14 UP Judges Finally Get to Sit in Courtrooms after seven year of appointment - यूपी: 7 साल पहले हुई थी 14 जजों की नियुक्ति, अब जाकर कोर्ट रूम में बैठने को मिला - Jansatta
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यूपी: 7 साल पहले हुई थी 14 जजों की नियुक्ति, अब जाकर कोर्ट रूम में बैठने को मिला

उत्तर प्रदेश के 14 जजों को नियुक्ति के सात साल बाद आखिरकार कोर्टरूम में बैठने की जगह मिली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब वे काम कर पाएंगे।

तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश के 14 जजों को नियुक्ति के सात साल बाद आखिरकार कोर्टरूम में बैठने की जगह मिली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ये न्यायिक अधिकारी अब कुछ काम कर पाएंगे। बता दें कि 2001 में जजों की नियुक्ति के लिए आयोजित परीक्षण के दौरान उच्च अदालत ने 28 उम्मीदवारों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। वहीं, 14 उम्मीदवारों, जिन्होंने फिर से ली गई परीक्षा पास की थी, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ी। लेकिन फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया। वर्ष 2011 में इन 14 जजों की नियुक्ति की गई। लेकिन न तो इन्हें कोई काम सौंपा गया और न ही कोर्ट रूम में बैठने की जगह मिली। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सात साल बाद इन्हें कोर्ट रूम में जगह मिली।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2001 में मैनपुरी जिले में 14 न्यायिक अफसरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाल आवेदन मांगा गया था।  हालांकि, 14 लोगों के लिए विज्ञापन था, लेकिन 28 लोगों की नियुक्ति कर ली गई। चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने ज्यादातर सफल उम्मीदवारों के उत्तर-पत्रों की जांच के बाद पाया कि कोई सूची या मेरिट सूची तैयार नहीं की गई थी। ओवराइटिंग कर उम्मीदवारों को ज्यादा मार्क्स दिए गए थे। वहीं, कई उम्मीदवारों का नंबर कम कर दिया गया था। यह सब अलग-अलग स्याही से किया गया था। उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि कुछ मामलों में उत्तरों की जांच किए बिना अंक भी दिए गए थे और कई उत्तर कॉपी का मूल्यांकन नहीं किया गया था। कुछ उम्मीदवारों ने पहचान के उद्देश्य के लिए उत्तर कॉपी पर पर अपना नाम भी लिखा था। इसके बाद 2008 में आदेश देकर फिर से एक परीक्षा का आयोजन किया गया। 14 उम्मदवारों को वर्ष 2011 में सफल घोषित किया गया।

 

लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश की अपील की गई, तो दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा कि 28 उम्मीदवारों का चयन  रद्द करने से पहले एक मौका दिया जाना चाहिए था। हालांकि, एक दूसरी दो न्यायाधीश की खंडपीठ ने इसी तरह की अपील को खारिज कर दिया और इसलिए मामला तीन न्यायाधीशों के खंडपीठ के समक्ष रखा गया। तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने अंतिम आदेश में उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अनियमितता पाए जाने की वजह से उच्च न्यायालय द्वारा पूरी चयन प्रक्रिया को अलग करने और एक नए चयन प्रक्रिया को निर्देशित करना पूरी तरह से उचित था।” खंडपीठ ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में इन मामलों की लापरवाही के कारण, न्यायिक अधिकारियों को जिन्हें बाद में 2011 में नियुक्त किया गया था उन्हें किसी भी काम को आवंटित नहीं किया गया था। यह कहा गया था कि संबंधित उच्च न्यायालय और जिला न्यायाधीशों को इन 14 न्यायाधीशों को काम आवंटित नहीं करना चाहिए।

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