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दिल्ली मेरी दिल्ली: भारी पड़ी बदसलूकी

आप’ ने भाजपा पर अच्छा-खासा दबाव बना दिया था, लेकिन ठीक उसी वक्त ‘आप’ के विधायक सोमनाथ भारती का एक वीडियो वायरल हो गया जिसमें वे एक निजी खबरिया चैनल की एंकर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए सुने जा सकते थे। इस वीडियो ने भाजपा के हाथों में सियासी लड़ाई का नया हथियार पकड़ा दिया।

Author November 26, 2018 7:45 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर पिछले दिनों दिल्ली सचिवालय में मिर्च पाउडर फेंके जाने को लेकर भारी सियासी हंगामा हुआ। आम आदमी पार्टी (आप) ने इसे मुख्यमंत्री की सुरक्षा में चूक का गंभीर मुद्दा बताते हुए पहले दिल्ली पुलिस पर निशाना साधा और बाद में आरोप लगाया कि भाजपा मुख्यमंत्री की हत्या कराना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने मुख्यमंत्री पर मिर्च पाउडर फेंके जाने की निंदा की और ‘आप’ के आरोपों को गलत बताया। इस मुद्दे को लेकर ‘आप’ ने भाजपा पर अच्छा-खासा दबाव बना दिया था, लेकिन ठीक उसी वक्त ‘आप’ के विधायक सोमनाथ भारती का एक वीडियो वायरल हो गया जिसमें वे एक निजी खबरिया चैनल की एंकर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए सुने जा सकते थे। इस वीडियो ने भाजपा के हाथों में सियासी लड़ाई का नया हथियार पकड़ा दिया। पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर ‘आप’ पर हल्ला बोल दिया और उसे महिला व मीडिया विरोधी करार दे दिया। वहीं मिर्च पाउडर मामले को लेकर भाजपा पर सियासी हमला बोलने में जुटे ‘आप’ के नेता भारती का वीडियो वायरल होने के बाद बचाव की मुद्रा में आ गए। इन दोनों घटनाओं का लब्बोलुआब यह रहा कि भारती की बदसलूकी सियासी तौर पर मिर्च पाउडर से ज्यादा भारी पड़ी।

वोटों की तिकड़मबाजी
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने एक मकान की सील तोड़कर आफत मोल ली थी। आरोप लगाया गया कि ऐसा उन्होंने राजनीतिक दलों में मची होड़ के तहत किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए तिवारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। मनोज तिवारी के लिए राहत की बात रही कि अदालत ने इसे सीधे अवमानना का मामला नहीं माना। तिवारी के समर्थक इस बात से खुश थे कि अदालत ने उन्हें सजा नहीं दी, लेकिन विरोधियों को इसकी खुशी थी कि अदालत ने उनको खूब खरी-खरी सुनाई। लेकिन इन सबके बीच यह सवाल भी कायम है कि आखिर दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर सीलिंग अभियान चलाने की जरूरत क्यों पड़ी। पूरी दिल्ली में कानून तोड़कर बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण किए गए हैं। दिल्ली की सड़कों पर ही नहीं, फुटपाथ तक पर रेहड़ी-पटरी से लेकर अवैध पार्किंग वालों का कब्जा है। जो रिहायशी इलाके बच गए हैं वहां व्यावसायिक गतिविधियां चलती हैं। अवैध निर्माण रोकने का जो काम सरकारों को करना चाहिए, वह अदालत कर रही है और वोट बैंक की राजनीति करने वाले दल अवैध कब्जे को बनाए रखने के लिए हर तरह की तिकड़म बिठाने में जुटे हैं।

पूरी हुई तलाश
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सरकारी निवास पर हुई हाथापाई का शिकार बने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के उत्तराधिकारी की तलाश आखिरकार पूरी हो गई है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विजय देव मुख्य सचिव बना दिए गए। देव की छवि भी एमएम कुट्टी और अंशु प्रकाश जैसे नियम-कानून का सख्ती से पालन करवाने वाले अधिकारी की रही है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि दिल्ली की मौजूदा सरकार के साथ विजय देव का रिश्ता कैसा रहता है, लेकिन यह तो तय है कि वे ज्यादा समझौता नहीं कर पाएंगे। अब तक तो यही होता रहा है कि चाहे केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (आप) की पसंद के मुख्य सचिव हों या सीधे केंद्र के, सरकार के साथ उनका हनीमून ज्यादा लंबा चल नहीं पाता है। देव के सामने तो एक समस्या यह भी होगी कि उनसे वरिष्ठ अधिकारी उनके अधीन कैसे काम करेंगे।

किसकी जान कीमती
दिल्ली सरकार ने सोमवार को विधानसभा की एक दिन की विशेष बैठक बुलाई है। बैठक का मुख्य मुद्दा है मुख्यमंत्री केजरीवाल पर हुए हालिया हमले के मामले में दिल्ली पुलिस के रुख पर चर्चा। ऐसे वक्त में जब दिल्लीवासी हर दिन प्रदूषण का जहर पीने को मजबूर हैं तो यह सवाल उठना लाजमी है कि लोगों की जान ज्यादा कीमती है या मुख्यमंत्री पर होने वाला हमला? प्रदूषण जैसे जानलेवा मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र क्यों नहीं बुलाया? दिल्ली की जनता ने विधायकों को अपने मुखिया की चिंता में विचार-विमर्श करने के लिए चुना था या लोगों के बेहतर जीवन के लिए? मुख्यमंत्री केजरीवाल हरियाणा में दिए गए अपने भाषण में कहते हैं कि बीते दो साल में उन पर चार बार हमला किया गया है, यह कोई छोटी बात नहीं है। इस पर यह सवाल उठना भी लाजमी है कि मुख्यमंत्री को साल-दर-साल प्रदूषण की चपेट में आ रही जनता की परेशानी शायद छोटी बात लगती है, तभी उस पर विशेष सत्र की जरूरत नहीं महसूस नहीं हुई।

कुलपति की नाराजगी
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के 95वें दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति ने पिछले एक साल की उपलब्धियां गिनार्इं। इस दौरान उन्होंने अपने दिल के सबसे करीब दिल्ली स्कूल आॅफ जर्नलिज्म यानी डीएसजे के बारे में कुछ पंक्तियां ही कहीं। बेदिल को दीक्षांत में पहुंचे एक शिक्षक ने बताया कि कुलपति इन दिनों डीएसजे से नाराज चल रहे हैं क्योंकि यहां पढ़ने वाले छात्र आए दिन प्रदर्शन और भूख हड़ताल करने लगते हैं। यह भी कोई बात हुई कि मीडिया लैब, पुस्तकालय और कैंटीन जैसी छोटी-मोटी सुविधाओं को लेकर आए दिन प्रदर्शन किया जाए। मांग बड़ी हो तो बल्कि एक बार सोचा भी जा सकता है।

श्रेय लेने की होड़
काम किसी का और नाम किसी का, यह कहावत बीते दिनों 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में आए फैसले पर सटीक बैठती नजर आई। सनद रहे कि दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में एक दोषी को फांसी और दूसरे को उम्रकैद की सजा सुनाई है। दोषियों को सजा दिलाने का श्रेय एसआइटी को जाता है। इन सबके बीच दिल्ली में लगे पोस्टरों ने साफ कर दिया कि लोग दंगे व आगजनी में भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक लेते हैं। शहर की सड़कों पर लगे खंभों पर चस्पा पोस्टरों में कोई सिख समुदाय को तो कोई सरकार को बधाई दे रहा है। बधाई देने वालों ने पोस्टरों से पूरी दिल्ली को पाट दिया है। आइटीओ पर लगे ऐसे ही एक पोस्टर पर जब लोगों की नजर पड़ी तो भरी बस में ‘काम किसी का और नाम किसी का’ वाली चर्चा शुरू हो गई। इस बीच किसी ने ठीक ही कहा कि न तो इस मामले के गवाहों को कोई जानता है और न दिन-रात एक करके लड़ रहे एसआइटी के अधिकारियों को, बाकी पकी-पकाई रोटी खाने सब चले आते हैं।
-बेदिल

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