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राजपाट: गहराता संकट

मध्यप्रदेश और गुजरात में पार्टी के विधायक एक-एक कर भाजपा का रुख कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में जहां कांग्रेस के नेताओं की अपनी चूकों से सरकार चली गई वहीं गुजरात में विधायकों का टूटना चिंता की बात है।

राजपाटकांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और जनता दल (यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार।

देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के भविष्य को लेकर अब हर कोई सवाल उठा रहा है। राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद पार्टी में बिखराव और टूट लगातार बढ़ी है। सत्तारूढ़ भाजपा से भिड़ने की रणनीति बनाने के बजाए पार्टी के नेता आपस में ही आरोप प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं। इस रवैये ने इस धारणा को अब आम बना दिया है कि न तो कांग्रेस भाजपा का विकल्प बन सकती है और न राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का। पार्टी के यथा स्थितिवादी रुख से भी हताशा और निराशा का माहौल घना हुआ है।

एक तरफ भाजपा नगर निगम जैसे चुनाव को भी पूरी ताकत और शिद्दत से लड़ रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस राजस्थान तक में भी पंचायत चुनाव में भाजपा से पिछड़ गई। भाजपा ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनाव के लिए रात दिन एक कर रखा है तो कांग्रेस में अभी तक इन दोनों राज्यों को लेकर सुगबुगाहट तक भी नजर नहीं आ रही। भाजपा 2022 के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव के लिए अभी से सक्रिय हो चुकी है तो कांग्रेस को इन सूबों से जैसे कोई सरोकार नहीं।

मध्यप्रदेश और गुजरात में पार्टी के विधायक एक-एक कर भाजपा का रुख कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में जहां कांग्रेस के नेताओं की अपनी चूकों से सरकार चली गई वहीं गुजरात में विधायकों का टूटना चिंता की बात है। दिसंबर 2017 में राहुल गांधी ने गुजरात में अकेले अपने दम पर प्रचार किया था। तभी तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के राज्य में एकबारगी तो भाजपा का दुर्ग दरकने की संभावना दिखने लगी थी। सारा खेल बिगाड़ा था कपिल सिब्बल ने। सुप्रीम कोर्ट में बयान दे डाला कि मंदिर मस्जिद विवाद की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद की जाए।

इसी से भाजपा को यह आरोप लगाने का मौका मिला कि कांग्रेस चाहती ही नहीं कि अयोध्या में राम का मंदिर बने। इस दोषारोपण की जाल में राहुल गांधी नहीं फंसे। नतीजे आए तो भाजपा की चिंता बढ़ी। 182 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 100 के आंकड़े को भी नहीं छू पाई। जबकि कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर अच्छा प्रदर्शन किया था। पर दो साल में पार्टी के भीतर खासी उथल-पुथल हो गई। अब तक बारह विधायक इस्तीफे देकर भाजपा में जा चुके हैं।

उप चुनाव में आठ सीटों में से कांग्रेस एक भी नहीं जीत पाई। अब सूबेदार अमित छाबड़ा और नेता प्रतिपक्ष परेश धनानी दोनों ने इस्तीफा दे दिया है। यानी नेतृत्व में बदलाव होगा। विधायकों की संख्या घटने से राज्यसभा चुनाव में भी दो की बजाए एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। पार्टी के चाणक्य अहमद पटेल के निधन के बाद जैसे गुजरात में अनाथ सी हो गई है कांग्रेस।

खतरे की घंटी
नए कृषि कानूनों के विरोध में उत्तर भारत के किसान धरना तो दिल्ली में दे रहे हैं पर चिंता उत्तराखंड भाजपा की बढ़ गई है। सूबे के मैदानी इलाकों में सिखों की खासी तादाद है। ज्यादातर किसान हैं। रायवाला, डोईवाला, हरिद्वार और उधमसिंहनगर में सिख किसानों की तादाद इतनी है कि वे विधानसभा की कम से कम तीस सीटों को प्रभावित करते हैं। पिछले दो दशक से सूबे के सिखों का रुझान भाजपा के साथ रहा है। पर अब किसान आंदोलन को जिस तरह सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ से बदनाम करने की कोशिश हो रही है, उसका खमियाजा 2022 के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।

सिख किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी दिखाने का सोशल मीडिया पर जिस अंदाज में सुनियोजित प्रयास हुआ है, उसके दूरगामी नतीजे देश के लिए भी अच्छे नहीं होंगे। मैदानी इलाकों में ही नहीं उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में भी किसान नाराज दिखते हैं। तभी तो पिथौरागढ़ जिला पूरी तरह बंद रहा। गनीमत है कि भाजपा नेताओं की आंख जल्दी खुल गई और वे किसान आंदोलन की काट में कूद पड़े हैं। मौके का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस किसानों के समर्थन में कूद पड़ी है। उसने भारत बंद का भी समर्थन कर दिया।

बेचैनी नीकु की
सुशील मोदी दिल्ली गए तो बिहार में भाजपा का कोई कद्दावर चेहरा दिखना ही बंद हो गया। कहने को तो तार किशोर प्रसाद और रेणु देवी दोनों ही उपमुख्यमंत्री हैं। पर अभी तो नीतीश कुमार दोनों को ही खास भाव नहीं दे रहे। पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछा था कि वे अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कब करेंगे। नीतीश ने तपाक से जवाब दिया कि जब भाजपा कहेगी तब। इससे एक तरफ तो उनकी बेचारगी झलकी दूसरी तरफ यह साफ हुआ कि देरी भाजपा की तरफ से हो रही है। विधानसभा की संख्या 243 है। पंद्रह फीसद के हिसाब से कुल 36 मंत्री हो सकते हैं।

मेवालाल आर्य के इस्तीफे के बाद बचे हैं केवल चौदह। नीतीश का जवाब संजय जायसवाल को चुभ गया। तभी तो प्रतिक्रिया दे डाली कि भाजपा जल्दबाजी में फैसले नहीं करती। हकीकत तो यह है कि भाजपा साझा सरकार में अपनी हैसियत के हिसाब से अपना वर्चस्व चाहती है। नीतीश इस बार डरे हुए हैं। अपनी खोई जमीन को पुख्ता कर संभलने की कोशिश में हैं। पिछले दिनों उपेंद्र कुशवाहा से मिले थे। बसपा और कांग्रेस के विधायकों तक से जद (एकी) के नेता की मुलाकात का विश्लेषण किया जा रहा है। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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