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Madhya Pradesh Political Crisis: 53 साल पहले दादी विजयाराजे सिंधिया ने तोड़ी थी कांग्रेस, अब ज्योतिरादित्य ने भी इतिहास दोहराया

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और माधवराव सिंधिया की मां विजयाराजे सिंधिया में गहरी दोस्ती थी। लेकिन बाद में दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया।

ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया। (फाइल फोटो/एक्सप्रेस आर्काइव)

Madhya Pradesh Political Crisis: मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे ने राज्य की राजनीति में 53 साल पुरानी कहानी को दोहरा दिया है। 1967 में ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ दी। उस साल दोनों चुनाव एक साथ होने थे।

चुनाव के बाद कांग्रेस के 36 विधायक कांग्रेस छोड़ दी। विधायकों के इस कदम के बाद तत्कालीन सीएम रहे डीपी मिश्रा की सरकार गिर गई थी। इसके बाद गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। दरअसल उस समय ग्वालियर में हुए छात्र आंदोलन को लेकर विजयाराजे और तत्तकालीन सीएम रहे डीपी मिश्रा से अनबन हो गई थी।

इससे पहले उस दौरान विजयाराजे सिंधिया और इंदिरा गांधी में अनबन की खबरें थीं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और माधवराव सिंधिया की मां विजयाराजे सिंधिया में गहरी दोस्ती थी। लेकिन बाद में दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया। राजमाता 1957 से 1991 तक आठ बार ग्वालियर और गुना से सांसद रहीं। 1957 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर ही संसद पहुंची थीं। तत्कालीन सीएम से अनबन के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी को चुनौती देते हुए कांग्रेस छोड़ दी।

हालांकि, ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के साथ जाना ताय किया। माधवराव सिंधिया राजीव गांधी सरकार के बाद नरसिम्हा राव सरकार में भी मंत्री रहे। ज्योतिरादित्या सिंधिया तीसरी पीढ़ी के रूप में कांग्रेस से जुड़े थे। लेकिन 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में अपनी अनदेखी के कारण वह पार्टी से नाराज चल रहे थे।

इसके बाद लोकसभा चुनाव में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी में खुद को तव्वज्जो ना मिलने से वह उपेक्षित महसूस कर रहे थे। हालांकि, कांग्रेस छोड़ने पर ज्योतिरादित्य ने कहा कि वह लोगों की सेवा करना चाहते हैं। कांग्रेस के साथ रहकर वह लोगों की सेवा नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए वह पार्टी छोड़ रहे हैं। कांग्रेस से उनके इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस के 22 विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। ऐसे में कमलनाथ सरकार का जाना लगभग तय लग रहा है। इस तरह 1967 की कहानी एक बार फिर से खुद को दोहराती नजर आ रही है।

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