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राजपाट- हांकने की होड़

नए मतदाता तो जानते भी नहीं होंगे कि दो दशक पहले तक उम्मीदवारों को एक साथ कई-कई सीटों से चुनाव लड़ने की छूट थी।

Author February 20, 2017 5:15 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

नए मतदाता तो जानते भी नहीं होंगे कि दो दशक पहले तक उम्मीदवारों को एक साथ कई-कई सीटों से चुनाव लड़ने की छूट थी। तभी तो सस्ती शोहरत के लिए मदनलाल धरती पकड़ और भगवती प्रसाद दीक्षित घोड़ेवाला जैसे जनाधारविहीन लोग एक साथ सात-सात सीटों से पर्चे दाखिल करने के लिए चर्चित थे। तब कई जगह तो मतपत्र इतना लंबा चौड़ा होता था कि अखबार का साइज भी शरमा जाए। जमानत राशि बढ़ा कर और एक साथ अधिकतम दो सीटों पर ही चुनाव लड़ सकने की बंदिश लगवा कर चुनाव आयोग ने मतदान प्रक्रिया की राह आसान बना दी। लेकिन दो जगह से एक साथ लड़ने की छूट देने का भी तो कोई औचित्य नहीं दिखता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव दोनों ने 2014 का लोकसभा चुनाव दो-दो सीटों से ही लड़ा था। दोनों ही अपनी दोनों सीटों से जीते भी। मोदी को राजकोट और मुलायम को मैनपुरी से इस्तीफा देने में हित लगा। दोनों जगह उपचुनाव कराना पड़ा और इस तरह पैसे की बर्बादी तो हुई ही दोनों इलाकों के मतदाताओं को अनावश्यक तकलीफ भी उठानी पड़ी।

कहने को मोदी बार-बार चुनाव के विरोधी हैं। दलील कोई कुछ भी दे पर हकीकत यही है कि दो जगह से वही लड़ता है जिसे एक सीट पर जीत का पक्का भरोसा नहीं होता। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत का भी भरोसा डिगा होगा तभी तो एक साथ हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दो सीट से चुनावी जंग लड़ रहे हैं। दोनों ही सीटों पर पिछले चुनाव में भाजपा जीती थी। मुख्यमंत्री बने थे तो हरिद्वार के लोकसभा सदस्य थे। इस्तीफा देकर विधानसभा उपचुनाव धारचूला से लड़ा और जीता। इस बार धारचूला से क्यों नहीं लड़े। पिथौरागढ़ में है धारचूला। कुमाऊं के पर्वतीय इलाके के ही तो वाशिंदे हैं। जाहिर है कि उपचुनाव में लंबे चौड़े वायदे किए थे। उन्हें पूरा करना तो दूर सत्ता सुख की व्यस्तता के चलते इलाके की सुध तक नहीं ली जीतने के बाद। रूठे मतदाताओं के गुस्से का शिकार बनने के डर ने पर्वतीय नेता को सूबे के मैदानी क्षेत्र में जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन सियासी पंडित हरिद्वार ग्रामीण में उनके लिए खतरा मान रहे हैं। मुसलमान वोट के मोह में किया था इस सीट का चयन। पर बसपा के मुकर्ररम अली ने चिंता बढ़ा दी है।

ऊपर से भाजपा के स्वामी यतीश्वरानंद ने अपनी सीट बचाने के फेर में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण में पूरी ताकत झोंक दी। तो क्या शीला दीक्षित और भुवनचंद खंड़ूड़ी की तरह वे भी मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा चुनाव हार सकते हैं? रावत के विरोधी तो यही दावा कर रहे हैं। हरीश रावत ने पहाड़ के विकास के दावे किए तो विरोधियों ने मखौल उड़ाया कि जिसने पहले कुमाऊं (अल्मोड़ा) को छोड़ हरिद्वार (गढ़वाल का मैदान) को अपनाया और अब धारचूला (पर्वतीय क्षेत्र) को छोड़ हरिद्वार ग्रामीण व किच्छा (मैदानी क्षेत्र) से सरोकार जोड़ लिया। पर्वतीय क्षेत्र का वह पलायनवादी भगोड़ा क्या भला करेगा। ऊपर से कांग्रेस के पास उत्तराखंड में अब और कोई कद्दावर नेता बचा नहीं। सब तो पहले ही भगवा चोला पहन चुके हैं। हां, आलाकमान से मिले फ्रीहैंड का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी रावत ने। खुद तो दो सीटों से लड़ ही रहे हैं, सालों की भी मौज करा दी है। रंजीत रावत रामनगर से तो गोविंद सिंह कुंजवाल जागेश्वर और करण माहरा रानीखेत से किस्मत आजमा रहे हैं। जोरू के एक भाई महेंद्र माहरा को पहले ही राज्यसभा भेज दिया जीजा जी ने।

 

 

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