झारखंड के 14 लोग जो यूएई के शहर दुबई में कमाने के लिए गए थे, अब फंस गए हैं। उन्हें कई महीनों से सैलरी नहीं दी जा रही, पासपोर्ट सीज कर लिए गए हैं, जिससे वह स्वदेश नहीं लौट पा रहे हैं।

झारखंड के गिरिडीह, हजारीबाग और बोकारो जिले के मजदूरों ने एक वीडियो शेयर किया जिसमें उन्होंने दुबई में अपनी दुर्दशा की जानकारी दी। इस वीडियो में उन्होंने बताया कि उन्हें सैलरी नहीं मिलने से भोजन और रहने में दिक्कत हो रही है। सामाजिक कार्यकर्ता सिकंदर अली ने सरकार से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।

सभी को कितनी सैलरी तय थी?

दुबई स्थित भारतीय कंपनी ईएमसी इलेक्ट्रोमैकेनिकल कंपनी एलएलसी में कार्यरत हजारीबाग के 32 वर्षीय ट्रांसमिशन लाइन कर्मचारी दीपक कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि दुबई गए 14 लोगों को प्रति व्यक्ति 1600 दिरहम तय हुआ था। “हम पिछली कंपनी में साथ काम करने वाले एक शख्स के जरिए जुड़े थे, जो पहले कान्ट्रैक्टर के साथ काम कर चुका था और उसी ने हमें दुबई जाने के लिए मनाया। दीपक ने कहा कि अब हमें मुश्किल से 1000 दिहरम मिल रहे।

एजेंट ने क्या किया दावा?

इन सभी को भेजने वाले एजेंट घनश्याम महतो ने कहा कि हमने उन्हें पहले ही बता दिया था कि एयर टिकट का पैसा उनकी सैलरी से काटा जाएगा। उसने दावा किया कि बेसिक सैलरी उन्हें दी गई है और कंपनी द्वारा टिकट के पैसे काटे गए हैं। बोकारो के एक अन्य मजदूर दलेश्वर महतो ने घनश्याम के दावा पर कहा कि यह पहले ही तय हो गया था कि एयर टिकट, खाना, आवास और वीजा समेत सभी खर्च कंपनी की ओर से रहेगा और सैलरी में कोई कटौती नहीं होगी।

दलेश्वर महतो ने कहा कि हमने झारखंड रहते हुए ही इस पर लिखित समझौते की मांग की थी, लेकिन उन्हें कहा गया कि इस पर दुबई में हस्ताक्षर किए जाएंगे। यहां पहुंचने के बाद कोई समझौता नहीं हुआ और प्रत्येक व्यक्ति के वेतन से हर माह करीब 1000 दिरहम काटे जा रहे हैं।

आवास मैनेजमेंट ने दी धमकी

आगे उन्होंने आरोप लगाया कि कमर का किराया न लेने के आश्वासन के बाद भी 50 दिरहम काटे जा रहे थे। दलेश्वर ने दावा किया कि आवास मैनेजमेंट ने 5000 दिरहम की मांग की और ये नहीं देने पर बाहर निकालने की धमकी दी।

दलेश्वर ने कहा, वह कल रात फिर आया और धमकी दी। जब हमने कहा कि हम काम नहीं करेंगे और अपने घर जाएंगे, तो हमारे पासपोर्ट वापस नहीं दिए गए। उन्होंने कहा कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद किसी भी सुपरवाइजर या कंपनी प्रतिनिधि ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

दलेश्वर महतो के मुताबिक, कैंप के सुपरवाइजर ने कहा कि कंपनी घाटे में चल रही है और मजदूरों को भुगतान करना ही होगा। उन्होंने कहा कि हम यहां कमाने आए हैं, उन्हें पैसे देने नहीं। अभी हम स्थानीय दुकानों से खाना उधार लेकर खा रहे हैं, जब हम हमें भुगतान नहीं मिलेगा, हम काम नहीं करेंगे।

एक अन्य मजदूर राजेश कुमार ने कहा कि एजेंट ने उनसे संपर्क किया और ठेकेदार के फोन का इस्तेमाल करके व्हाट्सऐप के जरिए ऑनलाइन इंटरव्यू लिया गया। सारी शर्ते मौखिक रखी गईं। उन्होंने कहा, कंपनी मैनेजर ने फोन पर कहा था कि हमारे आने के बाद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन यहां आने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई। अब हम वापस जाना चाहते हैं।

कंपनी ने दो साल के वीजा बनवाए

दुबई स्थित ईएमसी के मानव संसाधन अधिकारी मंजुनाथ नागवी ने कहा, “कर्मचारी काम करने के इच्छुक नहीं है और उन्हें सैलरी दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि कर्मचारी वापस लौटने की बात पर अड़े हुए हैं और कंपनी ने उनके लिए दो साल के वीजा पर निवेश किया है, इसलिए उन्हें एक माह के भीतर वापस भेजना संभव नहीं है।”

श्रम विभाग के राज्य प्रवासी श्रमिक नियंत्रण कक्ष की प्रमुख शिखा लकरा से संपर्क किया गया, उन्होंने इस मामले पर कहा कि विभाग को अभी-अभी शिकायत मिली है, अब आगे की कार्रवाई करने से पहले जांच की जाएगी। आगे पढ़िए धर्म परिवर्तन के बाद चार परिवारों का सामाजिक बहिष्कार, पानी और जंगल तक भी रोकी गई पहुंच