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राजपाटः सत्ता की भूख

औरों से भिन्न प्रचारित करती रही है भाजपा खुद को। पर हकीकत में ऐसा कहीं नहीं दिखता। तभी तो लोग चोर-चोर मौसेरे भाई कहने लगे हैं अब देश के सियासी दलों को। भाजपा भी सत्ता को ही अपना अंतिम लक्ष्य बना कर सियासत करने लगी है। दल बदलुओं को तरजीह देने का मकसद ही सीमित […]

Author नई दिल्ली | Updated: October 31, 2017 9:41 PM

औरों से भिन्न प्रचारित करती रही है भाजपा खुद को। पर हकीकत में ऐसा कहीं नहीं दिखता। तभी तो लोग चोर-चोर मौसेरे भाई कहने लगे हैं अब देश के सियासी दलों को। भाजपा भी सत्ता को ही अपना अंतिम लक्ष्य बना कर सियासत करने लगी है। दल बदलुओं को तरजीह देने का मकसद ही सीमित है कि येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाओ। असम में दल बदलुओं के बूते उसने सत्ता हासिल कर भी ली। सो, यही चस्का अब दूसरे सूबों में भी लग गया है पार्टी को। उत्तराखंड में तो उसने सारी सीमाएं ही तोड़ दी। उत्तर प्रदेश से अलग राज्य उत्तराखंड केंद्र की वाजपेयी सरकार ने ही बनाया था। पहली अंतरिम सरकार भी भाजपा की ही बनी थी सूबे में। अच्छा तो यही होता कि वह सरकार अपने काम के बूते ऐसी छवि बनाती कि किसी दल-बदलू की जरूरत ही न पड़ती चुनाव जीतने के लिए। लेकिन काम के बल पर बात बनती नहीं दिखी तो दल-बदल कर सहारा ले लिया। हरीश रावत सरकार को गिराने के खेल में शामिल हो गई। अदालती तमाचे ने सारा घमंड चूर-चूर कर दिया। लेकिन कांग्रेस के जिन विधायकों को तोड़ा था और जिनकी सदस्यता इस चक्कर में खत्म हो गई उन्हें तो गले लगाना मजबूरी हो गया। सोचा भी नहीं होगा कि गैरों को अपनाने के चक्कर में अपने रूठ जाएंगे। उम्मीदवारों के नामों के एलान के साथ ही बगावत का सिलसिला शुरू हो गया है। बाहरी बनाम प्रतिबद्ध की जंग सड़कों पर दिख रही है। भगत सिंह कोश्यारी, भुवनचंद खंड़ूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे तीन पूर्व मुख्यमंत्री होते हुए भी कांग्रेस से आए सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत ज्यादा प्यारे हो गए हैं अमित शाह के लिए। और तो और पाला बदल कर अचानक पार्टी में आने वाले कांग्रेस के दलित नेता यशपाल आर्य को थाली में परोस कर एक के बजाए दो टिकट थमा दिए। एक उनके बेटे के लिए बतौर बोनस। अब तो नारायण दत्त तिवारी भी अछूत नहीं रहे पार्टी के लिए। आखिर पर्वतीय राज्य का सबसे कद्दावर ब्राह्मण चेहरा ठहरे। उनके जैविक पुत्र रोहित शेखर को उम्मीदवार बना रही है पार्टी। साफ है कि कुछ भी करना पड़े, सत्ता मिलनी चाहिए। इस चक्कर में पिछले साल तक पार्टी के सूबेदार रहे तीरथ सिंह रावत का चौबट्टा खाल से टिकट काट दिया। ओम गोपाल रावत, शैलेंद्र रावत और सुरेश जैन जैसे पुराने नेताओं की सीटें दल बदलुओं को तोहफे में दे दी। यमकेश्वर से जीत की हैट्रिक लगाने वाली विजय बड़थ्वाल को समझ ही नहीं आया कि उन्होंने क्या गुनाह कर दिया। उनका टिकट काट कर खंड़ूÞड़ी की बेटी ऋतु को दे दिया। बीस से ज्यादा सीटों पर बगावत हो गई है उम्मीदवारों के चयन को लेकर पार्टी में। अपनों को छोड़ गैरों को सिर पर बैठाने की यही भयंकर भूल उत्तर प्रदेश में की थी पार्टी ने। जब सरकार बचाने के लिए बसपा और कांग्रेस के दागियों को तोड़ कर थोक के भाव मंत्री बना दिए थे। न चेहरे की परवाह की और न चाल की। नीति-सिद्धांतों से बेखबर उन मंत्रियों की करतूतों का ही अंजाम 2002, 2007 और 2012 के तीन विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा। 1991 में पूर्ण बहुमत लाने वाली पार्टी 48 पर सिमट कर रह गई। देखना है कि उत्तराखंड में सत्ता की यह प्यास पार्टी का क्या हश्र करेगी?
उलटा पड़ा दांव
पुरानी कहावत है कि किसी भी मुद्दे पर आगा-पीछा सोच कर ही आदमी को अपना नजरिया तय करना चाहिए। अन्यथा अपना चला दांव कई बार खुद पर ही भारी पड़ जाता है। कुछ ऐसी ही विपदा आन पड़ी है आजकल दीदी पर। दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। जमीन अधिग्रहण के वाममोर्चे की सरकार के खिलाफ आंदोलन की अगुआई से सत्ता में आई थीं ममता। अब दक्षिण चौबीस परगना जिले में वैसे ही एक आंदोलन ने नाकों चने चबवा दिए हैं उन्हें। ऊपर से इस आंदोलन में माओवादियों के कूद पड़ने की खबरों से अलग नींद उड़ गई है सरकार की। एक बिजलीघर के लिए किया गया है जमीन का अधिग्रहण। पर किसान उसका विरोध कर रहे हैं। पुलिस की फायरिंग में दो लोगों की मौत भी हो चुकी है। इससे विरोधी दलों को ममता पर वार करने का मौका मिल गया। कथनी और करनी में भेद भी जाहिर हुआ है इस प्रसंग से। दावा तो ममता शुरू से यही करती रही हैं कि खेती की जमीन का जबरन अधिग्रहण वे हरगिज नहीं करेंगी। पर भांगड़ इलाके में 2013 में सोलह एकड़ जमीन का अधिग्रहण विवाद का मुद्दा बन गया है। बिजली घर का निर्माण तो करीबन पूरा हो गया बस हाईटेंशन तारों के लिए खंभे गाड़ने बाकी हैं। उसके लिए भी तो जमीन चाहिए। इलाके के लोग इसी अतिरिक्त अधिग्रहण के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। गनीमत है कि मौके की नजाकत भांप ममता ने फिलहाल परियोजना का काम रोक दिया है। ऊपर से यह भरोसा भी देने को मजबूर हुई हैं कि जरूरी होगा तो इस बिजली घर को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाएगा। फिलहाल सीआइडी कर रही फायरिंग की घटना की जांच। पुलिस ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया है कि फायरिंग तो भीड़ ने की थी। इसी आधार पर सरकार ने इस हिंसा ठीकरा माओवादियों और बाहरी तत्वों के सिर फोड़ दिया है। पर विपक्ष इससे संतुष्ट क्यों होता? वह तो डंके की चोट कह रहा है कि सिंगूर और नंदीग्राम में जो बोया था उसी को काट रही हैं अब ममता। लोगों की नाराजगी से बेचैन ममता ने अब नुकसान की भरपाई की कवायद छेड़ दी है। यह बात अलग है कि निवेशकों के बीच तो गलत संदेश चला ही गया। जबकि सूबे में विकास के लिए निवेश बढ़ाना ही है ममता का सबसे बड़ा एजंडा।
असंतोष का लावा
बड़ा बहुमत किसी पार्टी के लिए जितना सुकून लाता है बाद में उतना ही सिरदर्द भी बढ़ा देता है। राजस्थान में भाजपा इसी की शिकार है। पिछले विधानसभा चुनाव में लोगों ने छप्पर फाड़ बहुमत दे दिया था पार्टी को। दो सौ में से 160 से ज्यादा सीटें जीत कर नया इतिहास रचा था वसुंधरा राजे ने। खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं पार्टी के ज्यादातर पुराने विधायक। सबसे कद्दावर घनश्याम तिवाड़ी तो शुरू से असंतुष्ट हैं। अपनी ही सरकार और संगठन की कार्यशैली पर बेबाकी से टिप्पणी के लिए चर्चित हो गए हैं। उन्हीं की देखा-देखी अब ज्ञान देव आहूजा का धीरज भी चुक गया। अलवर जिले से लगातार चार बार विधानसभा चुनाव तो जीते ही हैं, खांटी संघी के नाते अलग पहचान बना रखी है। विधायक के नाते जितनी सरकारी समितियों और बोर्ड में थे, सभी से इस्तीफा दे दिया है। खांटी संघी माने जाने वाले विधायकों की संख्या दो दर्जन होगी। हाशिए पर हैं बेचारे। संघर्ष से पार्टी को सींचने का क्या इनाम मिला। तिवाड़ी और आहूजा जैसी ही गत है पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी की। संघी खुलेआम आरोप लगा रहे हैं कि सत्ता का मजा भाजपा में गैरसंघी ले रहे हैं। सरकार के तीन साल पूरे हो गए, लेकिन उपलब्धियों के प्रचार से संघी किनारा कर रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री को पीटना पड़ रहा है ढिंढोरा। उनके हिसाब से तो 70 साल में जितना विकास नहीं हुआ उतना तीन साल में हो गया। असंतुष्ट भाजपाई इस दावे को तो सही बताते हैं पर अपने तईं संशोधन के साथ। यानी उन्हें विकास की जगह भ्रष्टाचार शब्द सटीक लगता है। ज्ञानदेव आहूजा भारतीय मजदूर संघ से राजनीति में आए। उनकी नाराजगी को बगावत के रूप में प्रचारित कर रहा है वसुंधरा खेमा। आहूजा की अपनी पीड़ा है। अलवर में जड़ें तो उनकी हैं, पर मुख्यमंत्री ने मलाईदार ओहदे ऐसे लोगों को सौंप दिए जिन्होंने अतीत में भाजपा को कोसने से ज्यादा कुछ नहीं किया। अंदर की बात तो यह है कि आलाकमान के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के चुनाव निपटने का इंतजार कर रहे हैं आहूजा। करीबियों को उसके बाद धमाका करने का संकेत दिया है।
सियासी सूरमा
भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नीतीश कुमार ने भले अपना नजरिया बदल लिया हो पर लालू यादव इस मामले में लकीर के फकीर हैं। भाजपा पर हमले का कोई मौका वे चूकते नहीं। खादी ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर पर नरेंद्र मोदी का फोटू लगाने के बाद उठे विवाद पर वे खामोश कैसे रह सकते थे। पहले इस कैलेंडर पर महात्मा गांधी का फोटू लगाने की परंपरा रही है। लालू भाजपा और मोदी के साथ-साथ आरएसएस को भी घसीट लेते हैं। उन्होंने तपाक से आरोप जड़ दिया कि आरएसएस गांधी के विचारों को खत्म करने पर तुला है। लालू के लिए भाजपा और आरएसएस पर हमला बोलना अब जरूरी हो चुका है। नीतीश के प्रति जो पार्टी नरम रवैया दिखाए और उनके प्रति आक्रामक बनी रहे, वे भी उसके साथ मुरव्वत क्यों दिखाएं। उन्हें बखूबी अंदाज है कि महागठबंधन में फूट डालना ही है आरएसएस और भाजपा का गुप्त एजंडा। आखिर दिल्ली के बाद बिहार में ही तो रोका गया चक्रवर्ती नरेंद्र मोदी का अश्व।
नीतीश कुमार एक मायने में तो नरेंद्र मोदी से भिन्न हैं ही। बाकी बातों में दोनों के बीच समानता है। दोनों की ही छवि साफ-सुथरी है। दोनों ही धुन के पक्के हैं। जो ठान लेते हैं उसे करते जरूर हैं। पर नीतीश एक मायने में अलग हैं। वे औरों की सुनते भी हैं। करें बेशक अपने मन की। मोदी तो किसी की सुनते ही नहीं। शराबबंदी के मामले में भी नीतीश ने इस फर्क को साबित कर दिया। शराबबंदी उनके लिए हठधर्मिता की हद तक मुद्दा है। किसी के विरोध की परवाह नहीं की। अदालती हस्तक्षेप का भी तोड़ निकाल लिया था। हालांकि बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट से रोक लग गई। सूबे में शराबबंदी तो हो गई थी पर शराब कारखाने चालू रहे। इसे लेकर नीतीश की खूब आलोचना हुई। अब एलान कर दिया है कि अप्रैल से इन शराब कारखानों का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। पहले नीतीश को लगा था कि कारखाने बंद होंगे तो उनमें काम करने वाले बेरोजगार हो जाएंगे। पर अब उन्हें खुद महसूस हो गया कि इन कारखानों को बंद करने से विरोधी नुक्ताचीनी नहीं कर पाएंगे। उसके बाद उनके लिए भाजपा शासित राज्यों में भी शराबबंदी के हक में आदेश के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाना आसान होगा। शराबबंदी के मामले में पटना आए मोदी उनकी वाहवाह कर गए थे। इसीलिए नीतीश अब कह रहे हैं कि समाज के हर तबके को नशामुक्त बनाएंगे। वे जानते हैं कि शराब एक सामाजिक बुराई है। इस पर पाबंदी का कोई भी खुल कर विरोध नहीं कर सकता। विरोधियों को चुप्पी साधनी पड़ेगी। इस मुद्दे को वे विधानसभा चुनाव तक जिंदा रखना चाहते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि शराबबंदी के बावजूद शराब का धंधा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। चोरी-छिपे तो आज भी सूबे में शराब आ रही है और बिक भी रही है। हर दिन शराब पकड़ी जाती है और मीडिया में खबरें भी आती हैं, इससे बड़ा और प्रमाण क्या चाहिए?
तुरुप का पत्ता
कांगड़ा को लेकर तेज हो गई है अब सियासत। हिमाचल का सबसे बड़ा जिला है कांगड़ा। भाजपा इसे अपना गढ़ मानती रही है। पर उसे सबसे ज्यादा झटके भी इसी जिले ने दिए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अगर इस जिले से समर्थन मिला होता तो धूमल सरकार का मिशन परवान चढ़ जाता। फिलहाल तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का पूरा ध्यान लगा है कांगड़ा पर। तभी तो धर्मशाला को सूबे की शीतकालीन राजधानी घोषित कर दिया। कांगड़ा जिले का ही शहर है धर्मशाला। धर्मशाला को स्मार्ट सिटी भी बनाएंगे। भले राजधानी शिमला स्मार्टसिटी नहीं बन पाया है। शीतकालीन प्रवास पर सरकार के धर्मशाला जाने की परंपरा भी वीरभद्र ने ही शुरू की थी। अब तो विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी होता है वहीं। बारह सत्र हो चुके हैं अब तक। कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर और चंबा जिलों को नए एलान से फायदा होने की दलील दी जा रही है। कितना फायदा होगा कौन जाने? पर मंत्रिमंडल तो इस फैसले के लिए वीरभद्र की आरती उतार ही रहा है। भाजपा इसे कैसे बर्दाश्त करे। सो, पार्टी के सूबेदार सतपाल सत्ती ने चुप्पी तोड़ दी। फरमाया कि वीरभद्र का चुनावी वर्ष में झूठ बोलने में कोई सान नहीं। उन्होंने अपने पिछले घोषणा पत्र में बेरोजगारी भत्ता देने का वायदा किया था। पर सत्ता में आते ही मुकर गए। ऐसे में मुख्यमंत्री के शगूफों से कौन प्रभावित होगा। पर शीतकालीन राजधानी का एलान कर वीरभद्र ने फिलहाल तो श्रेय लूट ही लिया है।
बोया पेड़ बबूल
सोशल मीडिया अब राजनीतिकों के गले की फांस बनने लगा है। इस पर मनगढ़ंत कुछ भी प्रचारित प्रसारित होने में देर नहीं लगती। जाहिर है कि बड़ी तेजी से साख भी गिरी है इस मीडिया की। हिमाचल जैसे पर्वतीय सूबे की सियासत में भी रंग दिखा रहा है यह मीडिया। मसलन, खबर फैलाई गई है कि सूबे में भाजपा को केवल धूमल ही सत्ता में ला सकते हैं। दरअसल, हिमाचल भाजपा में मुख्यमंत्री की कुर्सी के दावेदार के रूप में अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा भी सामने आए हैं। जब भी उनके बारे में कोई खबर आती है तो सोशल मीडिया आगाह करता है कि नड्डा को चेहरा बनाया तो फिर वीरभद्र ही आ जाएंगे सत्ता में। साफ है कि इस अभियान के पीछे धूमल समर्थकों का असुरक्षा भाव होगा। नड्डा मुख्यमंत्री बन गए तो धूमल परिवार के दौर की समाप्ति ही हो जाएगी। इसीलिए धूमल खेमा आर-पार की लड़ाई के मूड में है। हालांकि नड्डा खेमे के अपने तर्क ठहरे। इनमें सबसे प्रबल तो यही है कि बुजुर्ग वीरभद्र को बुजुर्ग धूमल नहीं कम उम्र के नड्डा शिकस्त दे सकते हैं। अब धूमल पछता रहे होंगे। पिछला लोकसभा चुनाव लड़ लेते तो केंद्र में वे ही मंत्री बनते। पर उन्होंने अपने बेटे अनुराग ठाकुर को ही लड़ाया। जिन पर दोहरी गाज एक साथ आ गिरी। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का पद भी जाता रहा और भाजपा के युवा मोर्चे के तीसरी बार अध्यक्ष भी नहीं बन पाए। इसके इतर नड्डा अपनी गोटियां फिट करते गए। इस नाते वे अगर बाप-बेटे पर भारी साबित हो जाएं तो इसमें उनका तो कोई कसूर नहीं।
सब पर भारी
कांग्रेस के लिए पंजाब में मुफीद साबित हो रहे हैं नवजोत सिद्धू। पाजी के निशाने पर बादल परिवार है। सूबे के बाकी नेता भले बादल परिवार के खिलाफ ज्यादा न बोल पाते हों पर सिद्धू खुल कर वार कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामले में ज्यादा आक्रामक हैं उनके तेवर। भाजपा की भी पोल खोल रहे हैं। कल तक भाजपा में ही थे। आरोप लगा रहे हैं कि बादल परिवार के भ्रष्टाचार की उनकी शिकायत को भाजपा के किसी बड़े नेता ने सुना ही नहीं। उल्टे उन्हें चुप रहने की नसीहत दे डाली। सिद्धू तो नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को भी दिखावा बता रहे हैं। अमृतसर पूर्व की सीट पर अपने चुनाव को अपनी पत्नी नवजोत कौर के हवाले छोड़ दिया है। कांग्रेस जम कर भुना रही है उनका नाम। सिद्धू का लक्ष्य अकाली सरकार को हराने तक सीमित नहीं है। अलबत्ता बादल परिवार को गहरी चोट पहुंचाने का है। यों सिद्धू हास्य का सहारा लेते हैं तो भी श्रोता मन से सुनते हैं उनकी बात। भ्रष्टाचार का मुद्दा बादल परिवार की कमजोर नस है। सिद्धू ने सूबे को दस साल में जम कर लूटने का आरोप लगाया है। आबकारी, पर्यटन और परिवहन को जमकर दुह लिया। शराब के ठेकों का आंकड़ा रट लिया है सिद्धू ने। शराब के धंधे पर बादल परिवार के काबिज होने का आरोप लगा कर सनसनी फैला दी है। सत्ताधारी कुनबे के साम्राज्य का कच्चा चिट्ठा इसी तरह खोलते रहे तो खतरे में पड़ जाएगी बादल परिवार की साख। दिनकर की कविता को अपने तंईं गढ़ लिया है-भाग बादल भाग, पंजाब की जनता आती है।
कठघरे में चौहान
अरुण यादव मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सूबेदार हैं। पिछले हफ्ते पुलिस के लाठचार्ज में वे भी घायल हुए। राज्यमंत्री संजय पाठक का नाम हवाला मामले में उछला तो कटनी में हंगामा हो गया। मुख्यमंत्री शिवराज चौहान पर भी आंच आई। कांग्रेस से भाजपा में पाठक को चौहान ही लाए और उपचुनाव लड़ा कर मंत्री भी बनाया।
हवाला के हवाले ही किया था कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआइ ने प्रदर्शन। यादव घायल हुए तो एक सवाल हर किसी की जुबान पर था। क्या इतने बड़े नेता को भी नहीं पहचानते पुलिस वाले। इसके विरोध में अजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने डीजीपी को ज्ञापन थमाया। एक तो पुलिस ने कांग्रेसियों को लठियाया ऊपर से उनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज कर लिया। अब कांग्रेस के सांसद विवेक तन्खा ने मांग की है कि संजय पाठक और भाजपा सूबेदार नंद कुमार सिंह चौहान इस्तीफा दें। अन्यथा कटनी कांड की निष्पक्ष जांच हो ही नहीं सकती। उधर, कटनी हवाला कांड में प्रवर्तन निदेशालय ने एक्सिस बैंक के एक अफसर के खिलाफ गुरुवार को मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज कर लिया। जबकि हाईकोर्ट ने कटनी के पुलिस कप्तान रहे गौरव तिवारी के तबादले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को तो खारिज किया ही याचिका दायर करने वाले को फटकार और पचास हजार रुपए का जुर्माना भी ठोंक दिया।

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