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शिवकुमार स्वामीजी ने आखिर क्यों लिया था संन्यासी बनने का फैसला, लोग इसलिए कहते थे ‘जीवित भगवान’

सोमवार को लंबी बीमारी के बाद सिद्धगंगा मठ के महंत शिवकुमार स्वामीजी का निधन हो गया। बता दें कि लिंगायत- वीरशैव समुदाय के स्वामीजी 111 साल के थे।

शिवकुमार स्वामीजी, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

सोमवार को लंबी बीमारी के बाद सिद्धगंगा मठ के महंत शिवकुमार स्वामीजी का निधन हो गया। बता दें कि लिंगायत- वीरशैव समुदाय के स्वामीजी 111 साल के थे। 1 अप्रैल 1907 में जन्मे स्वामी जी को कर्नाटक में जीवित भगवान कहा जाता है। स्वामी जी का जन्म रामनगर जिले के वीरपुरा गांव में हुआ था। उनका परिवार धार्मिक काम करता था, जैसे मंदिरों की देखरेख आदि। स्वामीजी के 7 भाई और 5 बहनें थीं।

संन्यास का ऐलान: शिवकुमार ने दोस्त की मौत के बाद संन्यासी बनने का फैसला किया। बता दें कि 16 जनवरी 1930 को सिद्धगंगा मठ में संन्यासी बन चुके उनके सबसे करीबी दोस्त मरुलराध्य की मृत्यू हो गई थी। जो इस मठ के अगले महंत बनने वाले थे। इस से दुखी होकर संन्यासी बनने का ऐलान कर दिया और सिद्धगंगा मठ से जुड़ गए और आगे चलकर इसके स्वामीजी बने।

शिवकुमार के परिवार को लगा था झटका: शिवकुमार के इस फैसले से उनके परिवार को झटका लगा। क्योंकि उनके माता पिता को उम्मीद थी कि उनका बेटा एक दिन बड़ा अफसर बनेगा। लेकिन शिवकुमार ने परिवार को मना लिया और सिद्धगंगा को एक नई दिशा दी। जिसके बाद 1937 में मठ का पहला संस्कृत स्कूल खोला गया। बता दें कि आज पूरे कर्नाटक में मठ के 123 स्कूल, कॉलेज, इंजीनियरिंग और मैनजमेंट इंस्टिट्यूट हैं। इसके साथ ही 8000 बच्चों को मुफ्त में शिक्षा और रहने की व्यवस्था की जाती है।

देश के बड़े बड़े नेता ले चुके हैं आशीर्वाद: कर्नाटक में सिद्धगंगा मठ का बड़ा दबदबा है। ऐसे में पीएम मोदी, अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई बड़े बड़े नेता उनके आशीर्वाद के लिए आते हैं। बता दें कि 2015 में स्वामीजी को पद्म भूषण से नवाजा गया था। गौरतलब है कि पीएम मोदी उन्हें अपना गुरु मानते थे।

100 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव: प्रदेश में स्वामीजी के 400 से अधिक मठ हैं। इन मठों के अनुयायी कर्नाटक के लिंगायत समुदाय के हैं। जिनकी संख्या प्रदेश में 18 फीसदी है। यानी राज्य की 100 विधानसभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव है। साथ ही बता दें कि ये 18 प्रतिशत लिंगायत स्वामीजी को जीवित भगवान मानते थे।

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