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वक्त का फेर

भाजपा से नाता तोड़ने के नीतीश के फैसले का विरोध किया तो केसी त्यागी नीतीश के पैरोकार बन उनके ही विरोध में सामने आ गए हैं।
Author August 28, 2017 05:38 am
पटना के गांधी मैदान में आरजेडी की भाजपा भगाओ, देश बचाओ रैली में लालू यादव और राबड़ी देवी शरद यादव का अभिवादन करते हुए (फोटो-पीटीआई)

राजनीति में कोई किसी का सदा सगा नहीं रहता। शरद यादव और केसी त्यागी की दशकों पुरानी जोड़ी टूटी तो यह जुमला फिर खरा साबित हुआ। त्यागी यों उत्तर प्रदेश के हैं और शरद यादव मध्य प्रदेश के जबलपुर इलाके के। यह बात अलग है कि वे आपातकाल के बाद से तो सियासत उत्तर प्रदेश और बिहार की ही करते रहे हैं। दोनों एक दौर में चौधरी चरण सिंह के चेले थे। केसी त्यागी 1989 में गाजियाबाद से जनता दल उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीत कर एक बार ही लोकसभा में पहुंच पाए। हालांकि बीच में वे कुछ दिन मुलायम सिंह यादव के साथ भी रहे। पर संसद में दोबारा पहुंचने का मुहूर्त नहीं बन पाया। 2004 में भाजपा ने जनता दल (एकी) के लिए अपनी मेरठ सीट छोड़ दी थी। लेकिन केसी त्यागी यहां भी सफल नहीं हो पाए थे। निराशा के दौर में काम शरद यादव ही आए। जब 2013 में उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार से नाता तोड़ कर अपनी अलग पार्टी रालोसपा बनाई तो राज्यसभा सीट से भी इस्तीफा दे दिया।

तब शरद यादव ने नीतीश को रजामंद कर इस खाली सीट के उपचुनाव में केसी त्यागी को उम्मीदवार बनवाया। वे राज्यसभा आए और तीन साल का कार्यकाल पा गए जो पिछले साल खत्म भी हो गया। लालू यादव के साथ महागठबंधन से शरद यादव की तरह शुरू में वे भी खुश नहीं थे। लेकिन अब शरद ने भाजपा से नाता तोड़ने के नीतीश के फैसले का विरोध किया तो केसी त्यागी नीतीश के पैरोकार बन उनके ही विरोध में सामने आ गए हैं। वैसे भी भाजपा नेताओं से उनके निजी रिश्ते तो मधुर ही थे। लिहाजा जनता दल (एकी) भाजपा के साथ आया तो त्यागी को अपना भविष्य शरद यादव के साथ अंधकारमय लगा होगा। पर चौंकाने वाली बात दूसरी है। कल तक जो त्यागी शरद यादव की किसी बात का प्रतिवाद नहीं कर पाते थे अब वे ही उन्हें चिट्ठी लिख कर राजनीति की मर्यादाओं और आदर्शों की नसीहत दे रहे हैं।

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