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राजपाटः दूर की कौड़ी

अनुभव और वरिष्ठता को मापदंड मानें तो भाजपा में ज्यादातर नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत से वरिष्ठ हैं। सतपाल महाराज हों या विजय बहुगुणा, मदन कौशिक हों या रमेश पोखरियाल निशंक, सब कद्दावर ठहरे। बीमार न पड़े होते तो त्रिवेंद्र सिंह रावत पर तो अनिल बलूनी ही भारी पड़ जाते।

Author Published on: June 20, 2020 5:57 AM
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलने की अटकलें एक बार फिर तेज हो गई है।

छोटा सूबा जरूर है पर सियासी उठापटक के मामले में बेहद सक्रिय है उत्तराखंड। तभी तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलने की अटकलें एक बार फिर तेज हो गई है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल यों तो फरवरी 2022 तक है और सदन में सत्तारूढ़ भाजपा का बहुमत भी दो तिहाई से ज्यादा है। यही तो पेंच भी है कि सरकार को तो कोई खतरा नहीं और विपक्ष को लेकर मुख्यमंत्री पूरी तरह निश्ंिचत हैं। टांग तो उनकी गैर नहीं अपने ही खींच रहे हैं। अनुभव और वरिष्ठता को मापदंड मानें तो भाजपा में ज्यादातर नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत से वरिष्ठ हैं। सतपाल महाराज हों या विजय बहुगुणा, मदन कौशिक हों या रमेश पोखरियाल निशंक, सब कद्दावर ठहरे। बीमार न पड़े होते तो त्रिवेंद्र सिंह रावत पर तो अनिल बलूनी ही भारी पड़ जाते। राज्यसभा सदस्य हैं बलूनी। पार्टी के भरोसेमंद। नई भाजपा के ब्राह्मण चेहरे। दिल्ली दरबार और संघ के गलियारों में माहौल बनाया जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत से सूबे के लोग खुश नहीं हैं। उन्हें आलाकमान ने हटाया नहीं तो अगले चुनाव में कांग्रेस की बल्ले-बल्ले तय है। मुख्यमंत्री विरोधी खेमा तो दावा कर रहा है कि कोरोना का संक्रमण नहीं हुआ होता तो अब तक रावत की छुट्टी हो चुकी होती। हरिद्वार के विधायक और रावत सरकार में मंत्री मदन कौशिक दौड़ में शामिल बताए जाते हैं। मिलनसार कौशिक लगातार चौथी बार विधायक हैं। जनाधार भी कम नहीं। संघ परिवार से भी नजदीकी है उनकी। नित्यानंद स्वामी को छोड़ उत्तराखंड में अभी तक मैदानी क्षेत्र से कोई और मुख्यमंत्री नहीं बना। कौशिक की लाटरी खुली तो वे मैदान से दूसरे मुख्यमंत्री होंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर तो अटकलें ही हैं पर 31 जुलाई के बाद सूबे को नौकरशाही का तो नया प्रमुख मिलना तय है क्योंकि मौजूदा मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह रिटायर हो जाएंगे।

आस पुनर्वास की
डेढ़ साल से भी ज्यादा समय से अच्छे दिन की बाट जो रहे हैं राजस्थान के कई विधायक। आधा दर्जन तो पूर्व बसपाई ही हैं, जो पाला बदल कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सूबे की कांग्रेसी सरकर को भयमुक्त बनाने में योगदान किया था। उसके बाद ही तो दो सौ सदस्यों के सदन में कांग्रेस की ताकत 107 सदस्यों की हुई थी। कांग्रेस में शामिल होने के उनके फैसले ने गहलोत को निर्दलीय विधायकों के दबाव और ब्लैकमेलिंग से मुक्ति दे दी थी। तो भी राज्यसभा चुनाव में एक सदस्य जिताने की हैसियत के बावजूद भाजपा ने दो उम्मीदवार मैदान में उतार कर कांग्रेसी खेमे में खलबली तो मचा ही दी। इस बहाने मुख्यमंत्री ने उनकी मिजाजपुर्शी तो की। भला हो राज्यसभा चुनाव का अन्यथा कोरोना की महामारी ने तो मंत्री पद पाने के मंसूबों पर पानी ही फेर दिया था। अब फिर आस जगी है कि राज्यसभा चुनाव निपटने के बाद मुख्यमंत्री उन्हें भी सत्ता सुख में हिस्सेदारी देंगे। भाजपा कांग्रेसी खेमे में सेंध लगा पाती इससे पहले ही चौकस गहलोत ने अपने विधायकों को एकांतवास में तो भेजा ही, भाजपा पर खरीद-फरोख्त की कोशिश का आरोप भी लगा दिया। मध्यप्रदेश और गुजरात की तरह भाजपा राजस्थान में अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाई। कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने एक तरफ तो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से शिकायत की, दूसरी तरफ गहलोत ने हरियाणा से राजस्थान आने वाले तमाम रास्तों पर पुलिस चेकिंग बढ़ा दी। उन्हें भनक मिली थी कि विधायकों की खरीद फरोख्त के लिए करोड़ों का काला धन भाजपा शासित राज्य हरियाणा के रास्ते ही जयपुर पहुंचेगा। राज्यसभा चुनाव में चौकसी और कुशल प्रबंधन से गहलोत खतरा टालने में बेशक सफल हो जाएं पर असंतुष्ट विधायकों को मलाईदार कुर्सी तो उन्हें देनी ही होंगी। -(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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