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राजपाटः मसीहा की हकीकत

खुद को गरीब गुरबा का मसीहा समझते हैं लालू यादव। तभी तो न किसी आलोचना की परवाह करते हैं और न नुक्ताचीनी की। कोई कुछ भी कहे, कहता है तो कहता रहे। लालू वही करेंगे जो उन्हें भाएगा।

Author नई दिल्ली | November 1, 2017 4:26 AM
नीतीश-लालू का फाइल फोटो

खुद को गरीब गुरबा का मसीहा समझते हैं लालू यादव। तभी तो न किसी आलोचना की परवाह करते हैं और न नुक्ताचीनी की। कोई कुछ भी कहे, कहता है तो कहता रहे। लालू वही करेंगे जो उन्हें भाएगा। अगर वे सियासत में हैं तो क्या अपने बेटे-बेटी और बीबी का ख्याल छोड़ दें। अपने दोनों बेटों को बिहार में मंत्री बनवा लिया। पहली बार बेशक चुनाव लड़े और जीते हों। एक तो उपमुख्यमंत्री भी है। खुद अयोग्य हैं लिहाजा किसी सदन के सदस्य हो नहीं सकते। बचे बेटी और बीबी। वे दोनों राज्यसभा में पहुंच जाएं तो क्या हर्ज है? राबड़ी तो दो बार मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। जबकि बेटी मीसा भारती भी लोकसभा का पिछला चुनाव लड़ चुकी हैं। किस्मत ने साथ नहीं दिया अन्यथा वे लोकसभा की शोभा बढ़ाने वाली लालू की पहली संतान कहलातीं।

लोकसभा से चूक गईं तो अब राज्यसभा ही सही। लालू के पास पर्याप्त विधायक हैं। बेटी और बीबी को आसानी से राज्यसभा में भेज सकते हैं। उनके लिए कहीं कोई अड़चन नहीं। हो भी कैसे सकती है। वे तो परिवारवाद को बुरा मानते ही नहीं। लोहिया, जेपी और जन नायक कर्पूरी ठाकुर अगर परिवारवाद के विरोधी थे तो क्या फर्क पड़ता है? लालू के उन तीनों मार्गदर्शकों ने तो परिवारवाद के खिलाफ बिगुल भी बजाया था। मंच पर लालू उनका नाम लेते अघाते नहीं। तो भी परिवारवाद से कतई गुरेज नहीं है। कब से दलीलें देकर औचित्य साबित कर रहे हैं कि इंजीनियर का बेटा इंजीनियर और डाक्टर का बेटा डाक्टर बन सकता है तो नेता के बेटा-बेटी राजनीति में क्यों नहीं आ सकते। रही उनकी पार्टी राजद की अंदरूनी स्थिति। लालू अब किंगमेकर हैं। कोई उनका विरोध करने की पार्टी में जुर्रत कर ही नहीं सकता। लालू को कौन समझाए कि नेता के बेटा-बेटी को राजनीति में कूदने और चुनाव लड़ने का अधिकार तो वाजिब माना जा सकता है पर तभी जब पार्टी के लिए उनका योगदान दूसरे कार्यकर्ताओं और नेताओं से ज्यादा हो। केवल नेता की संतान होने के बल पर अगर कोई लोकसभा या राज्यसभा में पहुंचता है तो लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले किसी को भी हजम नहीं होगी यह बात।
चिराग तले अंधेरा
नीकु को उनके विरोधी जिद्दी कह सकते हैं पर वे खुद को बात का धनी ही मानते हैं। जो ठान लिया, उसे करके रहेंगे। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सूबे में दारूकुट्टों का दिमाग ठिकाने लगाने की ठान ली है। शराब पीने वाले बुद्धिजीवियों को प्रभाष जोशी ने नशेड़ी, दारूबाज या शराबी के बजाए दारूकुट्टा नाम दिया था। बिहार में एक अप्रैल से शराबबंदी लागू हो जाएगी। शराब के विरोध में जागरूकता अभियान लगातार चलाया जा रहा है। नीकु का दावा है कि इस अभियान में चालीस लाख लोग लगे हैं। शराबबंदी के बारे में कानून को लागू करने से पहले जागरूकता फैलाना नीकु को जरूरी लगा है। वे अनूठा कानून बनाने वाले हैं। जिसकी लोग सारे देश में मिसाल दें। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को शपथ पत्र देना होगा कि वे शराब का सेवन नहीं करते हैं। बच्चे खुद अभिभावक से ऐसा शपथ पत्र लेकर स्कूल में आएंगे। अच्छा होता कि नीकु अपनी पार्टी और दोनों सहयोगी पार्टियों के विधायकों और सांसदों से भी हलफनामे लेते कि वे शराब का सेवन नहीं करेंगे। शराब की लत नहीं छोड़ पाए तो राजनीति, पार्टी और विधायिका सभी से संन्यास ले लेंगे।
दोहरा नजरिया
मध्यप्रदेश में माध्यमिक शिक्षा मंडल की बारहवीं कक्षा के इम्तिहान में हिंदी के प्रश्न पत्र में पूछा गया एक सवाल विधानसभा में हंगामे की वजह बन गया। पर्चे में निबंध के लिए शीर्षक आया- जातिगत आरक्षण देश के लिए घातक। पांच मार्च को हुआ था इम्तिहान। विधानसभा में कांग्रेस के बाला बच्चन ने प्रश्नकाल में इसे उठाना चाहा। पर अध्यक्ष सीताशरण शर्मा ने इजाजत नहीं दी। लिहाजा शून्यकाल शुरू हुआ तो बाला बच्चन और उनके साथियों राम निवास रावत व मुकेश नायक ने इस मुद्दे पर काम रोको प्रस्ताव की सूचना दे दी। अध्यक्ष ने नियम की दुहाई दी कि ऐसा नोटिस कार्यवाही शुरू होने से दो घंटे पहले देना जरूरी है। संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्र ने भी नियमों का हवाला दिया तो विपक्षी सदस्यों ने सरकार को आरक्षण विरोधी बता दिया। इतना ही नहीं वे काम रोको प्रस्ताव पर चर्चा के लिए भी अड़े रहे। मजबूरी में मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने जांच के आदेश देने की बात कह कर मामले को सुलझाया। लेकिन अगले दिन फिर इसी मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों आपस में उलझ गए। हंगामा इस कदर बरपा कि अध्यक्ष को सदन की बैठक कुछ देर के लिए स्थगित करनी पड़ गई। बैठक दुबारा हुई तो रामनिवास रावत बोले कि निबंध से संविधान की मूल भावना का उल्लंघन हुआ है। लिहाजा चर्चा जरूरी है। नरोत्तम मिश्र ने जवाब दिया कि पर्चा बनाने वाले और माडरेटर दोनों को निलंबित कर दिया गया है। इतना ही नहीं निबंध वाले सवाल को भी शून्य बना दिया है। फिर क्या औचित्य बचता है सदन में इस मुद्दे पर चर्चा का। शिक्षा मंत्री उमा शंकर गुप्त ने भी उनकी बात को बढ़ाते हुए कहा कि अब पर्चा सौ की जगह नब्बे नंबर का माना जाएगा। छात्रों का कोई अहित नहीं होगा। तकरार के बाद अध्यक्ष ने भी सरकार का यह कह कर बचाव किया कि जवाब तो आ ही गया। कुल मिला कर आरक्षण के सवाल पर सरकार घबराई नजर आई। लेकिन निबंध का विषय क्या इतना बड़ा अपराध हो गया कि आला आईएएस अफसर से जांच की नौबत आई। कितना हैरान करता है कांग्रेस का दोहरा रवैया। एक तरफ जेएनयू में आजादी के मुद्दे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता देश विरोधी नारे लगाने वालों की हिमायत तो दूसरी तरफ संवेदनशील मुद्दे पर नई पीढ़ी के विचारों को जानने की सामान्य कोशिश पर तूफान बरपाना।
मोह कुर्सी का
आनंद शर्मा का हिमाचल से राज्यसभा पहुंचना तय है। यों पिछली दफा उन्हें राजस्थान से उच्च सदन में लाया गया था। हालांकि उससे पहले वे हिमाचल से ही चुने गए थे। राज्यसभा में पार्टी के उपनेता तो हैं ही, सोनिया गांधी के भरोसेमंद भी ठहरे। वीरभद्र से छत्तीस का आंकड़ा पुराना है। आनंद शर्मा के अधिकार में होता तो वीरभद्र को मुख्यमंत्री बनने ही न देते। पर अपनी कुर्सी का सवाल आया तो नतमस्तक होना पड़ा। शिमला आकर ही तो किया नामांकन। पर वीरभद्र भी चुटकी लेने से चूके नहीं। फरमाया कि आनंद शर्मा को 32 साल पहले युवक कांग्रेस का अध्यक्ष उन्होंने ने ही बनाया था। मनमोहन सरकार में जब आनंद शर्मा मंत्री थे तो अपने सूबे में आने की फुर्सत नहीं मिलती थी उन्हें। लेकिन केंद्र से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ तो आनंद शर्मा को भी भाने लगा अपना सूबा। मजबूरी में ही सही पर भाषा तो बदली ही है। राग अलाप रहे हैं कि हिमाचल तो उनकी जन्म और कर्मभूमि दोनों है। पहली बार 1984 में राज्यसभा आए थे। तब भी मुख्यमंत्री वीरभद्र ही थे। अपना उल्लू सीधा करना हो तो विरोधी की चाकरी भी करने में क्या हर्ज?
जोश न जज्बा
मिशन 84 है असम में अमित शाह का सपना। अपने बूते पहली बार उत्तर-पूर्व के इस सबसे बड़े सूबे की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रहे हैं शाह। उसके लिए सियासी बंदोबस्त भी खूब किया है। मसलन, यूडीएफ और कांग्रेस के बीच तालमेल नहीं होने देने के लिए कब से बिसात बिछा रखी है। हालांकि मिशन-84 को चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही झटका लगा है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने असम की चौदह में से सात सीटों पर परचम फहराया था। विधानसभा में 126 में से 84 सीटें जीतना हंसी-खेल नहीं है। पर लक्ष्य तो दो तिहाई बहुमत का ही रखा है अमित शाह ने। यह बात अलग है कि क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल के चक्कर में यह मिशन खटाई में पड़ सकता है। 24 सीटें तो असम गण परिषद को ही दे दी हैं। बोडो पीपुल्स फ्रंट को भी 16 सीटें देने का वादा कर रखा है। तीन-चार सीटें जाति आधारित कुछ छोटे दलों के लिए भी छोड़नी ही होंगी। यानी दो तिहाई से कम सीटें ही बचेंगी भाजपा के लिए। ऊपर से टिकट के दावेदारों की भीड़ अलग नाक में दम कर रही है। उधर अगप और बीपीएफ ने भाजपा से तालमेल किया तो इन दलों में फूट पड़ गई। पार्टी के दो नाराज नेता कांग्रेस में शामिल हो गए। तृणमूल भाजपा बना अगप के उम्मीदवारों को चुनौती देंगे। अगप को 24 सीटें देने का पार्टी के भीतर विरोध हुआ है। रही अगप की बात तो उसे इतनी सीटों से भी संतोष नहीं। दोनों ही दलों के भीतर असंतोष सतह पर आया है। अगप के नाराज कार्यकर्ताओं ने तो गुवाहाटी स्थित पार्टी दफ्तर में ही तोड़-फोड़ कर दी। भाजपा के सूबेदार रह चुके सिद्धार्थ भट्टाचार्य को असंतोष चिंता की बात नहीं लगता। बागियों से वार्ता कर स्थिति को सामान्य बना लेने का भरोसा है उन्हें। बकौल भट्टाचार्य फिलहाल पार्टी का असली लक्ष्य कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना है। रही अगप की बात तो अध्यक्ष अतुल वोरा अपने कार्यकर्ताओं को लोगों की उम्मीदों का सम्मान करने की नसीहत दे रहे हैं। ऊपर से एक तुर्रा यह कि बड़ा लक्ष्य हासिल करना हो तो छोटे-छोटे हितों को कुर्बान करना ही पड़ता है।
चंपी की इंतहा
राजस्थान के कांग्रेस सूबेदार सचिन पायलट ने अपनी जंबो कार्यकारिणी क्या बनाई, पार्टी में घमासान ही मच गया। ज्यादातर जिलों में भी पायलट ने नए अध्यक्ष बना दिए। विधानसभा के अगले चुनाव में सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रहे हैं ज्यादातर कांग्रेसी। पर इस चक्कर में एक दूसरे की टांग भी खींचना जारी है। और तो और प्रभारी महासचिव गुरुदास कामत तक खुद को बेबस समझ रहे हैं। यों कांग्रेस में आला कमान संस्कृति रही है। पायलट पार्टी के सूबेदार तो दो साल पहले ही बन गए थे पर अपनी नई टीम उन्होंने देर से बनाई है। कार्यकारिणी की बैठक हुई तो वरिष्ठ उपाध्यक्ष और विधायक विश्वेंद्र सिंह ने बखेड़ा कर दिया। सभी से हाथ उठवा कर पायलट को नेता मानने का एलान किया। गुरुदास कामत और अशोक गहलोत जैसे दिग्गजों को यह कोशिश नागवार गुजरी। फिर इस तरह की पहले कोई परंपरा भी पार्टी में नहीं रही। राहुल गांधी जब जयपुर दौरे पर आए थे तो पार्टी की सभा में दो टूक कह गए थे कि पायलट के युवा जोश और गहलोत के अनुभव के बूते ही कांग्रेस अगले चुनाव में भाजपा को पछाड़ेगी। पायलट तो पहली बार सूबेदार बने हैं, पर गहलोत तो कई बार इस कुर्सी पर विराज चुके हैं। दो बार तो वे सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके जनाधार का अंदाज करके ही राहुल ने पायलट के साथ उनका नाम लिया होगा। अभी चुनाव में तीन साल साल का फासला है। फिर क्यों विश्वेंद्र ने नया शिगूफा छोड़ कर निष्ठावान और जमीनी कार्यकर्ताओं को चिढ़ाया।
मैच पर रार
आखिर क्रिकेट का मैच भी सियासत की भेंट चढ़ गया। धर्मशाला में नहीं होगा अब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मुकाबला। कोलकाता के ईडन गार्डन स्टेडियम में भिडेंगी दोनों टीमें। हिमाचल के लिए यह बुरी खबर है। इस मापदंड से तो धर्मशाला में आईपीएल के मैच पर भी संकट आ सकता है। तिरंगा यात्रा शिमला से शुरू करने के सिलसिले में हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन के मुखिया अनुराग ठाकुर शिमला आए तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को निशाने पर लिया। उन पर गिरगिट की तरह रंग बदलने और क्रिकेट मैच के संदर्भ में साफगोई नहीं दिखाने का आरोप जड़ दिया। शहीदों के नाम पर सियासत करने तक की बात कह डाली। कारगिल युद्ध के बाद 2005 में धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय मैच हुआ था। तब भी मुख्यमंत्री वीरभद्र ही थे। मैच के खास मेहमान भी वही थे। पर तब उन्हें शहीदों की याद नहीं आई थी। अनुराग को शिकायत है कि जो मुख्यमंत्री मैच के लिए सुरक्षा मुहैया नहीं कर सकता उसे सरकार चलाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं। रही वीरभद्र की बात तो वे अनुराग ठाकुर के आरोप को झुठला रहे हैं। सफाई दी है कि सुरक्षा मुहैया कराने से कभी इनकार किया ही नहीं। मैच कोलकाता में कराने का फैसला तो आईसीसी का है। अनुराग के बयान को हास्यास्पद बताया है वीरभद्र ने। पर वे अपने इस बयान से कैसे मुकर सकते हैं कि बीसीसीआई के सचिव को शहीदों के परिजनों और पूर्व सैनिकों से मिलकर उनका सहयोग मांगना चाहिए। हकीकत तो यही है कि हिमाचल में वीरभद्र और धूमल की निजी खुन्नस की भेंट चढ़ गया क्रिकेट का रोचक मुकाबला। सूबे को नफा हो या नुकसान, इसकी परवाह किसी को नहीं।

गुटबाजी लाइलाज
मध्यप्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी न जाने कब खत्म होगी। सूबेदार अरुण यादव पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए दनादन पदयात्राएं कर रहे हैं। लेकिन पार्टी के ही कुछ लोग उनकी कुर्सी पलटने की मुहिम में जुटे हैं। अब तक नौ चरण पूरे कर चुके हैं यादव अपनी विभिन्न अंचलों की पद यात्रा के। तीन दिन का एक चरण और हर दिन दस-पंद्रह किलोमीटर का पैदल सफर। लेकिन उनकी टीम से नाराज नेताओं ने अब नई मांग कर डाली। कमल नाथ को पार्टी की बागडोर दिलाना चाहता है यह खेमा। दलील भी दिलचस्प दी है। यही कि सूबे में पार्टी ने सभी मोहरे आजमा लिए। लिहाजा अब कमलनाथ को मौका देना चाहिए। अभियान को बाला बच्चन ने हवा दी है। फिर तो विधायक आरिफ अकील, तरुण भनोट और रजनीश सिंह भी मैदान में कूद पड़े।

मंडला में भनोट ने मंच से अबकी बार कमलनाथ का उद्घोष भी कर दिया। संजीव उईके और ओंकार सिंह मरकान भी मुहिम में शामिल हो गए हैं। कमलनाथ 1977 से लगातार लोकसभा में हैं। बीच में हवाला के चक्कर में एक बार टिकट कट गया था तो उनकी जगह पत्नी लोकसभा पहुंच गई थीं। यों छह महीने बाद सत्तर के हो जाएंगे वे। पर समर्थकों को अब भी नौजवानों जैसा जोश दिखता है उनके व्यक्तित्व में। रही अरुण यादव की बात तो उन्होंने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। दिल्ली गए तो ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के साथ-साथ कमलनाथ से भी मिले और दे आए अपनी पदयात्रा में शामिल होने का न्योता। कमलनाथ को वैसे भी अभी फुर्सत कहां है? सोनिया गांधी ने उन्हें असम चुनाव का जिम्मा सौंप दिया है। इससे मध्यप्रदेश के उनके चंपुओं को झटका लगा है। उधर यादव भी अपने खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को ठंडा करने के लिए अपनी कार्यकारिणी का विस्तार करने की तैयारी में जुट गए हैं।
यक्ष प्रश्न
उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे राकेश शर्मा को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कुछ ज्यादा ही भाव दे रखा है। पहले उन्हें बतौर मुख्य सचिव सेवा विस्तार देने का प्रयास किया था। लेकिन नियमों के अवरोध और केंद्र सरकार की असहमति ने कोशिश नाकाम कर दी। पता नहीं शर्मा ने ऐसा क्या जादू कर रखा है कि रिटायर होने के बाद उन्हें ही अपना प्रधान सचिव बना दिया रावत ने। मुख्य सचिव सूबे में सरकारी मशीनरी का मुखिया होता है। शर्मा ने अपने नए पद का नामकरण मुख्य प्रधान सचिव रखवा लिया। ताकि लगे कि वे मुख्य सचिव नहीं हैं तो क्या मुख्य सचिव से भी बड़ा है उनका ओहदा। विधानसभा में सरकार ने बजट पेश किया तो बाद में पत्रकारों को मुख्यमंत्री रावत लगे बजट की खूबियां बताने। एक तरफ वित्तमंत्री इंदिरा हृदेश थीं तो दूसरी तरफ मीडिया सलाहकार सुरेंद्र अग्रवाल। तभी राकेश शर्मा भी आ धमके। आमतौर पर नौकरशाह सियासी प्रेस कांफ्रेंस से दूरी बनाते हैं। पर शर्मा की जुर्रत देखिए कि अग्रवाल को उठा कर मुख्यमंत्री के बगल में ही बैठे वे।
विचित्र किंतु सत्य
उत्तराखंड में भाजपा की सांगठनिक हालत खस्ता है। एक बानगी देखिए। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कोई है ही नहीं। पहले अजय भट्ट थे नेता। पर उन्हें पिछले दिनों पार्टी का सूबेदार बना दिया अमित शाह ने। इससे विधायक दल के नेता की कुर्सी खाली हो गई। कहने को भाजपा में एक व्यक्ति-एक पद का प्रचलन है पर नौ मार्च से शुरू हो चुके विधानसभा के सत्र में तो सूबेदार अजय भट्ट ही निभा रहे हैं अभी भी नेता प्रतिपक्ष का जिम्मा।

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