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राजपाट- जीत न हार, गांधी अवतार में नीकु

पिछले साल जब सूबे में शराबबंदी की थी तो नाम बापू का ही लिया था। कहा था कि बापू पूर्ण शराबबंदी के पक्षधर थे।

Author Updated: April 17, 2017 4:12 AM
नीतीश कुमार

जीत न हार

हाल में हुए विधानसभा की दस सीटों के उपचुनाव में दो सीटें अकेले मध्य प्रदेश की थीं। कांग्रेस और भाजपा दोनों को एक-एक पर सफलता मिल गई। न कोई हारा और न जीता। अटेर सीट कांग्रेस के नेता सत्यदेव कटारे के बेटे हेमंत कटारे ने जीत ली। सत्यदेव के दिवंगत हो जाने के कारण ही यहां उपचुनाव की नौबत आई थी। बांधवगढ़ सीट ज्ञान सिंह ने खाली की जो शहडोल से लोकसभा उपचुनाव जीत गए थे। पर सांसद रहते हुए भी शिवराज चौहान की सरकार में मंत्री बने रहे। सदन का सदस्य हुए बिना कोई छह माह तक मंत्री बने रह सकता है। लेकिन सियासी सूरमा इस प्रावधान का भी अपने हिसाब से उपयोग-दुरुपयोग कर रहे हैं। पंजाब में तेजवंत सिंह को तो एक जमाने में कांग्रेस की सरकार ने छह-छह महीने के लिए लगातार तीन बार मंत्री बना दिया था। इस दौरान वे विधानसभा के सदस्य नहीं हो पाए थे तो क्या? एक-एक दिन का अंतराल कर उड़ाया गया था, संवैधानिक प्रावधान का मखौल। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र के इस मखौल पर चाबुक चला दिया। तेजवंत की दोबारा शपथ को असंवैधानिक तो ठहराया ही था, साथ ही यह व्यवस्था भी दे दी थी कि एक सदन में कोई भी व्यक्ति इस प्रावधान का लाभ महज एक बार ही ले सकता है। विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद भी मंत्री पद का मोह न छोड़ना नेताओं की बेशर्मी की नई परंपरा है। ज्ञान सिंह ने मध्य प्रदेश में पहली बार ऐसा किया हो, यह नहीं है। उत्तर प्रदेश में यही बेशर्मी 2004 में अजित सिंह की चहेती अनुराधा चौधरी ने दिखाई थी। लोकसभा सदस्य बन जाने के कारण विधानसभा की सदस्यता से तो त्यागपत्र देना मजबूरी हो गया था, पर सूबे के सिंचाई मंत्रालय को उन्होंने सांसद रहते हुए भी पूरे छह महीने तक दुह लिया था। ज्ञान सिंह की जगह भाजपा ने बांधवगढ़ में उनके बेटे शिव नारायण को उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करने वाली कैडर आधारित पार्टी का यह नया रूपांतरण है। बहरहाल अब बेटे के विधायक बन जाने के बाद देखना होगा ज्ञान सिंह का रुख। नैतिकता का तकाजा तो यही है कि शिवराज चौहान ज्ञान सिंह को मंत्री पद से तुरंत हटाएं। हालांकि अभी एक महीने तक वे इस कुर्सी का और दोहन कर सकते हैं। चर्चा है कि उन्होंने अब अपना मंत्री पद अपने उपचुनाव जीत कर विधायक बने लाडले सपूत शिव नारायण को देने की लाबिंग शुरू कर दी है। जहां तक अटेर में कांग्रेस की जीत का सवाल है, यों यह पार्टी की अपनी सीट थी तो भी सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को श्रेय तो मिलेगा ही। इससे पहले पांच विधानसभा उपचुनाव हो चुके हैं। कांग्रेस को कहीं भी कामयाबी नहीं मिली। हार-जीत पर स्वस्थ प्रतिक्रिया जताने का रिवाज भी अब खत्म हो चुका है। तभी तो अटेर में कांग्रेस की जीत पर भाजपा के सूबेदार नंद कुमार सिंह चौहान ने फरमाया कि हेमंत कटारे को सहानुभूति वोट मिल गए। उन्होंने अटेर की भाजपा की हार का ठीकरा चुनाव आयोग के सिर फोड़ने से भी गुरेज नहीं किया। इतना ही नहीं, आयोग पर कांग्रेस के पक्ष में फैसले करने का आरोप भी जड़ दिया। कांग्रेसियों को अटेर की कामयाबी पर इठलाने के बजाए आत्मचिंतन करना चाहिए। आम चुनाव में सत्यदेव कटारे 11 हजार वोट के अंतर से विजयी हुए थे। अब उपचुनाव में उनके बेटे को महज एक हजार वोट की बढ़त से ही मिल पाई है कामयाबी। इसी तरह कमी कांग्रेस के वोटों में बांधवगढ़ में भी आ गई।
गांधी अवतार में नीकु
महात्मा गांधी ने सौ साल पहले बिहार के चंपारण से ही अंग्रेजों के खिलाफ किसानों के आंदोलन की अगुवाई की थी। उस सत्याग्रह की शताब्दी के मौके पर पूरे साल भर सरकारी कार्यक्रम आयोजित करने की रूपरेखा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले ही बना ली थी जिन पर अमल भी शुरू हो गया है। बापू के विचारों का प्रचार-प्रसार करते हुए उन्हें मौजूदा दौर में भी प्रासंगिक साबित कर रहे हैं नीतीश। जाहिर है कि मकसद खुद को घोर गांधीवादी के तौर पर उभारने का होगा। पिछले साल जब सूबे में शराबबंदी की थी तो नाम बापू का ही लिया था। कहा था कि बापू पूर्ण शराबबंदी के पक्षधर थे। उन्हीं की मंशा के अनुरूप कदम उठाया है। मुख्यमंत्री शराबबंदी की कामयाबी से फूले नहीं समां रहे। इसे वे जाहिर भी खूब कर रहे हैं कि शराबबंदी करके बापू का सपना साकार कर दिया। बापू के विचारों के प्रचार के लिए रथ भी रवाना कर दिया। संकेत दिया कि वे बापू के सपने को साकार करने की मंशा से दहेज प्रथा को भी समाप्त करेंगे। तैयारी चल रही है और जल्दी ही रणनीति लागू हो जाएगी। चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी के बहाने वे साबित कर देना चाहते हैं कि बापू के सपनों को साकार करने के मामले में वे गुजरात से किसी मायने में पीछे नहीं हैं। बापू गुजरात में ही तो जनमे थे। यों देश में गांधीवादियों की कमी नहीं है। पर गांधीवादी के रूप में नीतीश बाबू की अलग छवि ठहरी। समाजवादी जब भी गांधी का नाम लेते हैं, लोहिया को याद करना नहीं भूलते। बिहार के समाजवादी इससे आगे निकल कर गांधी और लोहिया के साथ जेपी और कर्पूरी ठाकुर को भी याद करते हैं। लोहिया ने तो एक मौके पर खुद को कुजात गांधीवादी बता दिया था। नीतीश को अभी तय करना है कि वे खुद को किस श्रेणी का गांधीवादी कहलाना चाहेंगे। सत्ताधारी गांधीवादी, मठ वाले गांधीवादी या कुजात गांधीवादी।

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