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अदालतों में मुकदमों के ढेर, न्याय में हो रही देरी

विशेषज्ञों का कहना है कि मुकदमों के समय पर निपटारे के लिए कई कदम उठाने जरूरी हैं। इन्हें अमल में लाए जाने पर ही लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सकती है। जल्द न्याय के लिए सरकार को समुचित संख्या में अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए।

Author March 7, 2018 4:24 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

देश भर की अदालतों में ढाई करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित चलने से फरियादी को न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती है कि उसकी चप्पलें ही घिस जाती हैं। ऐसी ही हालात राजस्थान में भी है। प्रदेश की अदालतों में 14 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित चल रहे हैं। इनमें से दस फीसद मुकदमे तो वरिष्ठ नागरिक और महिलाओं की तरफ से दायर किए गए हैं। इन मुकदमों के हालात देखें तो दस फीसद मामले तो दस साल से ज्यादा समय से लंबित चल रहे हैं। देश भर की अदालतों में तो दो करोड़ 64 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं।
मुकदमे लंबे चलने के पीछे सबसे बडा कारण अदालतों और संसाधनों की कमी को माना जाता है। इसकी पीड़ा पक्षकारों को उठानी पड़ रही है। इस पीड़ा को कम करने के लिए ही लोक अदालतों का भी सहारा लिया जा रहा है। इसके बावजूद लोगों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि न्याय व्यवस्था में अपराधी को भी सुनवाई का पूरा मौका दिया जाता है। भारतीय न्याय प्रणाली में सुनवाई में सभी पक्षों को अपनी बात रखने के लिए पूरा मौका दिया जाता है। इसके कारण भी मुकदमों के निपटारे में बहुत समय लग जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मुकदमों के समय पर निपटारे के लिए कई कदम उठाने जरूरी हैं। इन्हें अमल में लाए जाने पर ही लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सकती है। जल्द न्याय के लिए सरकार को समुचित संख्या में अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए। इसके साथ ही न्यायाधीशों की कमी को दूर करना और मुकदमों की प्राथमिकता तय करते हुए उनकी सुनवाई की जाए। किसी मामले की एक बार सुनवाई होने के बाद उस केस को दूसरी अदालत में नहीं सौंपा जाए। इस तरह के कदम उठाने से ही जल्द न्याय होने की उम्मीद की जा सकती है। राजस्थान हाईकोर्ट में अधिवक्ता वरुण पुरोहित का कहना है कि राज्य सरकार ने पिछले कु छ वर्षों में विशेष न्यायालयों की स्थापना की है। मुकदमों की प्राथमिकता तय नहीं होने से इन अदालतों में भी मुकदमों की संख्या खूब बढ़ गई है। इसके कारण इन अदालतों में लंबित सभी मामलों को एक समान तरीके से सुनवाई में लगाया जाता है। विशेष कोर्ट में सिर्फ जल्द ट्रायल वाले मामले आने चाहिए पर न्यायाधीशों की कमी के कारण दूसरी अदालतों के मामले भी इनमें ट्रांसफर कर दिए जाते हैं।

अधिवक्ता एके जैन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के मामलों का निपटारा छह महीने में करने को कहा है। ऐसे मामलों में भी कई वर्ष तक सुनवाई चलती रहने से फैसला देरी से हो पाता है। इसमें पुलिस की जांच में उदासीनता और गवाहों से होने वाली जिरह के कारण भी निपटारे में देरी होती है। इस वर्ष फरवरी के मध्य तक राजस्थान में 14 लाख 41 हजार 169 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित है। इनमें से करीब एक लाख मुकदमों की तो दस साल से ज्यादा लंबे अरसे से सुनवाई चल रही है। जयपुर मेट्रो में तो 2 लाख 53 हजार 48 मामले लंबित है। जयपुर में 13 मई 2008 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का मामला विशेष अदालत में अभी तक चल रहा है। इस घटना में जयपुर शहर में 70 लोगों की मौत हुई थी और 186 लोग घायल हुए थे। इस प्रकरण में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। इस मामले का एक फरार आरोपी हाल में दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में आया है।

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