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राजपाटः पेच फंसा है जात का

जाटों की आबादी सूबे में करीब 27 फीसद है। जाट लॉबी का तर्क है कि गैरजाट मनोहर लाल को मुख्यमंत्री बनाने का पार्टी को पिछले चुनाव में नुकसान हुआ। जहां 2014 में पार्टी किसी चेहरे के बिना चुनावी जंग में उतरी थी तो उसे 90 में से 47 सीटों पर सफलता मिली थी।

हरियाणा में भाजपा का नया सूबेदार कौन होगा, इसे लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

हरियाणा में भाजपा का नया सूबेदार कौन होगा, इसे लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के बुधवार के दिल्ली-दौरे के बाद चर्चा गरम रही कि जेपी नड्डा इस बाबत फैसला जल्द करने के मूड में हैं। संभव है मौजूदा सूबेदार सुभाष बराला के परिवार में होने वाले विवाह समारोह का इंतजार हो। शनिवार को बराला के पुत्र का और एक दिन बाद रविवार को पुत्री का विवाह समारोह होने वाला है। पर फैसले में देरी का असली पेच दूसरा है। पार्र्टी आलाकमान तय नहीं कर पा रहा है कि सूबेदारी किसी जाट नेता को सौंपे या गैर जाट को। जाटों की आबादी सूबे में करीब 27 फीसद है। जाट लॉबी का तर्क है कि गैरजाट मनोहर लाल को मुख्यमंत्री बनाने का पार्टी को पिछले चुनाव में नुकसान हुआ। जहां 2014 में पार्टी किसी चेहरे के बिना चुनावी जंग में उतरी थी तो उसे 90 में से 47 सीटों पर सफलता मिली थी। जबकि 2019 में मनोहर लाल के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया तो कामयाबी महज 40 सीटों पर मिल पाई।

पर इसी नतीजे का विश्लेषण भाजपा को बराला की जगह फिर किसी जाट को ही सूबेदार बनाने से रोक रहा है। पार्टी को लगता है कि जाट मतदाता या तो कांग्रेस के साथ हैं या दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के साथ। तभी तो कांग्रेस 31 और जजपा 10 सीटों पर जीत गई। लिहाजा सूबेदारी किसी गैरजाट को सौंपने से नया जनाधार मजबूत हो सकता है। प्रभारी महासचिव डाक्टर अनिल जैन की भूमिका अहम होगी। जाट नेताओं में सूबेदारी की दौड़ में पूर्व मंत्री कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ के अलावा महिपाल सिंह ढांडा भी शामिल हैं। सूबेदारी पर निगाह पूर्व मंत्री और पूर्व सूबेदार रामविलास शर्मा की भी टिकी है।

मनोहर लाल ठहरे खत्री। सो गैरखत्री दावेदारों में शर्मा के अलावा संदीप जोशी और कृष्णपाल गुर्जर के नाम भी लिए जा रहे हैं। रही जाटों की बात तो मनोहर लाल मंमिमंडल में वे एक तिहाई हैं। उपमुख्यमंत्री दुष्यंत जजपा के और उनके चाचा रणजीत सिंह भले निर्दलीय हैं पर हैं तो जाट। जेपी दलाल और कमलेश ढांडा भी जाट हैं। लेकिन जाट लॉबी पार्टी आलाकमान को बरोड़ा सीट के उपचुनाव का हवाला दे रही है। जहां पिछले साल विजयी हुए कांग्रेस के श्रीकृष्ण हुड्डा का निधन हो चुका है। इस उपचुनाव में जाट मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

राजपाटः चक्रव्यूह में रामदेव

पथरीली राह
राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के नतीजे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस के संख्या बल के अनुरूप ही रहे। क्रास वोटिंग का हल्ला तो खूब मचा पर हुई नहीं। तो क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सुनियोजित रणनीति के तहत यह आरोप लगाया था कि भाजपा उनके विधायकों पर डोरे डालने की कोशिश कर रही है। दो सौ सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 107 विधायक हैं। भाजपा के अपने 72 और बेनीवाल की पार्टी के तीन विधायकों का उसे समर्थन है। न्यूनतम 51 विधायकों की जरूरत थी एक उम्मीदवार जिताने को। ऐसे में 75 विधायकों के बल पर विपक्षी भाजपा ने दो उम्मीदवार कुछ सोचकर ही उतारे होंगे। शुरू में तो इकलौते राजेंद्र गहलोत ही थे। ओंकार सिंह लखावत के नाम की घोषणा तो बाद में की। भाजपाई खरीद फरोख्त के आरोप को नकार रहे हैं। उनका कहना है कि कुछ निर्दलियों के अलावा कांग्रेसी विधायकों ने भी समर्थन के संकेत दिए थे। इससे गहलोत डर गए और उन्होंने अपने विधायकों को एक रिसोर्ट में कैद कर दिया। भाजपा तो यही साबित भी करना चाहती थी कि गहलोत सरकार अपनी स्थिरता को लेकर बेफिक्र नहीं है। रही गहलोत की बात तो वे सियासी जादूगर माने जाते हैं।

सोनिया गांधी पर अपने सियासी प्रबंधन से जादू कर रखा है। खरीद-फरोख्त का शोर मचा दोहरा लाभ हासिल किया। एक तरफ अपना लोहा मनवाया, दूसरी तरफ पार्टी में अपने विरोधी सचिन पायलट को दिखा दिया कि हर फन में माहिर हैं। लेकिन अभी असली परीक्षा बाकी है। सचिन पायलट से पार्टी की सूबेदारी लेकर अपने किसी भरोसेमंद को दिला पाना और डेढ़ साल से मंत्री पद की बाट जोह रहे पूर्व बसपाई व निर्दलीय विधायकों के असंतोष पर नियंत्रण रख पाना। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ने सचिन पायलट को भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह चलाने के जतन छोड़े नहीं है।

प्रस्तुतिः अनिल बंसल

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