ताज़ा खबर
 

राजपाट- सब्र की इंतिहा, तबादलों की सौगात

जिला स्तर पर ऐसे कलेक्टर और कप्तान तैनात करने की मंशा है जिनके दम पर सियासी लाभ लिया जा सके।
Author राजपाट | April 17, 2017 10:22 am
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। (फाइल फोटो)

सब्र की इंतिहा
लालू को अब बिहार के मोदी पर दिल्ली वाले मोदी से ज्यादा गुस्सा आ रहा है। बिहार के मोदी यानी पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी। गुस्से में अपनी पार्टी राजद के तमाम प्रवक्ताओं को बुला लिया। उन्हें सलाह दी कि अब चुपचाप नहीं बैठना है। सुशील मोदी के हर आरोप का न केवल मुंहतोड़ जवाब देना है बल्कि उनकी नाक में दम भी कर देना है। पार्टी लाइन पर चलते हुए मोदी के खिलाफ हल्ला बोलना है। सुशील मोदी सियासी विरोधी लालू को अपना बड़ा भाई बताते रहे। पर बड़ा भाई कब तक खामोश रहे। सुशील मोदी उनके और उनके परिवार पर लगातार एक के बाद एक आरोप मढ़ रहे हैं। अब तो उनके बेटों के पीछे ही पड़ गए। तेज प्रताप और तेजस्वी पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगा दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनके खिलाफ जांच कराने और मंत्री पद से इस्तीफा लेने की मांग भी कर डाली। ऊपर से लालू यादव से सवाल कर रहे हैं कि इतनी संपत्ति आई कहां से। लालू कितना बर्दाश्त करें। अब अपने ही दम पर चुप कराएंगे। बेशक मन में यह मलाल जरूर होगा कि उनके सहयोगी दल जद (एकी) और कांग्रेस का कोई नेता या मंत्री उनके और उनके बेटों के बचाव में आगे नहीं आ रहा। रही सुशील मोदी की बात तो वे भी नादान नहीं हैं। लालू के विरोध की सियासत ने ही उन्हें मौजूदा मुकाम पर पहुंचाया है। शुरुआत चारा घोटाले को पूरी ताकत से उजागर करने के साथ की थी। उसमें सफलता मिली। आय से ज्यादा संपत्ति का मामला भी उजागर किया था। पर यूपीए की सरकार के रहते उसमें सफलता नहीं मिल पाई थी। अब दिल्ली में भाजपा का राज है। केंद्रीय जांच एजंसियों को प्रभावित नहीं कर सकते लालू। इसीलिए नए सिरे से शुरू किया है लालू और उनके परिवार पर आरोप जड़ने का अभियान।
तबादलों की सौगात
चुनाव में फासला थोड़ा रह जाए तो हर मुख्यमंत्री अपनी सरकारी मशीनरी को चाक-चौबंद करता है। राजस्थान में वसुंधरा राजे भी जुट गई हैं अब इसी मिशन में। डेढ़ साल रह गया है अब सरकार का बाकी कार्यकाल। चुनाव जिताने में मददगार हो सकने वाले अफसरों की टोह शुरू हो गई है। खासकर जिला स्तर पर ऐसे कलेक्टर और कप्तान तैनात करने की मंशा है जिनके दम पर सियासी लाभ लिया जा सके। राज्य सिविल सेवा से तरक्की पाकर आइएएस बनने वाले अफसरों को इस कसौटी पर ज्यादा वफादार समझती है हर सरकार। ऊपर से अफसरों की भी जात-पात अहम हो गई है। सरकार बनने के बाद पार्टी विधायकों को ट्रांसफर पोस्टिंग से दूर रहने की नसीहत देने वाली मुख्यमंत्री अब खुद उनसे पसंदीदा अफसरों के नाम मांग रही हैं। विधायकों को कलेक्टर और कप्तान से ज्यादा दिलचस्पी एसडीएम लगवाने में है। ज्यादा काम इसी स्तर पर जो पड़ते हैं उनके। बदलाव की आहट से नौकरशाही में खलबली है। जहां तरक्की के बाद आइएएस और आइपीएस कैडर में आए अफसर इस मौके का फायदा उठाने की फिराक में हैं वहीं सीधे चयन वाले चुनाव के अवसर पर किसी चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते। चुनाव वाले साल में वे कम महत्व के पदों पर ही बने रहने में सुकून मानते हैं। तरक्की पाकर आइएएस और आईाीएस बने अफसर सियासी चोला पहनने में भी गुरेज नहीं करते। अब तक ऐसे अनेक अफसर चुनाव भी लड़ चुके हैं। केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बने अर्जुन मेघवाल और सीआर चौधरी की मिसाल सामने है। मेघवाल तो बीकानेर जैसे बड़े जिले के कलेक्टर भी रहे जबकि चौधरी राज्य लोकसेवा आयोग के मुखिया। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर तो कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अब रिटायर अफसरों को उम्मीदवार बना रहे हैं।

अरविंद केजरीवाल के खिलाफ जारी हुआ जमानती वारंट; पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर की थी टिप्पणी

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.