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साल भर में लगे 513 जैविक शौचालय, दो हफ्ते में लगेंगे 3487

एक तरफ जहां रेलवे 2020 तक सभी रेल कोचों में लगे शौचालयों को जैविक शौचालय में तब्दील करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ शताब्दी जैसी सुपरफास्ट और बेहतरीन सुविधाएं देने वाली ट्रेनों में अब तक जैविक शौचालय नहीं लगाए जा सके हैं।

Author नई दिल्ली | March 14, 2018 1:02 AM

सुमन केशव सिंह
एक तरफ जहां रेलवे 2020 तक सभी रेल कोचों में लगे शौचालयों को जैविक शौचालय में तब्दील करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ शताब्दी जैसी सुपरफास्ट और बेहतरीन सुविधाएं देने वाली ट्रेनों में अब तक जैविक शौचालय नहीं लगाए जा सके हैं। रेलवे के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान उत्तरी रेलवे जोन के अंतर्गत 4000 जैविक शौचालय लगाने का लक्ष्य रखा गया था। इस जोन में काशी से लेकर कश्मीर तक के क्षेत्र आते हैं। दिल्ली, फिरोजपुर, लखनऊ, अंबाला और मुरादाबाद डिविजन भी इसी जोन में हैं।
इतने बड़े जोन में चार हजार जैविक शौचालय लगाने के लक्ष्य का पीछा करते हुए जनवरी तक केवल 513 जैविक शौचालय लगाए जा सके हैं। वित्त वर्ष खत्म होने में करीब दो हफ्ते बचे हैं और रेलवे अपने लक्ष्य से 3487 पीछे है। रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, एक जैविक शौचालय लगाने में करीब छह घंटे का बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
समय लगता है। इसके लिए बोगियों को एक निश्चित किलोमीटर तक चलाने के बाद रेल डिपो में साफ-सफाई के लिए ले जाया जाता है। इसी दौरान जैविक शौचालय लगाने का काम किया जाता है। यानी कुल मिलाकर उत्तरी जोन के लिए यह कहा जा सकता है कि जैविक शौचालय लगाने की दिशा में वित्त वर्ष 2017-18 में महज 13 फीसद काम हुआ है। जबकि वित्तीय वर्ष के खत्म होने में अब दो हफ्ते का वक्त बचा है।

लक्ष्य नहीं हुआ पूरा
रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 2015 का लक्ष्य था कि 17000 कोचों में और नए बनाए जा रहे कोचों में जैविक शौचालय लगाए जाने थे। पहले चरण में सुपरफास्ट और लग्जरी ट्रेनों में जैविक शौचालय लगाने की योजना थी। पर शताब्दी जैसी ट्रेनों में भी अब तक जैविक शौचालय नहीं लग सके हैं।

जैविक शौचालय की परिकल्पना क्यों
परंपरागत शौचालयों में मानव मल पटरियों पर गिरता है। गंदगी और लगातार पानी बहने के कारण पटरियां जल्दी खराब हो जाती हैं। प्रदूषण और पटरियों के क्षरण की समस्या में सुधार के लिए इसे स्वच्छता अभियान से जोड़कर जैविक शौचालय लगाने की परिकल्पना की गई।

क्या होता है जैविक शौचालय
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों का एक दल अंटार्कटिका गया था। उन्होंने पाया कि साइक्रोफिलिक नाम का बैक्टीरिया मानव मल को बहुत तेजी से रासायनिक अवयवों में तोड़ कर तरल, गैस और ठोस अवयवों जैसे – पानी, कार्बन डाइ आॅक्साइड और मिथेन में बदल देता है। जिस टैंक में मानव मल गिरता है उसमें ये खास बैक्टीरिया डाल दिए जाते हैं और वे अपना काम करते रहते हैं। रोचक बात यह है कि शून्य से नीचे के तापमान पर अलग हुआ तरल गंधहीन पानी होता है। इससे बनी बायोगैस में 50 से 70 फीसद मिथेन होती है। इस प्रक्रिया से निकले पानी का शोधन क्लोरीन टैंक में किया जा सकता है, जबकि शौचालय के अंदर बनी गैस हवा में घुल जाती है।

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