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शासक नहीं सेवक

रावत ने पाया कि घायल मोटर साइकिल सवार था और किसी वाहन ने उसे टक्कर मारी थी।

Author July 3, 2017 3:14 AM
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (PTI Photo)

मेरी मर्जी 

रघुवंश बाबू का व्यक्तित्व दूसरे नेताओं से हमेशा भिन्न रहा है। आम तौर पर तो चुप ही रहते हैं राजद के दिग्गज रघुवंश प्रसाद सिंह। लेकिन बोलते हैं तो सबको हैरत में डाल देते हैं। हाल ही में फरमाया कि सभी पार्टियों के नेता अपनी पार्टी के आला नेता को प्रधानमंत्री मेटीरियल बताते हैं। नीतीश कुमार की पार्टी के लोग उन्हें पीएम मेटीरियल मानते हैं। इस पर किसी को हालांकि क्या आपत्ति हो सकती है। सवाल तो यह है कि रघुवंश बाबू और लालू यादव नीतीश को इस पद के लायक मानते हैं या नहीं। रघुवंश बाबू खामोश क्यों रहते? बेबाकी से राय दे दी कि राजद तो नीतीश को बिहार का मुख्यमंत्री ही मानता है। कोई पूछे कि पीएम मेटीरियल ही मान लेते तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता।

शासक नहीं सेवक

प्राचीन काल में राजाओं-महाराजाओं की दयालुता और राजकाज के प्रति चौकसी के किस्से-कहानियां उनकी लोकप्रियता में चार-चांद लगाते थे। कहने को अब राजशाही के बजाए लोकशाही है। हकीकत में बेशक शासक हों पर कहते खुद को जनसेवक हैं अब निर्वाचित नुमाइंदे। सत्ता मिलते ही लोगों से किनारा करने लगते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस धारणा को तोड़ना चाहते हैं। अभी तक तो सादगी, सरलता और लोगों के प्रति लगाव कायम है। दयालुता की बानगियां भी सुनाई पड़ने लगी हैं। मसलन, देहरादून के जोली ग्रांट हवाई अड्डे से सड़क पर जा रहे थे तो किसी घायल को पड़ा देखा। गाड़ी रुकवाई और पहुंच गए घायल के पास। यों काफिले में उनसे आगे भी थी सुरक्षा बल की गाड़ी। पर किसी का ध्यान नहीं गया। गया होगा तो अनदेखा कर दिया। रावत ने पाया कि घायल मोटर साइकिल सवार था और किसी वाहन ने उसे टक्कर मारी थी। मुख्यमंत्री घायल को सहारा देने लगे तो भला अफसर कैसे मूक रहते। सरकारी गाड़ी से उसे तत्काल अस्पताल भिजवाया। अफसरों को हिदायत अलग दी कि किसी की जान बचाने के लिए अपने काम का थोड़ा बहुत हर्ज भी हो जाए तो कन्नी नहीं काटनी चाहिए।

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