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राजपाट- दोस्ती में दुश्मनी

भाजपा भी परवाह नहीं करती अब। उलटे शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिलाने की खबरें छपवाकर शिवसेना की हवा निकालती रहती हैै।
Author November 20, 2017 05:54 am
महाराष्‍ट्र में बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन की सरकार है, मगर दोनों के रिश्‍ते मधुर नही है।

धमक बदस्तूर
अजय भट्ट उत्तराखंड भाजपा के सूबेदार हैं। पिछला विधानसभा चुनाव पार्टी की आंधी के बावजूद रानीखेत से हार गए थे। जीत जाते तो हो सकता है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत की जगह वे ही होते सूबे के इस वक्त मुख्यमंत्री। चुनाव से पहले तो सूबेदार भी थे और पार्टी विधायक दल के नेता भी। लेकिन हार कर भी हाशिए पर नहीं हैं। पार्टी में अब भी खूब चलती है उनकी। अमित शाह को अपने सांगठनिक कौशल से पटा रखा है। आजकल अपनी ही सरकार में नेता प्रतिपक्ष जैसी भूमिका अदा करने लगे हैं। मुख्यमंत्री को समस्याओं के बारे में बेहिचक पत्र लिखते हैं। उत्तराखंड राज्य का स्थापना दिवस नौ नवंबर है। भाजपा सरकार ने मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना को बंद किया तो अजय भट्ट को नागवार गुजरा। लिहाजा इस फैसले पर सवाल उठाते हुए चिट्ठी लिख मारी मुख्यमंत्री को। साथ ही यह शिकायत भी कर दी कि कांग्रेस सरकार ने जिस बजाज एलियांज कंपनी को काली सूची में डाल दिया था, उसी को क्यों सौंपी गई यह बीमा योजना। इस कंपनी ने कैसे कर दी हिम्मत राज्य स्थापना दिवस पर योजना को बंद करने की। पाठकों को बता दें कि सूबे में स्वास्थ्य विभाग के मंत्री खुद मुख्यमंत्री ही हैं। जब योजना बंद हुई तो महकमे के प्रमुख सचिव भी मुख्यमंत्री की नाक के बाल समझे जाने वाले ओमप्रकाश थे। पर बेदाग छवि वाले अजय भट्ट से उलझने की हिम्मत कोई कैसे कर सकता है।

जुगाड़ की चाह
आमतौर पर चुनाव में टिकट के लिए गजब की मारा मारी होना आम बात है। पर राजस्थान का मिजाज अलग दिख रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा के कई विधायकों को अभी से सताने लगा है अगले चुनाव में हार का डर। तभी तो कुछ दिग्गज विधायक तक चुनाव नहीं लड़ने के मूड में नजर आ रहे हैं। घबराहट अपनी ही चार साल पुरानी सरकार की छवि ने बढ़ा दी है। लोगों से फिर वोट किस मुंह से मांगेगे। जमीनी हकीकत और घबराहट से अंजान आलाकमान भी नहीं है। बहरहाल विधानसभा चुनाव से पहले तो राज्यसभा की सूबे की चार सीटों का चुनाव होगा अगले साल मार्च में। संख्याबल साफ जता रहा है कि चारों सीटें भाजपा की झोली में आएंगी। लिहाजा कुछ विधायक अब राज्यसभा के जुगाड़ में जुट रहे हैं। सबसे बड़े इच्छुक तो पार्टी के सूबेदार अशोक परनामी ही बताए जा रहे हैं। जो फिलहाल जयपुर शहर की आदर्शनगर सीट से हैं विधानसभा के सदस्य। करीबी संकेत दे रहे हैं कि अपनी इच्छा परनामी ने मुख्यमंत्री को भी बता दी है। एक और डर भी सता रहा है परनामी को कि कहीं अपनी सीट बचा न पाएं। लिहाजा तर्क तलाश लिया है कि वे खुद चुनाव नहीं लड़ने की सूरत में ज्यादा बेहतर तरीके से कर पाएंगे पार्टी का कामकाज। उधर परंपरा पर नजर डालें तो पता चलता है कि हर बार सूबे से बाहर का भी कम से कम एक नेता जरूर जाता रहा है राज्यसभा में यहां के कोटे से। विजय गोयल पहले से थे। अब केजे अल्फांस भी चले गए। राज्यसभा की उम्मीदवारी तय करने में आलाकमान अपनी चलाता है। हां, मुख्यमंत्री के नाते वसुंधरा राजे की अनदेखी भी मुमकिन नहीं। सो इच्छुक विधायक राज्यसभा के लोभ में अब वसुंधरा की परिक्रमा में जुट गए हैं।
दोस्ती में दुश्मनी
सबसे पुराने सहयोगी हैं सियासत में एक दूसरे के भाजपा और शिवसेना। पर पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से दोनों के रिश्तों में आई खटास अभी तक दूर नहीं हो पाई है। दरअसल इस चुनाव में सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया था इनके बीच। लिहाजा दोनों पार्टियां अपने अपने बूते ही उतरी थीं चुनावी जंग में। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद ही बना लिया था अपना मन कि अब छोटा भाई बनकर नहीं रहना। वैसे भी जब तक बाल ठाकरे जीवित थे, शिवसेना की ताकत अलग थी। उद्धव ठाकरे पिता की विरासत को उतनी शिद्दत से संभाल न पाए। नतीजतन भाजपा ने भी आंखें तरेर लीं। बची कसर नतीजों ने पूरी कर दी। सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा। इससे पहले केंद्र में भी इस पार्टी को नरेंद्र मोदी ने औकात बता दी थी। उनका कहने को एक कैबिनेट मंत्री बनाया, पर उसे भी महकमा बेकार थमा दिया। शिवसेना के खाते में अपने पसंदीदा सुरेश प्रभु को डालने के फेर में थे। पर उद्धव ने उन्हेंं स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बहरहाल अब स्थिति यह है कि दोनों जगह सरकार में तो दोनों पार्टियां साझीदार हैं, पर शिवसेना की भूमिका विपक्ष सरीखी हो गई है। भाजपा भी परवाह नहीं करती अब। उलटे शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिलाने की खबरें छपवाकर शिवसेना की हवा निकालती रहती हैै।

महाराष्ट्र में ताजा बखेड़ा शिवसेना के विधायक हर्षवर्धन जाधव ने खड़ा किया है। औरंगाबाद के जाधव ने आरोप लगाया है कि सूबे के भाजपाई मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने उन्हें शिवसेना छोड़ भाजपा में आने की एवज में पांच करोड़ रुपए की पेशकश की थी। जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। भाजपा इस आरोप को तो नकार ही रही है, शिवसेना नेताओं पर निराधार आरोप लगाने की तोहमत भी जड़ दी है। पार्टी के प्रवक्ता केशव उपाध्ये ने फरमाया है कि अपने विधानसभा क्षेत्र से कटे हुए जाधव पब्लिसिटी स्टंट कर रहे हैं। जाधव तो सूबे की सरकार पर विकास से मुंह मोड़ने का आरोप भी डंके की चोट पर लगा रहे हैं। इस बात का भी लिहाज नहीं कर रहे कि भाजपा के सूबेदार कोई और नहीं उनके अपने ससुर राव साहेब दानवे हैं। सूबे में 288 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 122 विधायक हैं और 63 शिवसेना के। शिवसेना से पीछा छुड़ाने के लिए उसके दो दर्जन विधायक तोड़ने से पीछे भला क्यों रहना चाहेगी भाजपा। दोनों के रिश्तों में खटास है तो फिर भरोसे की गुंजाइश ही कहां बचती है।

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