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राजपाट: बेटे पर नाज, दीदी का पलटवार

तेजस्वी यादव की सियासत में सूझबूझ क्या वाकई बढ़ रही है। वे दावा तो यही कर रहे हैं।

Author March 27, 2017 5:46 AM
तेजस्वी यादव। (फाइल फोटो)

बेटे पर नाज
तेजस्वी यादव की सियासत में सूझबूझ क्या वाकई बढ़ रही है। वे दावा तो यही कर रहे हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं तेजस्वी। राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू यादव के छोटे बेटे। आजकल मीडिया की सुर्खियों में दिखने लगे हैं। वजह है सुनियोजित संवाद। बिहार दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठा दी। प्रधानमंत्री को उन्हीं का वादा याद दिलाया कि कैसे लोकसभा चुनाव के वक्त उन्होंने खुद इस मांग को पूरा करने की बात कही थी। बिहार के लोगों ने उनकी बात पर भरोसा कर उन्हें बंपर बहुमत दिया था। लेकिन उनकी सरकार आए तीन साल बीत चुके हैं। तो भी विशेष राज्य की मांग को पूरा नहीं किया अब तक उन्होंने। तेजस्वी ने मोदी को आगाह भी कर दिया कि अगले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता उनका सूपड़ा साफ कर देगी। विशेष राज्य का दर्जा नीतीश और उनकी पार्टी की भी प्रमुख मांग रही है। जिस समय केंद्र में यूपीए सरकार थी और लालू यादव रेलमंत्री थे नीतीश ने तब भी उठाई थी यह मांग। बेशक तब वे भाजपा के साथ गठबंधन में थे। लालू ने तब इस मांग पर ही सवाल उठा दिया था। पर वक्त के साथ सियासत भी बदलती है। तभी तो उन्हीं लालू का लाडला अब विशेष राज्य की मांग कर रहा है। बेटे की बढ़ती परिपक्वता लालू के आनंद का कारण बन रही है। वे करीबियों से मन की बात कह भी रहे हैं कि तेजस्वी अब पक्का नेता हो गया है।
दीदी का पलटवार
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए अब न तो वामपंथी बड़ी चुनौती रह गए हैं और न कांग्रेस उसे परास्त करने की हैसियत में बची है। ममता को तो खतरा अब भाजपा और आरएसएस से दिख रहा है। लोकसभा चुनाव में सीट बेशक भाजपा को दो ही मिल पाई थी पर वोट में हिस्सेदारी इस पार्टी ने खासी बढ़ाई थी। अब संघ के स्कूलों के पाठ्यक्रम के मुद्दे पर टकराव बढ़ा है। तृणमूल सरकार में संघ लारा संचालित सवा सौ स्कूलों से नोटिस भेज कर जवाब मांगा है। उन पर धार्मिक असहिष्णुता का पाठ पढ़ाने और इसे बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर संघ ने इस आरोप को सिरे से नकार दिया है। ऊपर से सुझाव अलग दे दिया कि सरकार उसके स्कूलों के बजाए तेजी से बढ़ रहे मदरसों और मिशनरी स्कूलों पर अंकुश लगाए। दरअसल ममता सरकार ने संघी स्कूलों से अपने पाठ्यक्रम की सूची स्कूली शिक्षा विभाग के हवाले करने को भी कहा है। तभी तो समीक्षा कर पाएगी सरकार। ऊपर से राज्य शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम का पालन करने की नसीहत अलग दी है। माकपा के विधायक मानस मुखर्जी ने पिछले दिनों विधानसभा में उठाया था यह मुद्दा। उसके बाद ही ममता सरकार हरकत में आई। जिन स्कूलों को नोटिस गए हैं उनमें से ज्यादातर कूच बिहार, उत्तर दिनाजपुर, नदिया और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों के ग्रामीण इलाकों के हैं। सूबे के स्कूली शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने धमकी दी है कि धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने खुलासा किया है कि नोटिस वाले 96 स्कूलों ने तो राज्य सरकार से एनओसी तक नहीं ली है। पर संघ के प्रवक्ता ने फरमाया है कि उनके स्कूलों का विरोध पहले वाममोर्चे की सरकार ने किया था। अब ममता सरकार भी उसी राह पर चल रही है। संघी तो ममता सरकार पर पश्चिम बंगाल को बांग्ला देश बनाने की कोशिश में लिप्त रहने तक का आरोप लगा रहे हैं।

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