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राजपाट: चुनौती भी, अवसर भी, चौकस बिहारी

मोदी जब 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बन कर दिल्ली से गांधीनगर गए थे तो सरकारी कामकाज का ककहरा भी नहीं जानते थे।

Author March 27, 2017 5:39 AM
नवरात्र से पहले अयोध्या जा सकते हैं सीएम योगी आदित्य नाथ (Source-PTI)

चुनौती भी, अवसर भी

योगी आदित्यनाथ को नरेंद्र मोदी से सीखना होगा। मोदी जब 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बन कर दिल्ली से गांधीनगर गए थे तो सरकारी कामकाज का ककहरा भी नहीं जानते थे। संघ के प्रचारक और फिर उसी हैसियत से भाजपा के संगठन कर्ता रहे सो चुनाव भी कभी नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद ही बने विधानसभा के सदस्य। लेकिन अपनी लगन, नेक नीयत, ईमानदारी और निष्ठा के बूते वह मुकाम हासिल कर दिखाया जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर पाता। फिर तो लगातार तीन बार पार्टी को चुनाव में जिताकर गुजरात के अजेय योद्धा का दर्जा पा गए। लोकसभा चुनाव में तो खैर नया इतिहास ही रच दिया। योगी के पास कम से कम संसदीय अनुभव तो पहले से है। लगातार पांच बार से जीतते आ रहे हैं गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव। बस प्रशासन और सरकार को चौकसी व चुस्ती से चलाना है। अपनी प्राथमिकता यों ठीक ही चुनी हैं। सपा और बसपा सरकारों की तरह सत्ता संभालते ही नौकरशाही के तबादलों के चक्कर में नहीं पड़े हैं। हैरानी यह देख कर हर किसी को हुई है कि जिस अमले ने अखिलेश यादव के राज को जंगलराज की बदनामी दिला रखी थी, वह पलक झपकते राह पर आ गया। दिन-रात मुस्तैदी से डयूटी कर रहे हैं अब यूपी के पुलिस वाले।

योगी अभी युवा हैं। इस नाते वे भाग दौड़ भी कर सकते हैं। पुलिस थानों के औचक निरीक्षण से सूबे के मायूस लोगों में अच्छा संदेश गया है। अपने देश में प्राचीन काल में राजा भेष बदलकर सरकारी तंत्र की पड़ताल करते थे। पर देश के सबसे बड़े सूबे में नियमित रूप से ऐसा कर पाना व्यावहारिक नहीं हो सकता। तो भी कानून का डर अपने आप असर दिखाता है। उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी के बाद अच्छे मुख्यमंत्री की छवि 1991 में कल्याण सिंह ने बनाई थी। वे हमेशा कहते थे कि सरकार हनक से चलती है और हनक मुख्यमंत्री के अपने व्यक्तित्व, चरित्र, आचरण और कार्यशैली से बनती है। योगी के पक्ष में सभी पहलू अनुकूल हैं। बस उन्हें कामकाज में जात-पात के आधार पर फैसले लेने की परंपरा को तोड़ना होगा। जो जातियां भाजपा को वोट नहीं देने के लिए जानी जाती हैं, सरकारी तंत्र में अगर उनके कार्यकुशल, सक्षम और बेदाग छवि के अफसर हों तो उनकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। मेरिट पर तैनातियों के साथ-साथ प्रदर्शन भी जरूरी है। कई बार ईमानदार अधिकारी विकास की गाड़ी को अवरुद्ध कर देते हैं। उससे भी लोगों की अपेक्षाएं टूटती हैं। प्रधानमंत्री ने पार्टी सांसदों को तबादलों के फेर में नहीं पड़ने की नसीहत देकर योगी के लिए रास्ता साफ किया है। पर अब उनके इम्तिहान की बारी है। भाजपा ने लंबे-चौड़े वादे कर लोगों से समर्थन लिया है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन आने का सपना दिखाया था। वह अभी तक अधूरा है। योगी अगर सबका साथ सबका विकास के नारे को धरातल पर उतारेंगे तभी अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत संभव हो पाएगी। केवल हिंदू मुसलमान के बंटवारे के आधार पर मिलने वाली कामयाबी सनातन नहीं हो सकती।

चौकस बिहारी
नीतीश कुमार को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों से हैरानी हुई होगी। भले वे जाहिर न कर रहे हों। हालांकि भाजपा की जीत का अंदाज उन्हें पहले ही हो चुका था। सपा और कांग्रेस ने गठबंधन कर जब यूपी में भी भाजपा को बिहार जैसी चुनौती देने का दावा किया था तो नीतीश ने उसकी खिल्ली उड़ाई थी। उन्होंने साफ कहा था कि बिहार में भाजपा के मुकाबले तीनों पार्टियों ने मिलकर महागठबंधन किया था। जबकि यूपी में दो बड़ी पार्टियों सपा और बसपा के आमने-सामने रहते वैसे महागठबंधन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। नीतीश ने यूपी की भाजपा की बंपर जीत से कुछ सीख ली है। मसलन, दलितों, अति पिछड़ों और पिछड़ों को जोड़ने पर जोर तो वे पहले से ही देते रहे हैं पर यूपी के नतीजों के बाद उन्हें इन मतों का महत्व और समझ आया है। तभी तो दूसरे सूबों में पढ़ रहे इन तबकों के छात्रों की छात्रवृत्तियों को बंद करने का फैसला टाल दिया है।

इससे अच्छा संदेश गया है। युवा पीढ़ी के हित में और भी कई फैसले लेकर नीतीश ने अपनी साख बढ़ाई है। उसी तर्ज पर जैसे पंचायतों और निकायों ने महिलाओं को 33 के बजाए 50 फीसद आरक्षण देकर बढ़ाई थी। वैसे भी नीतीश हमेशा कहते रहे हैं कि वे केवल चुनाव के वक्त तैयारी नहीं करते। अगले चुनाव की उनकी तैयारी तो चुनाव जीतने के साथ ही शुरू हो जाती है। जो भी कदम उठाते हैं, चुनाव ध्यान में रहता ही है। विधानसभा चुनाव से पहले तो उनके सूबे में लोकसभा चुनाव आएगा। पिछली दफा सूपड़ा साफ कर दिया था मोदी ने। इस बार ज्यादा सीटें जीतना चाहेंगे वे लोकसभा चुनाव में। तभी तो यूपी की तर्ज पर अवैध बूचड़खानों के खिलाफ उनकी सरकार ने भी तेज कर दी है मुहिम।

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