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तीसरी लड़की के डर से 3 तलाक बोलकर पति ने दिया गर्भवति पत्नी को तलाक, महिला ने लिखा योगी और मोदी को पत्र

उत्तर प्रदेश में एक गर्भवती महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि उसके पति ने तीन तलाक बोलकर उसे तलाक दे दिया है।

पहली पत्नी से तकरार होने पर वह उसके अश्लील वीडियो वायरल करने का डर बनाकर उसके परिजनों से धन उगाही करता रहा।

उत्तर प्रदेश में एक गर्भवती महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि उसके पति ने तीन तलाक बोलकर उसे तलाक दे दिया है। पुलिस ने गुरुवार को बताया कि महिला ने पत्र में लिखा है कि उसके पति ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे डर है कि उसके गर्भ में लड़की है। सहारनपुर के पुलिस प्रमुख लव कुमार ने आईएएनएस को बताया कि बुधाखेडा गांव की शगुफ्ता नाम की महिला ने अपने पति शमशाद और ससुराल वालों के खिलाफ मंगलवार को मामला दर्ज कराया है। शुगुफ्ता की शमशाद से पांच साल पहले शादी हुई थी और इस जोड़े की 4 साल और 18 महीने की दो बेटियां हैं। कुमार ने कहा, शुगुफ्ता ने मोदी और योगी से अपने बेटियों और आने वाले शिशु को बचाने की गुजारिश की है। उन्होंने कहा, “महिला के पति ने उससे बेटी पैदा होने के डर से गर्भपात करवाने को कहा और ऐसा नहीं करने पर तीन बार तलाक कहकर तलाक देते हुए घर से बाहर निकाल दिया।”

मुस्लिम समुदाय में जारी तीन तलाक की प्रथा को फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है और मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होने वाली है। अधिकारी ने कहा कि शगुफ्ता ने अपने तीन देवरों नौशाद, जाफर अली और इलियास पर भी उस पर तीन महीने के भ्रूण को गिराने का दबाव डालने का मामला दर्ज कराया है। उसने ससुरालवालों पर मारपीट करने और प्रताड़ित करने का भी आरोप लगाया है। अधिकारी ने कहा कि एक महिला की सहमति के बिना गर्भपात करने और महिला के साथ क्रूरता की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है और पुलिस महिला की चिकित्सा परीक्षा रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा, “हमने मामले की जांच के लिए विशेष दल का गठन किया है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि गर्मिर्यों की छुट्टियों में एक संविधान पीठ मामले में सुनवाई करेगी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने 27 मार्च को उच्चतम न्यायालय से कहा था कि मुस्लिमों के बीच प्रचलित इन परंपराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं विचारणीय नहीं हैं क्योंकि ये मुद्दे न्यायपालिका के दायरे के बाहर के हैं।

बोर्ड ने यह भी कहा था कि पवित्र कुरान और इस पर आधारित स्रोतों पर मूल रूप से स्थापित मुस्लिम विधि की वैधता संविधान के कुछ खास प्रावधानों पर जांचे नहीं जा सकते। इससे पहले शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह मुस्लिमों में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह की परंपराओं के ‘‘कानूनी’’ पहलुओं से जुड़े मुद्दों पर फैसला सुनाएगी और इस सवाल पर विचार नहीं करेगी कि मुस्लिम विधि के तहत तलाक की अदालतों द्वारा निगरानी की जरूरत है या नहीं क्योंकि यह विधायी क्षेत्राधिकार में आता है।

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