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राजपाट: करिश्मा कैप्टन का, बदला नजरिया

जलंधर में मोदी ने भाजपा-अकाली दल के लिए रैली की थी उसके आसपास की तीनों सीटें हार गई भाजपा। जनता के मूड को समझने में माहिर माने जाने वाले मोदी पंजाब में जनता का मूड नहीं भांप पाए।

Author Published on: March 13, 2017 4:25 AM
जीत के बाद कांग्रेस नेता अमरिंदर सिंह को बधाई देते लोग। (PTI Image)

करिश्मा कैप्टन का

यूपी और उत्तराखंड की तरह पंजाब में मोदी का जादू नहीं चला। जिस जलंधर में मोदी ने भाजपा-अकाली दल के लिए रैली की थी उसके आसपास की तीनों सीटें हार गई भाजपा। जनता के मूड को समझने में माहिर माने जाने वाले मोदी पंजाब में जनता का मूड नहीं भांप पाए। तभी तो यहां आकर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का गुणगान कर गए थे जबकि बादल परिवार के प्रति जनता में साफ तौर पर गुस्सा था। जाहिर है कि अपनी पार्टी के सबसे पुराने सहयोगी के प्रति निष्ठा की नुमाइश भी करना जरूरी था। चुनाव के दौरान ही तस्वीर साफ नजर आने लगी थी कि कोई अनहोनी ही कांग्रेस को सत्ता में आने से रोक पाएगी। पहले से ही कांग्रेस ने खुद को काफी मजबूत कर लिया था जबकि केजरीवाल की पार्टी आप लगातार नीचे जा रही थी। अकाली-भाजपा गठबंधन का हाल तो शुरू से ही खराब दिख रहा था। अब लाख टके का सवाल यह है कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन टूटेगा या भाजपा, अब भी अकाली दल की पिछलग्गू बनी रहेगी। पार्टी के बड़े नेताओं की मानें तो संघ के अब तक के जिस दवाब से भाजपा अकाली दल से चिपकी हुई थी शायद अब उससे बाहर आने का वक्त आ गया है। पार्टी में यह राय बन रही है कि पंजाब में अकाली दल से पिंड छुड़ा लेना ही बेहतर होगा। भाजपा सूबे में दो दर्जन सीटों की औकात वाली पार्टी बन कर रह गई थी। इस बार तो खैर उसे तीन सीटों पर ही मिली हैं। जबकि पिछली बार उसने 12 सीटें जीती थीं। पार्टी की सूबे में ऐसी गत हो चुकी है कि उसके पास व्यापक जनाधार वाला कोई नेता है ही नहीं। नवजोत सिंह सिद्धू की लोकप्रियता और जमीनी पकड़ दोनों जगजाहिर थी। पर आलाकमान ने उन्हें भी अकाली दल से अपने मोह की बलि चढ़ा दिया। चालाक सिद्धू ने फिर भी अक्ल से काम लिया और चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का रुख कर अपना सियासी करियर तो बचा ही लिया, उप मुख्यमंत्री की कुर्सी या पार्टी की सूबेदारी के दावेदार भी बन गए हैं। भाजपा में अकाली दल के विरोध वाली सबसे मजबूत आवाज अकेले सिद्धू ही थे। पर पार्टी ने उन्हें खोकर अपना बड़ा नुकसान किया है। नतीजों से यह साफ हो चुका है। फिलहाल तो भाजपा आलाकमान यूपी और उत्तराखंड की बड़ी जीत की खुमारी में डूबा है। देखना है कि उससे बाहर निकलकर कब लेगा पंजाब की सुध।
बदला नजरिया

उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से राजस्थान की सियासत में भी खासी हलचल मच गई है। पड़ोसी सूबे के नतीजों से राजस्थान भाजपा की सियासत पर बड़ा असर पड़ने की संभावना मात्र से ही कई पार्टी नेताओं की निष्ठा बदलने लगी है। जबकि उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रभारी उपाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर नतीजों के बाद बम बम हंै। उनका कद बेशक बढ़ा है। नतीजतन राजस्थान में सत्ता का सुख ले रहा खेमा एकाएक सकते में आ गया है। इसका नजारा जयपुर के पार्टी दफ्तर में उस समय साफ दिखा जब चुनावी जीत का जश्न मनाया जा रहा था। इस जश्न में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत उनके खेमे से जुडेÞ तमाम नेता मौजूद थे। तभी वहां चिपके एक बड़े पोस्टर ने सबका ध्यान खींच लिया। कुछ नेताओं के तो उसे देख पसीने छूटने लगे। पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के प्रभारी ओमप्रकाश माथुर का बड़ा चित्र था। एक पोस्टर से सूबे की भाजपाई सियासत में आने वाले वक्त में संभावित उबाल का खाका तैयार हो गया है। ओम माथुर की जडें राजस्थान में गहरी हैं और यहां उनके समर्थकों की तादाद भी कम नहीं है। जो फिलहाल अपनी अनदेखी से आहत हैं। इनमें ज्यादातर पार्टी के पुराने निष्ठावान हैं। ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को वसुंधरा के मौजूदा राज में सत्ता की मलाई नसीब नहीं हो पाई। माथुर का वसुंधरा राजे से छत्तीस का आंकड़ा ठहरा। यूपी की जीत का जब पार्टी दफ्तर में जश्न मनाया जा रहा था तो वहां मौजूद ज्यादातर नेताओं के बीच चर्चा इसी मुद्दे पर केंद्रित दिखी कि अब माथुर को आलाकमान बड़ा इनाम देगा। इसी संभावना से सूबे में माथुर समर्थकों की बल्ले बल्ले है। माथुर पार्टी के सूबेदार बनने से पहले लंबे अरसे तक संगठन महामंत्री भी रहे। उधर यूपी भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल भी राजस्थान से ही नाता रखते हैं। विद्यार्थी परिषद के उनके कार्यकाल के पुराने साथी भी यूपी की जीत से उत्साहित हैं। बंसल पिछले तीन साल से यूपी में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में जुटे थे। अपने मेहनती मिजाज से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को खूब प्रभावित कर दिया है उन्होंने। तभी तो उम्मीद उनका कद बढ़ने की भी लगाई जा रही है।

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