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राजपाट और सियासी तेवर

अब हर कोई एक ही सवाल कर रहा है कि शशिकला ने अचानक अपने को चुनाव से दूर रखने का फैसला क्यों ले लिया। जितने मुंह, उतनी बात। कोई कह रहा है कि भाजपा और केंद्रीय एजंसियों के दबाव में उन्होंने इरादा बदला तो कोई कह रहा है कि अभी उनकी सेहत ठीक नहीं है।

Tamil Nadu Assembly Elections 2021तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की सहली शशिकला नटराजन और राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे।

चेनम्मा की चाल
चुनावी राजनीति से फिलहाल दूर रहने का अचानक एलान कर जयललिता की सहेली शशिकला नटराजन ने तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक का अंदरूनी संकट टाल दिया है। अन्नाद्रमुक का भाजपा से गठबंधन है ही। भाजपा को पार्टी ने आसानी से 25 सीटें दे भी दी हैं। हालांकि इसके बावजूद अन्नाद्रमुक अपने बाकी छोटे सहयोगी दलों के साथ सीटों का तालमेल नहीं बिठा पाई है। उधर स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक ने कांग्रेस और वामदलों के साथ मिलकर इस बार सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक को कड़ी चुनौती दी है। अन्नाद्रमुक ने पिछला चुनाव जयललिता के जीवित रहते उनके करिश्माई नेतृत्व के कारण ही जीता था। उनकी मौत के बाद शाशिकला ने पनीरसेल्वम की जगह ई पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। पर वे शशिकला के प्रति वफादार नहीं रहे। शशिकला बंगलूर जेल में सजा काट रही थीं तो पलानीस्वामी ने पनीरसेल्वम से हाथ मिला लिया। इस चक्कर में शशिकला के भतीजे दिनाकरण को अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी।

जयललिता की खाली हुई विधानसभा सीट पर दिनाकरण जीत भी गए। पर शशिकला के जेल चले जाने के कारण वे अन्नाद्रमुक के लिए कोई बड़ी चुनौती पेश नहीं कर पाए। शशिकला जेल से रिहा हुई तो पलानीस्वामी और पनीर सेल्वम की जोड़ी का घबराना स्वाभाविक था। हर कोई माने बैठा था कि शशिकला अम्मा जयललिता की सियासी विरासत पर अपना दावा ठोकेंगी। जिस अंदाज में वे बंगलूर से सड़क मार्ग द्वारा जगह-जगह अपने समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए चेन्नई पहुंची थी उससे भी अन्नाद्रमुक के भीतर नए खतरे का अंदेशा बढ़ा था। अब हर कोई एक ही सवाल कर रहा है कि शशिकला ने अचानक अपने को चुनाव से दूर रखने का फैसला क्यों ले लिया। जितने मुंह, उतनी बात। कोई कह रहा है कि भाजपा और केंद्रीय एजंसियों के दबाव में उन्होंने इरादा बदला तो कोई कह रहा है कि अभी उनकी सेहत ठीक नहीं है। वे कोरोना सक्रंमित भी तो गईं थी।

उधर दिनाकरण के करीबी सूत्रों से मैदान छोड़ने के पीछे सोची समझी रणनीति बताई जा रही है। शशिकला मान चुकी हैं कि इस बार चुनाव में द्रमुक की जीत तय है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भी यही संकेत दे चुके हैं। लोकसभा चुनाव में भी देशव्यापी मोदी लहर के बावजूद तमिलनाडु की 39 में 38 सीटें द्रमुक गठबंधन ने ही जीती थी। हार के कारण अन्नाद्रमुक में फूट पड़ेगी। उसी मौके का इंतजार करेंगी शशिकला। तब न पलानीस्वामी उन्हें अन्नाद्रमुक पर दावेदारी से रोक पाएंगे और न पनीरसेल्वम।

यक्ष प्रश्न
भाजपा आलाकमान ने उत्तराखंड में अपने नेतृत्व को अचानक ताश के पत्तों की तरह फेंट दिया। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में साफ नजर आ रही पराजय के मद्देनजर एक साल से सुलग रही आग का तीन दिन में पटाक्षेप हो गया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को तो अपनी कुर्सी गवानी ही पड़ी, उनके सबसे चहेते माने जाने वाले मंत्री मदन कौशिक को भी सत्ता से बाहर होना पड़ा। हालांकि पार्टी की सूबेदारी मिलने से कौशिक को उस तरह का घाटा नहीं हुआ, जैसा त्रिवेंद्र सिंह रावत को।

लगता है कि चार साल सत्ता का सुख भोगने का अवसर देने वाले अपने आलाकमान से त्रिवेंद्र सिंह कुछ ज्यादा ही नाराज हैं। न होते तो पद से हटाए जाने की वजह पूछने पर पत्रकारों से कतई न कहते कि वजह बताएंगे दिल्ली वाले। आशय शिखर नेतृत्व की तरफ था। उन्हें हटाए जाने के कारण हर कोई अपने हिसाब से बता रहा है। कोई गैरसैण को नया मंडल बनाने और कुमाउं मंडल की भौगोलिक संरचना से छेड़छाड़ को कारण बता रहा है तो कोई पार्टी के विधायकों, सांसदों और मंत्रियों की नाराजगी और अफसरशाही के बोलबाले के कारण उन पर गाज गिरना मान रहा है। त्रिवेंद्र सिंह राजपूत हैं। उनके उत्तराधिकारी तीरथ सिंह रावत भी राजपूत ही हैं।

जातीय समीकरण बिठाने के लिए ब्राह्मण बंशीधर भगत को सूबेदार बना रखा था। अब उनकी जगह आए मदन कौशिक भी ब्राह्मण हैं। फर्क बस इतना है कि पहली बार सूबे के मैदानी क्षेत्र का कोई नेता पार्टी का सूबेदार बना है। तीरथ सिंह रावत की छवि भले मानुष की है। वे भुवनचंद्र खंडूरी के खास रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह की तरह ही उनकी पृष्ठभूमि भी संघी है। मुख्यमंत्री बदलने का नफा नुकसान तो चुनाव के बाद ही समझ आएगा पर फिलहाल यक्ष प्रश्न यही है कि लोकसभा के सदस्य होने के कारण तीरथ सिंह रावत को छह महीने के भीतर विधानसभा उप चुनाव लड़ना होगा। पिछले चुनाव में उनका टिकट काट पार्टी ने कांगे्रस से आए सतपाल महाराज को उनकी चैबटटाखाल सीट से उम्मीदवार बना दिया था। सतपाल महाराज ने तीरथ सिंह के लिए सीट छोड़ने से इनकार कर दिया है। हालांकि बद्रीनाथ के विधायक ने सीट छोड़ने की पेशकश कर उन्हें एक विकल्प तो दे ही दिया है।

दिखाया दम
पार्टी आलाकमान की मनाही के बावजूद आठ मार्च को भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने अपना 68वां जन्मदिन धार्मिक यात्रा के बहाने अपनी सियासी ताकत दिखाते हुए मनाया। पार्टी के सूबेदार सतीश पूनिया और वसुंधरा की अदावत को दूर कराने के लिए जेपी नड्डा ने पिछले हफ्ते जयपुर का दौरा भी किया था। पर वसुंधरा ने साफ कर दिया कि वे सूबे की सियासत में ही सक्रिय रहेंगी। लोकसभा चुनाव की हार के बाद बेशक वे डेढ़ साल चुपचाप पार्टी की गतिविधियों को देखती रहीं। जन्मदिन पर धार्मिक यात्रा की शुरुआत रविवार को भरतपुर से हुई थी। जहां वसुंधरा ने एक जनसभा को भी संबोधित किया।

भाजपा के लिए अपनी मां के योगदान और राष्ट्रवाद की याद दिलाई और कहा कि वे सूबे की कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकेंगी। हैरानी की बात तो यह रही कि भाजपा के अनेक विधायक विधानसभा सत्र में शामिल होने की पार्टी नेतृत्व की हिदायत की परवाह न कर वसुंधरा की धार्मिक यात्रा में शामिल हुए। वसुंधरा ने कहा कि यह उनका शक्ति प्रदर्शन नहीं, समर्पण का प्रदर्शन है। उन्होंने सभी समुदायों के लिए धर्मनीति पर चलने का संकल्प भी दोहरा दिया। संकेत साफ था कि उन्हें हाशिए पर धकेलने के मंसूबे पालने वाले किसी खुशफहमी में न रहें। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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