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दुविधा में गुरुंग

ममता ने तय कर लिया है कि गोरखालैंड आंदोलन को अपनी मौत मर जाने देंगी। मोर्चा समर्थकों से जोर जबर्दस्ती का इरादा त्याग दिया है।

Author July 3, 2017 4:04 AM
Gujarat Election Result 2017: पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी। (File Photo)

दुविधा में गुरुंग
अजीब दाव-पेंच में उलझ गया है अब अलग गोरखालैंड राज्य का मसला। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के आंदोलन को तीन हफ्ते हो गए पर न मोर्चा पीछे हटने को तैयार है और न तृणमूल कांग्रेस सरकार ही झुकने के मूड में। एक तरह से दोनों पक्ष एक दूसरे को मात देने के लिए तू डाल-डाल, मैं पात-पात की रणनीति अपना रहे हैं। मोर्चे ने जीटीए से इस्तीफे तो दिए ही, जीटीए करार की प्रतियां भी जला दी। उसके बाद ट्यूब लाइट रैली के जरिए आंदोलन को धार दी तो ममता बनर्जी ने भी दार्जीलिंग में अलग पुलिस रेंज बनाने का एलान कर दिया। इंटरनेट पर लगी पाबंदी भी चार जुलाई तक बढ़ा दी। साथ ही 17 जून को हुई हिंसा में मारे गए तीन मोर्चा समर्थकों की मौत की जांच सीआइडी के हवाले कर दी। ममता ने तय कर लिया है कि गोरखालैंड आंदोलन को अपनी मौत मर जाने देंगी। मोर्चा समर्थकों से जोर जबर्दस्ती का इरादा त्याग दिया है।

इंतजार करो और देखो की रणनीति अपना रहा है अब सरकारी अमला। अपने विदेश दौरे से लौटते ही ममता ने सचिवालय में उच्च स्तरीय बैठक कर पर्वतीय क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा की थी। इसके बाद ही पुलिस को हिदायत दी गई कि वह मोर्चा समर्थकों या स्थानीय लोगों से टकराव को टाले। आंदोलन का राज्य सरकार ही नहीं केंद्र पर भी कोई असर नहीं दिखने से मोर्चे के युवा कार्यकर्ता धीरज खो रहे हैं। भाजपा को समर्थन दिया था मोर्चे ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में। अलग राज्य के गठन की उम्मीद से। लेकिन भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने तो उनकी उम्मीद पर पानी फेर दिया। दो टूक कह दिया कि उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल के बंटवारे की कतई हामी नहीं। अलबत्ता जीटीए को ज्यादा अधिकार देकर क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति की पक्षधर जरूर है। बेचारे बिमल गुरुंग को समझ ही नहीं आ रहा कि जाएं तो जाएं किस राह। ममता से तो वैसे भी कोई उम्मीद थी नहीं पर भाजपा के बरताव से भी खुद को छला महसूस कर रहे हैं वे।
चोट तपते लोहे पर
मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन फिलहाल भले ठंडा पड़ गया हो पर कांग्रेस को किसानों से काफी उम्मीदें हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा विरोधी माहौल को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती सूबे की प्रमुख विपक्षी पार्टी। तभी तो भाजपा की किसान संदेश यात्रा के जवाब में उसने भी किसान स्वाभिमान यात्रा शुरू कर दी है। पार्टी के सूबेदार अरुण यादव और प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश ने तमाम कद्दावर नेताओं की मौजूदगी में पिछले गुरुवार को किया इस यात्रा का एलान। समापन दस जुलाई को लहार में होगा। शिवराज चौहान के व्यापंम और डंपर घोटालों का घड़ा बकौल मोहन प्रकाश किसान ही फोड़ेंगे। मोहन प्रकाश ने बेहिचक मान लिया कि दिग्विजय सिंह की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने एक दशक में जो बंटाधार किया था, उसकी सजा वे भुगत चुके हैं।

लेकिन शिवराज चौहान के शासनकाल में तो और ही ज्यादा बंटाधार हो गया है। दस जुलाई को हर कांग्रेसी अपने तहसील मुख्यालय पर एक घड़ा साथ लेकर पहुंचेगा। शिवराज सरकार के पाप का घड़ा बताएंगे उसे कांग्रेसी। रेत और झूठे विज्ञापन जैसी सामग्री भर महिलाओं और किसानों के हाथों से फुड़वाएंगे उस घड़े को। किसानों की कर्जमाफी की मांग को वाजिब ठहरा रहे हैं अपनी स्वाभिमान यात्रा के दौरान कांग्रेसी। मोहन प्रकाश ने भाजपा को चक्रव्यूह में फंसाने के लिए सवाल उठाया है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब में अगर किसानों की कर्जमाफी हुई है तो मध्यप्रदेश में क्यों नहीं?

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