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उत्तराखंड सरकार: कांग्रेस से आए नेताओं का टूटने लगा है सब्र का बांध

त्रिवेंद्र सिंह की सरकार को शुद्ध भाजपा सरकार कोई मान ही नहीं रहा। आरएसएस की चिंता भी इसी वजह से बढ़ गई है।

Author Updated: May 22, 2017 7:04 AM
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (PTI Photo)

मोहभंग

कांग्रेस से भाजपा में आए उत्तराखंड के नेताओं के सब्र का बांध दो महीने में ही दरकने लगा है। इन बागियों में से चार को तो भाजपा सरकार में मंत्री पद भी मिल गए। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत मूल भाजपाई तो छह ही ठहरे। तभी तो त्रिवेंद्र सिंह की सरकार को शुद्ध भाजपा सरकार कोई मान ही नहीं रहा। आरएसएस की चिंता भी इसी वजह से बढ़ गई है। लिहाजा हर मंत्री के दफ्तर में अपने प्रचारक तैनात कर दिए हैं इस संगठन ने। मलाई मारने की मंशा से मंत्री बने बागी कांग्रेसी। इसी निगरानी से निराश दिखने लगे हैं। कांग्रेस के जमाने में तो मजे थे। पर भाजपा की सरकार में कुछ कर ही नहीं पा रहे। हरक सिंह रावत तो अपनी पीड़ा को छिपा भी नहीं पाए। राज्य कर्मचारियों के एक सम्मेलन में लगे नौकरशाही को कोसने। लगे हाथ हरीश रावत और रमेश पोखरियाल निशंक की कार्यशैली के कसीदे भी पढ़ दिए। कर्मचारियों ने उनसे अपनी मांगें पूरी कराने का आग्रह किया था। तभी कर बैठे वे मुख्यमंत्री पर कटाक्ष। फरमाया कि उत्तराखंड में जो भी नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाता है, उसकी मनोदशा बदल जाती है। हरीश रावत और निशंक सरकारों के पतन के लिए नौकरशाही को दोष दिया। साथ ही त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी नसीहत दे डाली कि नौकरशाह उनकी सरकार का भी कर देंगे बेड़ागर्क। हरक सिंह रावत की सिफारिश को अनसुना करेंगे तो कटाक्ष सहने ही पड़ेंगे त्रिवेंद्र सिंह रावत को। अलबत्ता हरक सिंह के मंत्रालय की निगरानी जरूर बढ़ा दी मुख्यमंत्री ने। संजय चोपड़ा और प्रदीप चौहान सरीखों को शरण देंगे तो भला मुख्यमंत्री कैसे कर सकते हैं उनकी परवाह। चर्चा तो यहां तक चल पड़ी है कि कांग्रेस के सूबेदार प्रीतम सिंह हरक सिंह रावत को घर वापसी के लिए मना रहे हैं। रही भाजपा की बात तो मतलब निकलने के बाद नहीं पहचानने वाली है उसकी रणनीति। कांग्रेस के बागी अब उसे बोझ नजर आ रहे हैं। इनमें से एक का नाम तो ऊधम सिंह नगर के राष्ट्रीय राजमार्ग भूमि घोटाले में भी सामने आया है। इसी से अटकलें लग रही हैं कि जल्द ही दो कांग्रेसी बागी मंत्रियों की छुट्टी कर सकते हैं त्रिवेंद्र सिंह रावत।

कई बार मामूली चूक भी भारी पड़ जाती है। ऐसी ही एक चूक के चलते अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है मध्य प्रदेश सरकार को। मंत्रिमंडल की बैठक में 15 मई को सूबे के सरकारी कर्मचारियों को सात फीसद अतिरिक्त महंगाई भत्ता जनवरी, 2017 से देने का फैसला हुआ था। लेकिन अब सरकार इसे घटा कर चार फीसद करने के फेर में है। वित्त मंत्री जयंत मलैया ने अपनी तरफ से मंजूरी भी दे दी। बताते हैं कमी के प्रस्ताव को। पर मंत्रिमंडल की बैठक में तो जाएगा ही दोबारा यह प्रस्ताव। चूक हुई मूल्य सूचकांक की गणना में पर इसे महज अफसरों की भूल बता कर तो अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ नहीं सकते मलैया। हैरानी की बात तो यह है कि राज्यपाल की तरफ से सात फीसद की अधिसूचना भी जारी हो गई थी। कहने को मंत्रिमंडल की बैठक में रखने से पहले हर प्रस्ताव को अच्छी तरह ठोक बजा कर जांचा परखा जाता है। मूल्यसूचकांक की गणना के दौरान चूक किस जगह हुई, इसकी अभी कोई पड़ताल नहीं की है सरकार ने। पर मामला साढ़े चार लाख कर्मचारियों से जुड़ा ठहरा। लिहाजा चौकन्ना हो गया विपक्ष। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को यह तोहमत लगाने का मौका मिल गया कि सरकार नींद में चल रही है।
पेट पर लात
नारा है सबका साथ-सबका विकास। पर केंद्र की मोदी सरकार काम गरीबों के हितों के उलट ही करती दिख रही है। राशन में बंटने वाली चीनी पर सबसिडी बंद करके तो उसने यही रूप दिखाया है। ऊपर से यह ज्ञान और दे दिया कि राज्य सरकारें चाहें तो अपनी जेब से दे दें चीनी पर सबसिडी। हर राज्य सरकार की तरह मुश्किल मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार की भी बढ़ गई इससे। इस नाते और ज्यादा कि अगले साल होंगे सूबे में विधानसभा चुनाव। एक करोड़ 18 लाख हैं बीपीएल कार्डधारी। 18 रुपए 50 पैसे किलो की दर से मिल रही थी गरीबों को राशन की चीनी। अप्रैल और मई बिन चीनी चले गए। बाजार में खुदरा दाम है आजकल 44-45 रुपए। राज्य सरकार खुद सस्ती चीनी देगी तो उसके खजाने पर बढ़ जाएगा बोझ। उसने फिलहाल तो चुप्पी साध ली है। फिलहाल गेहूं, चावल और नमक ही बंट रहा है राशन की दुकानों से। चीनी की जगह नमक तो फांक नहीं सकते गरीब। सस्ती चीनी का यह आंकड़ा वैसे भी 11 हजार टन महीने का ठहरा।

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