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राजपाट: वजूद पर खतरा, अग्निपरीक्षा अखिलेश की

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा व सपा-कांग्रेस के लिए जितना अहम है उससे भी कहीं ज्यादा अहमियत इस चुनाव की मायावती के लिए है।

बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा के घोषणा पत्र को झूठ का पुलिंदा कहा। (Photo: ANI)

वजूद पर खतरा

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा व सपा-कांग्रेस के लिए जितना अहम है उससे भी कहीं ज्यादा अहमियत इस चुनाव की मायावती के लिए है। 2007 में स्पष्ट बहुमत के साथ देश के सबसे बड़े सूबे की चौथी बार मुख्यमंत्री बनी मायावती के लिए बाद का दौर नुकसान भरा रहा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें जीतने और त्रिशंकु लोकसभा की सूरत में प्रधानमंत्री बनने की उनकी हसरत टूटी थी। उसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव ने उन्हें करारा झटका दिया। महज 80 सीटों पर सिमट गई थी बसपा। फिर आया 2014 का लोकसभा चुनाव। मोदी की ऐसी आंधी चली कि सबसे भारी समझे जाने वाले बसपा के हाथी के न केवल पैर उखड़ गए बल्कि खाता तक नहीं खुल पाया। 1989 में पहली बार लोकसभा में खाता खुला था इस पार्टी का। इसके बाद ग्राफ बढ़ता ही गया। इस बार बहिनजी ने अखिलेश यादव को सत्ता से अपदस्थ करने के लिए मुसलमानों पर पूरी ताकत झोंक दी।

सबसे ज्यादा 97 मुसलमानों को टिकट भी उन्होंने ही दिए। सपा के जंगल राज का विरोध करते-करते पूर्वांचल के बाहुबली मुख्तार अंसारी से हाथ मिलाने में भी गुरेज नहीं किया। पर कांग्रेस और सपा के साथ आ जाने से मुसलमान और दलित के नए गठजोड़ के उनके फार्मूले की पूर्ण सफलता पर हर कोई शक करने लगा। नरेंद्र मोदी और अमित शाह तो विधानसभा चुनाव में भी लोकसभा की तरह ही मायावती के गैरजाटव दलित और गैर-यादव अति पिछड़ों को समेटने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रहे हैं। विधानसभा में अच्छा प्रदर्शन नहीं हुआ या पार्टी तीसरे नंबर पर खिसकी तो खतरे में पड़ सकता है वजूद। कांशीराम कांग्रेस और भाजपा की खूब खिल्ली उड़ाते थे। बात उनकी थी भी ठीक। बसपा का उभार हुआ तो भाजपाई खुश होते थे कि कांग्रेस का दलित वोट बैंक खिसक गया। पर उनकी इसी खुशफहमी को बाद में बसपा ने अति पिछड़ों और अगड़ों को भी तोड़ कर ध्वस्त कर दिया था। लगता है कि इस बार खिल्ली उड़ाने के अवसर की ताक में हिंदुत्व के एजंडे के लिए बसपा को खतरा मानने वाले भाजपा नेता हैं।

अग्निपरीक्षा अखिलेश की

लगता है कि अखिलेश यादव अकेले पड़ गए। मतदाता मेहरबान हुए तो उन्हें नायक बना सकते हैं। पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की चुनाव प्रचार की शैली भाजपा को टक्कर नहीं दे पाई। मुलायम सिंह यादव की कमी सपा समर्थकों को खली जरूर होगी। महज तीन जगह ही गए मुलायम प्रचार करने। एक जसवंत नगर में छोटे भाई शिवपाल यादव, दूसरा अपनी छोटी बहू अपर्णा के लिए लखनऊ में और तीसरा जौनपुर में मल्हनी सीट पर पारसनाथ यादव के लिए। उम्मीद थी कि बेटा बाप को मना लेगा। पर दोनों की अनबन बरकरार ही रही।

प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी का नहीं आना भी हैरान करने वाला ही था। अखिलेश ने तो कांग्रेस पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया है। 80 से ज्यादा की औकात कोई नहीं मान रहा था कांग्रेस की। लेकिन अखिलेश ने सत्ता में वापसी के लिए 105 सीटें दे दी। ले-देकर अखिलेश का साथ उनकी पत्नी डिंपल ने ही दिया। कहीं-कहीं आजम खान भी दिखे तो गैरयादव पिछड़े नेताओं मसलन, कुर्मी, शाक्य, लोध, प्रजापति, बघेल जैसी जातियों का कोई कद्दावर चेहरा नहीं था। हां, अपनी शालीनता और संयत वाणी के कारण जरूर लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी यूपी के युवा मुख्यमंत्री ने। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख अलबत्ता गिरी।

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