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राजपाटः दाल में काला

तरुण गोगोई ने कहा था कि न्यायमूर्ति रंजन गोगोई अगले चुनाव में भाजपा के असम के संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार हो सकते हैं।

खुद न्यायमूर्ति गोगोई कई बार कह चुके हैं कि वे न तो राजनीतिक हैं और न उनकी ऐसी कोई महत्वकांक्षा है।

रंजन गोगोई के पिता असम की कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे थे। पर खुद न्यायमूर्ति गोगोई कई बार कह चुके हैं कि वे न तो राजनीतिक हैं और न उनकी ऐसी कोई महत्वकांक्षा है। राज्यसभा के एक नामित सदस्य और किसी पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से चुने गए राज्यसभा सदस्य के बीच अंतर होता है। गोगोई को यह सफाई इस बार असम के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के एक बयान के कारण देनी पड़ी है। तरुण गोगोई ने कहा था कि न्यायमूर्ति रंजन गोगोई अगले चुनाव में भाजपा के असम के संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार हो सकते हैं।

फिलहाल सर्बानंद सोनोवाल असम की भाजपा सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। भाजपा की तरफ से असम के उपाध्यक्ष विजय गुप्ता तरुण गोगोई के बयान को निराधार बता चुके हैं। पर असम भाजपा के भीतर सोनोवाल को लेकर खुसर-पुसर तो जरूर है अन्यथा पार्टी के ही एक सांसद और एक मंत्री क्यों कहते कि हिमंत बिस्वा सरमा में मुख्यमंत्री पद की सारी योग्यताएं हैं।

सुर्खियों का मोह
बंशीधर भगत और कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन में कई समानताएं हैं। मसलन दोनों ही भाजपा के नेता हैं और दोनों ही अपने बयानों व कारनामों से निरंतर सुर्खियों में बने रहते हैं। दोनों ही बागी तेवर दिखाने के लिए जाने जाते हैं। फर्क है तो बस हैसियत का। चैंपियन महज विधायक हैं जबकि भगत भाजपा के उत्तराखंड के सूबेदार तो हैं ही, सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। चैंपियन कई पार्टियां बदलते हुए भाजपा में ठहरे हैं जबकि भगत शुरू से भाजपाई ठहरे।

पिछले दिनों चैंपियन ने अपने ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ मोर्चा खोला था। पर्वतीय मूल के लोगों के बारे में गलत बयानी भी की थी। नतीजतन पार्टी से निष्कासन होता ही। वैसे भी सूबे के राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी पीछे पड़ गए थे। भगत ने हैरानी वाली हरकत बलूनी के विरोध को दरकिनार कर चैंपियन की पार्टी में वापसी से की। सफाई दे रहे हैं कि हरिद्वार में हो रहे जिला पंचायत चुनाव को देखते हुए लिया है चैंपियन को वापस। गुर्जर बिरादरी के चैंपियन हथियारों की नुमाईश को लेकर कई बार विवादों में फंसे हैं। पार्टी में वापसी का जश्न मनाते वक्त भी उनके समर्थक कर बैठे हथियारों का प्रदर्शन।

दरअसल चैंपियन को पिता नरेंद्र सिंह की इलाके में लोकप्रियता का लाभ मिलता है। इसके उलट बंशीधर भगत पूर्व में हल्लानी की रामलीला के मंच पर दशरथ का किरदार निभाते रहे हैं। वे भी अपने एक बयान से इन दिनों सुर्खियों में हैं। पार्टी के विधायकों से कहा कि 2022 में प्रधानमंत्री के सहारे किसी की नैया पार नहीं होगी। लिहाजा विधायक अपने क्षेत्रों में काम करें। बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो कांग्रेस को मुद्दा मिल गया। आलाकमान को तो सफाई देकर बच गए भगत पर विपक्ष के निशाने से कैसे निपटें। पार्टी के लोगों को तो भगत से यह शिकायत भी है कि सूर्यास्त होते ही वे मस्त हो जाते हैं और फिर किसी से नहीं मिलते।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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