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राजपाट: भीगी बिल्ली, बोया पेड़ बबूल

भाजपा ने 282 सीटें जीत ली तो ये दल चूं-चपड़ नहीं कर पाए। ले-देकर रामविलास पासवान, अनंत गीते और सिमरत कौर बादल कैबिनेट मंत्री तो जरूर बन गए पर महकमे मलाईदार नहीं ले पाए।

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भीगी बिल्ली

नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में उभार के बाद छोटे दलों की सौदेबाजी की औकात कम हुई है। लोकसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी थे- शिवसेना, अकाली दल, अपना दल, लोकजनशक्ति पार्टी व रालोसपा। लेकिन भाजपा ने 282 सीटें जीत ली तो ये दल चूं-चपड़ नहीं कर पाए। ले-देकर रामविलास पासवान, अनंत गीते और सिमरत कौर बादल कैबिनेट मंत्री तो जरूर बन गए पर महकमे मलाईदार नहीं ले पाए। अनंत गीते की पार्टी शिवसेना ने तो दबाव भी बनाया था महकमा बदलवाने का। पर मोदी अड़ गए। मजबूरी में बेचारे गीते को देर-सबेर समर्पण करना पड़ा। अपना दल की अनुप्रिया पटेल और रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा के हिस्से राज्यमंत्री की हैसियत भी बामुश्किल आ पाई। अनुप्रिया की पार्टी ने दो सीटें जीती थी। मोदी का कमाल है कि अपना दल की एकता ही बिखर गई। इसी तरह रालोसपा के भीतर भी फूट है। उपेंद्र कुशवाहा तभी तो चाह कर भी मोदी को आंख नहीं दिखा पा रहे जबकि समाजवादी होने के नाते बागी तेवर तो मिजाज रहा है। बिहार में नीतीश कुमार का विरोध करने के लिए राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देने से भी गुरेज भी किया था।

आजकल प्रधानमंत्री की तारीफ भी कर रहे हैं और यह शिकायत भी कि वे गलत लोगों से घिरे हुए हैं। अति पिछड़ी नाई जाति में जन्मे कद्दावर समाजवादी कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने और पटना का नाम पाटलिपुत्र करने की मांग की है। साथ ही सावित्री बाई फूले की जयंती को महिला शिक्षक दिवस के रूप में मनाने पर भी जोर दिया है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, पर अमित शाह ने घुड़की दे दी। अपना दल और सुहेलदेव की भासपा ने भाजपा से यूपी में मिल कर विधानसभा चुनाव लड़ा। दोनों को सफलता भी मोदी के सहारे अच्छी मिली है। पर मंत्री पद की सौदेबाजी नहीं कर पाएंगे। भाजपा के अपने ही इतने विधायक हैं कि किसे मंत्री बनाएं और किसे छोड़ें का द्वंद्व राजस्थान की तरह कायम रहेगा।
बोया पेड़ बबूल

बहिनजी का सियासी वजूद खतरे में पड़ गया है। कांशीराम होते तो ऐसी गत देख कितने दुखी होते। अपनी मेहनत से पहले बामसेफ फिर डीएस-4 और 1984 में बहुजन समाज पार्टी बना कर दबे-कुचले लोगों खासकर दलितों के जीवन में सुधार का सपना संजोया था उन्होंने। भीमराव आंबेडकर के अधूरे मिशन को यकीनन उन्होंने ही आगे भी बढ़ाया। अन्यथा यूपी जैसे देश के सबसे बड़े सूबे में एक दलित महिला चार बार मुख्यमंत्री कहां बन सकती थी। पंजाब के कांशीराम ने अपने संगठन कौशल से न केवल पंजाब बल्कि यूपी, हरियाणा, मध्यप्रदेश व राजस्थान में भी बसपा की जमीन तैयार की थी। राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त पार्टी बनवा दिया था। पाठकों को बता दें कि उन्हीं की रणनीति का अंजाम था कि 1996 में मध्यप्रदेश की सतना सीट पर बसपा के फूल सिंह बरैया ने कांग्रेस के धुरंधर अर्जुन सिंह को लोकसभा चुनाव में शिकस्त दे दी थी। आर्थिक तंगी के बावजूद कांशीराम टिकट बेचने के कभी हिमायती नहीं रहे। लेकिन उनके मिशन को आगे बढ़ाने का दम भरने वाली मायावती राह भटक गईं। दलितों के उत्थान के नाम पर सत्ता में आईं। पर उनका कम अपना ज्यादा उत्थान करने लगीं। ऊपर से न किसी की अहमियत और न पार्टी में किसी का वजूद बढ़ने दिया। उसी का अंजाम है कि बीस फीसद का मुकम्मिल वोटबैंक लेकर भी वे खाली हाथ रह गईं। यूपी के बाहर तो पार्टी का कोई नाम लेवा बचा ही नहीं। यूपी में भी चूक दर चूक करती गईं। लोकसभा चुनाव में ही मोदी की आंधी ने उनके गैरजाटव दलितों और अति पिछड़ों को अपने साथ बहा लिया था। पर वे फिर भी नहीं संभली। खुलेआम सांप्रदायिक आधार पर सियासत करने लगीं। मुसलमानों को 97 टिकट दे भाजपा का खौफ दिखाते वक्त भूल गईं कि 1995, 1997 और 2002 में उन्होंने भाजपा से चुनाव बाद हाथ मिलाया था। ऐसे में मुसलमानों को वे भाजपा का खौफ दिखाएं तो कैसे भरोसा कर सकते थे मुसलमान। हुआ भी यही। उनके दलित वोट बैंक में भी इससे बेचैनी बढ़ी।

विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के वक्त ही गुलाम नबी आजाद ने उनसे मिलकर चुनाव पूर्व गठबंधन की पेशकश की थी। पर वे अपनी अकड़ में रहीं। चुनाव पूर्व गठबंधन से साफ इनकार कर दिया। 2007 में सर्व जनहिताय के उनके नारे ने उतना जादू नहीं किया था जितना मुलायम सरकार के खिलाफ जंगल राज के उनके नारे से लोगों का आकर्षण बढ़ा था। पांच साल सत्ता में रहते हुए न दलितों के हितों की चिंता की और न सर्वजन की। अलबत्ता अपनी मूर्तियों और पार्कों के निर्माण व बंपर भ्रष्टाचार में ही लगी रहीं। जिसका खमियाजा 2012 में 80 सीटों पर सिमट कर भुगता। लेकिन सबक फिर भी नहीं लिया। मुलाकात तक का जो नेता अपने समर्थकों से जजिया की तरह शुल्क वसूले उसका हश्र तो एक ऐसा ही होना भी था। अब भी संभल जाएं तो भविष्य बेहतर हो सकता है। पर उसके लिए विधिवत सांगठनिक ढांचा, वक्त की जरूरत के हिसाब से सियासी लचीलापन और दागदार व्यक्तित्व की छवि से बाहर निकलना पड़ेगा। शुभ संकेत यही है कि उनके प्रतिद्वंद्वी अखिलेश यादव ने जरूरत पड़ने पर उनके साथ हाथ मिलाने से कोई गुरेज नहीं होने की बात कह दी है। मायावती को भूलना नहीं चाहिए कि बसपा का असली विस्तार 1991 और 1993 के दौरान सपा के साथ दोस्ती के बाद ही संभव हो पाया था।

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