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राजपाट: नया निजाम, सियासी रस्साकसी, चुप्पी की ताकत

नवजोत सिद्धू के मन में उप मुख्यमंत्री बनने की हसरत जरूर होगी। लेकिन कैप्टन ने उन्हें मंत्री पद तक ही सीमित कर दिया। सत्ता के दूसरे केंद्र की गुंजाईश छोड़ी ही नहीं।

Author March 27, 2017 5:46 AM
नवजोत सिंह सिद्धू के साथ पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (source Image: PTI)

सियासी रस्साकसी
उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों ने सीमा से सटे सूबे राजस्थान की भाजपाई सियासत को बेचैन कर दिया है। इस सूबे की नौकरशाही में भी खलबली है। दरअसल यूपी की छप्परफाड़ जीत का सेहरा भले नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के सिर बंधा हो पर इसमें अहम भूमिका राजस्थान के दो संघी प्रचारकों ओम माथुर और सुनील बंसल की भी रही है। ओम माथुर राजस्थान से ही राज्यसभा के सदस्य हैं। इस समय बेशक अमित शाह के साथ पार्टी के उपाध्यक्ष और उसी नाते यूपी के प्रभारी हैं पर अतीत में राजस्थान के संगठन मंत्री और सूबेदार दोनों पार्टी पद संभाल चुके हैं। सो, नौकरशाहों से संपर्क स्वाभाविक है। इसी तरह सुनील बंसल राजस्थान विश्वविद्यालय में वर्षों संघ से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सियासत करते थे। उनके कई सहपाठी सूबे के आला अफसर हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ओम माथुर से संपर्क रखने वाले अफसरों को ठंडे बस्ते में लगा रखा है। माथुर का रुतबा बढ़ने से इन अफसरों के चेहरों पर रौनक लौटी है। माथुर तो अब सूबे की सियासत में सक्रिय भी हो गए हैं। हालांकि सुनील बंसल अभी इस फेर में नहीं पड़े हैं। माथुर के समर्थक तो केंद्रीय नेतृत्व को यही समझा रहे हैं कि राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव जीतना है तो ओम माथुर के हवाले करनी पड़ेगी सरकार की बागडोर। अमित शाह ने अब सूबे के संगठन मंत्री को बदल दिया है। संतोष सिंह संभालेंगे बागडोर। यह बात अलग है कि वसुंधरा ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। पार्टी के ज्यादातर विधायकों पर उनकी निजी पकड़ के चलते आलाकमान के लिए उन पर हाथ डालना हंसी खेल नहीं होगा।
चुप्पी की ताकत
सियासत में वाकपटुता को अनुकूल माना जाता है। जो फर्राटेदार और लगातार बोल सके उसे अच्छा नेता समझते हैं लोग। पर ज्यादा बोलने के नुकसान भी कम नहीं होते। मुंह से निकली बात पराई हो जाती है। सयानों ने तो यही नसीहत दी है कि बोलो कम, दूसरों की सुनो ज्यादा। उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री इसी मिजाज के लगते हैं। अपने सियासी करिअर की दीक्षा संघ की पाठशाला में प्रचारक के नाते ली थी। लिहाजा कम बोलना स्वभाव का हिस्सा बन गया। मुश्किल यह है कि मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठते ही तुलना पूर्ववर्ती से करते हैं लोग। पूर्ववर्ती हरीश रावत तो खूब बोलते थे। पर त्रिवेंद्र सिंह रावत कम बोलते हैं। बेशक सवालों के जवाब नपे-तुले शब्दों में देते हैं। पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। विवादों में कभी नहीं फंसे। इसी शैली से दुविधा बढ़ गई है विरोधियों की। उनके मन की थाह कोई कैसे ले। ऊपर से खांटी नौकरशाह ओमप्रकाश को अपने सचिवालय में तैनात कर लिया। उत्तराखण्ड के सुलझे हुए आईएएस के नाते पहचान है उनकी। त्रिवेंद्र के मंत्री मंडल में ज्यादातर मंत्री धुरंधर ठहरे। मसलन हरक सिंह रावत और सतपाल महाराज। आधे मंत्री कांग्रेस से आए हैं। तो भी त्रिवेन्द्र को कोई डर नहीं। पार्टी आलाकमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का वरदहस्त जो ठहरा। मुख्यमं़त्री के नाते अलबत्ता चुनौतियां अपार हैं। बहुमत बड़ा है तो बगावत के खतरे से एक दम बचे रहेंगे। केवल खुद की ईमानदारी, अनुशासन और कर्मठता काफी नहीं होगी। सहयोगियों और नौकरशाही को भी भ्रष्टाचार से रोकेंगे तभी जीत पाएंगे लोगों का दिल। पिछली कांग्रेस सरकार ने तो भ्रष्टाचार के नए कीतिर्मान बना दिए थे। तभी तो दो सीटों से चुनाव लड़कर भी सदन का मुँह नहीं देख पाए उस सरकार के मुखिया।
नया निजाम
पंजाब में कैप्टन अमरिंदर के लिए अवसर भी हैं तो चुनौती भी। सरकार बंपर बहुमत से बनी है लिहाजा विफलताओं को ढकने का कोई बहाना नहीं चलेगा। ऊपर से पार्टी आलाकमान ने भी फ्रीहैंड दे दिया। अपनी पंसद से ही बनाया है अपना मंत्री मंडल। कांग्रेस के इतिहास में इसे अजूबा ही कहा जाएगा। नवजोत सिद्धू के मन में उप मुख्यमंत्री बनने की हसरत जरूर होगी। लेकिन कैप्टन ने उन्हें मंत्री पद तक ही सीमित कर दिया। सत्ता के दूसरे केंद्र की गुंजाईश छोड़ी ही नहीं। दिल्ली दरबार यानि राहुल गांधी ने मंत्रियों के चयन के लिए पूरी आजादी दे दी। चूंकि सिद्धू ने पहले से चल रहे अपने टीवी कार्यक्रमों को छोड़ने में असमथर्ता जताई थी सो अमरिंदर ने उन्हें विभाग भी कम अहमियत वाले ही थमाए। बेचारे सिद्धू अच्छे मंत्रालय के चक्कर में पड़कर अपनी दस करोड़ रूपए सलाना की आमदनी से हाथ क्यों धोते। हां, बीच में यह चर्चा जरूर चली थी कि सिद्धू को पार्टी का सूबेदार बना दिया जाए। अभी अमरिंदर के पास ही है यह जिम्मा। जिसे वे छोड़ने की पहले ही कर चुके हैं पेशकश। पर सिद्धू की निजी व्यस्तता के आगे इस कुर्सी की संभावना भी कमजोर पड़ गई थी। सो नए सूबेदार की तलाश में माथापच्ची करेंगे अब राहुल गांधी। कैप्टन ने शुरुआत तो अच्छी ही की है। अगला चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं सो डर काहे का। लोगों की भलाई के लिए कड़े फैसले कर सकते हैं वे बेहिचक। अकाली सरकार ने तो लोगों की सारी उम्मीदों पर पानी ही फेर रखा था।

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