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1984 सिख विरोधी दंगे : एक और मामले में 22 को आएगा फैसला, बढ़ सकती हैं सज्जन कुमार की मुश्किलें

1984 सिख विरोधी दंगों के एक और मामले की सुनवाई आज (गुरुवार को) पटियाला हाउस कोर्ट में होनी थी, लेकिन मुख्य वकील अनिल शर्मा उपस्थित नहीं हुए। ऐसे में अदालत ने सुनवाई स्थगित कर दी। इस मामले का फैसला 22 दिसंबर को सुनाया जाएगा।

सज्जन कुमार (Source: PTI)

1984 सिख विरोधी दंगों के एक और मामले की सुनवाई आज (गुरुवार को) पटियाला हाउस कोर्ट में होनी थी, लेकिन मुख्य वकील अनिल शर्मा उपस्थित नहीं हुए। ऐसे में अदालत ने सुनवाई स्थगित कर दी। इस मामले का फैसला 22 दिसंबर को सुनाया जाएगा। पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को इस मामले में भी हत्या और दंगे भड़काने का आरोपी बनाया गया है। अगर इस मामले में फैसला आता है तो सज्जन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सीबीआई ने सज्जन कुमार पर यह केस नानावती आयोग की सिफारिशों पर दर्ज किया था।

17 दिसंबर को एक फैसले में हुई उम्रकैद
दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर को 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में पूर्व सांसद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन को हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा भड़काने, आगजनी और धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाने की साजिश का दोषी करार दिया था। उन्हें 31 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया गया है। इस मामले में 34 साल बाद आए फैसले में हाईकोर्ट ने तीन अन्य दोषियों कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। वहीं, दो अन्य दोषियों पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा तीन से बढ़ाकर 10 साल कर दी।

207 पेज का था यह फैसला
जस्टिस एस. मुरलीधर व जस्टिस विनोद गोयल की पीठ ने 207 पेज में अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने 73 वर्षीय सज्जन कुमार के दिल्ली से बाहर जाने पर भी रोक लगा दी है। बता दें कि इस मामले में निचली अदालत ने सज्जन कुमार को 30 अप्रैल 2013 को बरी कर दिया था।

गवाह ने सज्जन कुमार को पहचाना
नानावती जांच आयोग के समक्ष पीड़िता जगदीश कौर ने सज्जन कुमार के खिलाफ बयान दिया था। जगदीश ने बताया था कि उन्होंने राजनगर क्षेत्र में सज्जन कुमार को भड़काऊ भाषण देते हुए देखा था। दंगे में जगदीश कौर के पति, बेटे और तीन रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई थी। साथ ही, दो सिखों के घरों व एक गुरुद्वारे को भी आग लगा दी गई थी। एनडीए सरकार ने इन मामलों की जांच के लिए जस्टिस नानावटी जांच आयोग बनाया था।

 

दो और मामलों दाखिल हो चुके आरोप पत्र
आयोग ने दिल्ली छावनी व पुल बंगश इलाकों में हुई हत्याओं की जांच दोबारा कराने की सिफारिश की थी। इसके बाद जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने 2010 में इन मामलों में कड़कड़डूमा जिला अदालत में दो आरोप पत्र दाखिल किए थे।

हाईकोर्ट ने की थी टिप्पणी
17 दिसंबर को फैसला सुनाते वक्त हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि यह आजादी के बाद की सबसे बड़ी हिंसा थी। उस दौरान पूरा तंत्र फेल हो गया था। यह हिंसा राजनीतिक फायदे के लिए कराई गई थी। आरोपी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले।

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