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2002 नरौदा पाटिया कांड: गुजरात हाइ कोर्ट के दो न्यायाधीशों ने दंगा स्थल का मुआयना किया

वर्ष 2002 के नरौदा पाटिया मामले में अपीलों की सुनवाई कर रही गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आज अपराध स्थल का दौरा किया ताकि घटना की बेहतर तस्वीर समझ सकें।

Author अहमदाबाद | June 9, 2017 3:46 AM
वर्ष 2002 के नरौदा पाटिया मामले में अपीलों की सुनवाई कर रही गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आज अपराध स्थल का दौरा किया ताकि घटना की बेहतर तस्वीर समझ सकें।

वर्ष 2002 के नरौदा पाटिया मामले में अपीलों की सुनवाई कर रही गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आज अपराध स्थल का दौरा किया ताकि घटना की बेहतर तस्वीर समझ सकें। उस घटना में 97 लोग मारे गए थे जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम थे। न्यायमूर्ति हर्ष देवनानी और न्यायमूर्ति एएस सुपेहिया अहमदाबाद के नरौदा पाटिया क्षेत्र में पहुंचे जो वर्ष 2002 में हुए गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित इलाका था। न्यायाधीशों ने घटनास्थल पर दो घंटे बिताए। न्यायमूर्ति हर्ष देवनानी और न्यायमूर्ति एएस सुपेहिया की खंडपीठ ने कल अपने आदेश में कहा कि ‘‘वकीलों द्वारा किया गया अनुरोध तर्कपूर्ण है’’ और वे लोग नरौदा पाटिया में घटनास्थल का दौरा करेंगे।

अदालत ने कहा, ‘‘शुरूआत से जब से मामले की सुनवायी हो रही है, दोनों पक्षों के वकील अदालत से घटनास्थल का दौरा करने का अनुरोध कर रहे हैं ताकि घटना कैसे हुई थी इसकी बेहतर समझ हो सके और बड़े क्षेत्र में फैले इलाके का ज्ञान हो सके। विशेष अदालत ने 30 अगस्त, 2012 को कोडनानी और 29 अन्य लोगों को उम्र कैद जबकि आरोपी बाबु बजरंगी को हत्याओं और आपराधिक षड्यंत्र के दोष में ‘‘जीवनपर्यंत कैद’’ की सजा सुनायी थी। कोडनानी को 28 वर्ष के कारावास की सजा सुनायी गयी थी, हालांकि फिलहाल वह जमानत पर हैं।

बता दें कि गुजरात उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने खुद को 2002 के नरोदा पाटिया दंगा मामले से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से अलग कर लिया। ऐसा करने वाले वह तीसरे न्यायाधीश हैं। याचिकाएं जब सुनवाई के लिए उस पीठ के सामने लायी गयीं जिसमें न्यायमूर्ति अकील कुरैशी शामिल हैं, तो उन्होंने कहा, ‘‘मेरे सामने ना लाएं।’ गुजरात की पूर्व मंत्री मायाबेन कोडनानी और विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता बाबू बजरंगी ने विशेष निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

पिछले साल न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति के एस झावेरी ने भी याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। दंगे में बचे लोगों और मामले की जांच करने वाली उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने भी सजा बढ़ाने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की हैं। 2002 में गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना के एक दिन बाद नरोदा पाटिया में दंगे हुए थे जिसमें करीब 97 लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकतर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे। अगस्त, 2012 में निचली अदालत ने 31 लोगों को दोषी करार दिया था और माया सहित 30 लोगों को मौत की उम्रकैद की सजा सुनायी थी। बजरंगी को ‘‘मौत तक उम्रकैद’’ की सजा सुनायी गयी थी।

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