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पश्चिम बंगाल में बाढ़ ने मचाया कोहराम

करीब एक दर्जन लोग मौत के शिकार हो चुके हैं। पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस तबाही को बाढ़ मानने को तैयार ही नहीं।

Author July 31, 2017 3:53 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फाइल फोटो)

दीदी की ना-नुकुर
बाढ़ ने तो कोहराम ही मचा दिया है पश्चिम बंगाल में। एक हफ्ते तक लगातार बारिश हो तो जनजीवन अस्त-व्यस्त होगा ही। सूबे के दक्षिणी क्षेत्र के छह जिलों के हाल कुछ ज्यादा ही बेहाल हैं। छोटी-बड़ी सभी डेढ़ दर्जन नदियां ऊफान पर हैं। सैकड़ों गांव जलमग्न हैं तो हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसल बर्बाद हो चुकी है। करीब एक दर्जन लोग मौत के शिकार हो चुके हैं। पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस तबाही को बाढ़ मानने को तैयार ही नहीं। अलबत्ता हजारों लोगों को डूब वाले इलाकों से निकाल कर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया गया है। तबाही के लिए ममता ने ठीकरा दामोदर घाटी निगम के सिर फोड़ा है। बाढ़ के बजाय ममता को बाढ़ जैसी दिख रही है हालत।

निगम पर अतिरिक्त पानी छोड़ कर तबाही लाने का आरोप लगाया है। ऊपर से यह शिकायत अलग कि वे तो 2012 से ही केंद्र सरकार से कहती आ रही हैं कि दामोदर घाटी निगम के बांधों के जलाशयों की गाद निकाली जाए। गाद भर जाने से गहराई कम हो गई है इन जलाशयों की। लिहाजा जैसे ही बारिश आती है, झारखंड से भारी मात्रा में अतिरिक्त पानी पश्चिम बंगाल में छोड़ दिया जाता है। पाठकों को याद दिला दें कि दो साल पहले भी ममता सरकार ने बाढ़ और सूखा राहत कार्यों पर अपने खजाने से साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे। केंद्र ने इस मद में फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी ममता को। इस बार भी राज्य सरकार ने यों सचिवालय में निगरानी के लिए नियंत्रण कक्ष स्थापित कर रखा है। प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री भी वितरित हुई है। पर बाढ़ को बाढ़ के नजरिए से देखने को ममता तैयार नहीं।

एक पंथ दो काज
संपतिया उइके को बनाया है भाजपा ने मध्य प्रदेश में राज्यसभा की इकलौती सीट के उपचुनाव में अपना उम्मीदवार। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे के निधन से खाली हुई थी यह सीट। उइके के नाम के एलान ने हर किसी को हैरान कर दिया। दावेदारों में कई धुरंधर जो थे। मसलन, कृष्ण मुरारी मोघे, माखन सिंह चौहान, विनोद गोटिया, डाक्टर जमदार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा आदि। पर बाजी मार ली आदिवासी महिला उइके ने। इससे पहले भी भाजपा ने महाकौशल क्षेत्र की अनुसुईया उइके को राज्यसभा में भेज कर सबको चौंकाया था। अब तो अनुसुईया राष्ट्रीय जनजाति आयोग की उपाध्यक्ष भी हैं। मंडला जिले से दूसरी बार जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई थी संपतिया। उन्हें याद है कि जब शिवराज सिंह चौहान पार्टी के युवा मोर्चे के सूबेदार थे तब वे सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षक थीं। 1994 में पहली बार सरपंच बनीं और तभी से पार्टी में भी कोई न कोई दायित्व संभालती रहीं। फिलहाल भी मध्य प्रदेश भाजपा की मंत्री ठहरीं। लेकिन राज्यसभा के लिए नाम आया तो विरोधी भी सक्रिय हो गए।

भ्रष्टाचार के आरोप होने का खुलासा हुआ। कांग्रेस के नेता अजय सिंह ने संपतिया पर सोलर घोटाले में शामिल होने का बाकायदा आरोप जड़ा। कांग्रेस के ही केके मिश्र ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही वार कर दिया। याद दिलाया कि एक तरफ तो वे नीतीश कुमार को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने पर बधाई देते हैं पर दूसरी तरफ भाजपा की बात आए तो भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदलते देर नहीं लगती। इस चयन के पीछे शिवराज चौहान की भूमिका मुख्य बता रहे हैं भाजपाई। वे चाहते ही नहीं कि कोई कद्दावर नेता दिल्ली जाए। वैसे भी उनके पास गिनाने को कारण हैं ही। मसलन सूबे में आदिवासी आबादी बीस फीसद है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को जीतना है तो आदिवासियों के बीच यह संदेश देना ही होगा कि भाजपा उनकी भागीदारी में यकीन रखती है। एक तो आदिवासी ऊपर से महिला। हल्दी लगी न फिटकरी और रंग दोहरा।

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