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2014 के बाद बीजेपी के लिए 2017 सबसे अच्‍छा, 2018 में घट गया वोट शेयर

गुजरात में एंटी इनकंबेंसी के बाद भी पार्टी किसी तरह सरकार बनाने में कामयाब रही। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले यहां पार्टी को कुछ सीटों का नुकसान जरुर हुआ। लोकसभा चुनाव के चार साल बाद भी भाजपा भारतीय राजनीति में कामयाब पार्टी के रूप में नजर आने लगी थी।

नए लुक में पीएम नरेंद्र मोदी। (Instagram@narendramod)

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए 2017 का साल शायद सबसे अच्छा रहा। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने भारी अंतर से राज्य में सरकार बनाई। राज्य में कांग्रेस और सपा गठबंधन भी भाजपा के आगे नहीं टिक पाया। यूपी में भाजपा की जीत का इतना व्यापक असर हुआ कि पूर्व में एनडीए गठबंधन को छोड़ महागठबंधन में शामिल होने वाले नीतीश कुमार एक बार फिर भाजपा के खेमे में आ गए। उन्होंने भाजपा के सहयोग से बिहार में सरकार बनाई और एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। गुजरात में एंटी इनकंबेंसी के बाद भी पार्टी किसी तरह सरकार बनाने में कामयाब रही। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले यहां पार्टी को कुछ सीटों का नुकसान जरुर हुआ। लोकसभा चुनाव के चार साल बाद भी भाजपा भारतीय राजनीति में कामयाब पार्टी के रूप में नजर आने लगी थी।

हालांकि 2018 में स्थिति बिल्कुल बदलती हुई मालूम हुई। पार्टी पांच बड़े राज्यों में से एक भी राज्य में भाजपा सरकार नहीं बना सकी। इसमें कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्य शामिल हैं। पांचों राज्यों में चुनाव इसी साल हुए। हिंदी हार्टलैंड वाले तीन राज्यों में तो भाजपा की ही सरकार थी। इसके अलावा तेलंगाना को छोड़ दें तो बाकी के सभी राज्यों में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ी तादाद में सीटें जीतीं। हिंदी बेल्ट के राज्यों में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड सीटें जीतीं। तब इन राज्यों में कांग्रेस की बुरी गत हुई। तीन राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में कांग्रेस महज 3 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

हालांकि अभी भी लोगों के समर्थन के मामले में भाजपा को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर महत्वपूर्ण बढ़त है। हिंदी हार्टलैंड में हाल के विधानसभा चुनावों में इसके कुछ नुकसानों की भरपाई संभवत: देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में होने वाले लाभ से की जाएगी। दूसरी तरफ गौर करने वाली बात यह भी है कि 2014 के लोकसभा में भाजपा अपने वोट प्रतिशत को सीटों में बदलने में जहां खासी कामयाब रही वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी उतनी सफल नहीं हो पाई।

उदाहरण के रूप में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 41 फीसदी वोट हासिल किए जबकि कांग्रेस 40.9 फीसदी वोट हासिल किए। अब राज्य की 230 सीटें के परिणाम देखे तो कम वोट मिलने के बाद भी कांग्रेस ने 114 सीटें जीत लीं, जबकि भाजपा 109 सीटें जीत सकी। वोट और सीटों का अनुपात निकालें तो यह मध्य प्रदेश में 1.15 था जो 2014 में देशभर में हुए लोकसभा चुनाव में 1.66 था।

छत्तीसगढ़ में तो भाजपा का वोट शेयर भी खूब कम हुआ और महज 15 सीटों पर जीत दर्ज की। इस राज्य में सीटों और वोट का अनुपात निकाले तो यह 0.51 बैठता है। इसके अलावा कर्नाटक में 1.29, राजस्थान में 0.95 और तेलंगाना में 0.12 है।

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