बावजूद कभी किसी को कोई कड़ी सजा नहीं मिल पाती। राज्य में अक्सर ऐसी पंचायतों के अजीबोगरीब फैसले की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे कई मामलों में कथित अभियुक्तों की हत्या तक कर दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में होने वाली इन पंचायतों का राजनीति से गहरा संबंध है। इनको संरक्षण देकर स्थानीय नेता गांव के लोगों पर अपनी पकड़ बनाए रखने का प्रयास करते हैं। यही वजह है कि वर्ष 2004 में तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने इन सालिसी सभाओं को वेस्ट बंगाल ब्लाक लेवल प्री-लिटीगेशन कौंसिलेशन बोर्ड बिल यानी सालिसी विधेयक के जरिए कानून जामा पहनाने का प्रयास किया था।

इसके तहत इलाके के छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए राज्य के हर ब्लाक में कौंसिलेशन बोर्डों का गठन किया जाना था। लेकिन विपक्षी कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के जबरदस्त विरोध के कारण सरकार उक्त विधेयक विधानसभा में पेश नहीं कर सकी थी। लेकिन उसके बाद भी इन सभाओं पर रोक नहीं लगाई जा सकी थी। अमूमन इन सभाओं को राजनेताओं का संरक्षण हासिल होने से पुलिस व प्रशासन इनमें कोई दखल देने से बचते हैं। कोई बड़ी घटना होने के बाद दो-चार लोगों को गिरफ्तार कर मामले की लीपापोती के प्रयास शुरू कर दिए जाते हैं। इन पंचायतों में अमूमन जज, वकील और सजा देने वाला व्यक्ति एक ही होता है। वह गांव का मुखिया भी हो सकता है और इलाके का कोई असरदार नेता भी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इलाके के राजनेता ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं पर पकड़ बनाने के लिए कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से इन पंचायतों का समर्थन करते हैं। पहले वाममोर्चा के लोग ऐसा करते थे और अब तृणमूल कांग्रेस के नेता भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कोर्ट-कचहरी के चक्कर में उलझने की बजाय लोग आपसी विवादों को सुलझाने के लिए इन अदालतों को तरजीह देते हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजनीति के घालमेल में उलझी इन पंचायतों पर फिलहाल अंकुश लगने के आसार कम ही हैं।

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