ताज़ा खबर
 

राजपाट: सियासी शतरंज

ग्रह नक्षत्र ही खराब चल रहे हैं कांग्रेस पार्टी के। पार्टी को अपने किए कामों का श्रेय नहीं मिलता। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते 1989 में अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी थी। पर सारा श्रेय भाजपा ने लूट लिया।

Author Updated: December 5, 2020 8:46 AM
Raajpatपश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी।

दक्षिण में कर्नाटक को छोड़ भाजपा को किसी और राज्य में फिलहाल बड़ी सफलता मिलने की संभावना कम है। पर असम और त्रिपुरा में सत्ता हासिल करने के बाद पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा काफी उत्साहित है। लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर उसने ममता बनर्जी को अल्टीमेटम तो पहले ही दे दिया था। विधानसभा चुनाव जीतने के लिए तृणमूल कांग्रेस में सेंध मारने की कोई कसर पार्टी छोड़ नहीं रही। ममता दीदी विपक्ष के किसी भी दूसरे नेता की तुलना में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों के निशाने पर कहीं ज्यादा हैं। तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अब तक भाजपा में आ चुके हैं। समस्या सिर्फ उस चेहरे को तलाशने की है जिसे ममता बनर्जी के विकल्प के तौर पर चुनाव में पार्टी की तरफ से पेश किया जा सके। क्रिकेट खिलाड़ी सौरभ गांगुली पर डोरे डाल रहे हैं भाजपा के कई धुरंधर। पर गांगुली ने अभी तक सियासी खेल में हाथ आजमाने की हामी नहीं भरी है। ममता को कमजोर करने के लिए भाजपा सुवेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर तृणमूल नेतृत्व से नाराज नेताओं को साथ लाने के लिए दिन रात एक किए है।

सूबे के पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय मध्यप्रदेश की राजनीति का मोह छोड़ पूरा फोकस पश्चिम बंगाल पर ही लगा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव से असंतोष है। नाराजगी की दूसरी वजह चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को दीदी द्वारा ज्यादा अहमियत दिया जाना भी बताई जा रही है। सुवेंदु अधिकारी को फिलहाल तो भाजपा का दामन थामने से सौगत राय और सुदीप बंदोपाध्याय ने रोक लिया है। पर भाजपाई उन्हें लेकर ज्यादा ही आशान्वित दिखते हैं। भाजपा के पश्चिम बंगाल में संभावनाएं तलाशने के पीछे मुसलिम आबादी ज्यादा होना भी है। ध्रुवीकरण के लिए भगवा ब्रिगेड एकदम तैयार है। कुछ मदद एआइएमआइएम के ओवैसी भी बिहार की तरह यहां भी अपनी वोट कटवा भूमिका से करेंगे ही। वाममोर्चा और कांग्रेस अपना तेज पहले ही गंवा चुके हैं।

रावत बनाम रावत
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की चिंता करते दिखने लगे हैं। विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय बचा भी नहीं है। पार्टी के कई विधायकों और दूसरे नेताओं को मलाईदार पदों पर दनादन तैनाती दे डाली। कोरोना के कारण लागू हुई पूर्णबंदी ने सरकारी नौकरियों के इच्छुक कई युवक-युवतियों को उम्र निकल जाने की चिंता में डुबो दिया था। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हाल ही में अधिकतम आयु सीमा छह महीने बढ़ाकर उनकी निराशा दूर कर दी। अगले महीने हरिद्वार में आयोजित होने वाले कुंभ की तैयारियां भी तेज कर दी। हर की पौड़ी को सरकारी दस्तावेजों में नदी के बजाए नहर कहने से नाराज पंडों को खुश करने के लिए वापस नदी नाम बहाल कर दिया। अपने भरोसेमंद मंत्री मदन कौशिक और मुख्य सचिव ओमप्रकाश की सलाह को गंभीरता से ले रहे हैं।

गुरुवार को त्रिवेंद्र सिंह रावत हर की पौड़ी पर गंगा पूजन में व्यस्त थे तो उसी वक्त पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत भी हर की पौड़ी पर ही राज्य सरकार की बुद्धि शुद्धि के लिए घंटे भर की मौन साधना में लीन थे। उन्होंने राज्य सरकार पर कुंभ की आड़ में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। हरीश रावत की नजर अगले विधानसभा चुनाव पर टिकी है। यह बात अलग है कि मुख्यमंत्री पद के उनके ख्वाब को उनके कुछ पार्टी नेता ही पूरा नहीं होने देने की तिकड़म भिड़ा रहे हैं। उनके करीबियों गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रदीप टम्टा उनके मुख्यमंत्री काल की उपलब्धियों को दर्शाने वाली फिल्म पत्रकारों को दिखा रहे हैं।

पिछले चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत व जसपाल आर्य जैसे नेताओं को अब भाजपा में घुटन होने लगी है। वे अपनी मूल पार्टी में वापसी चाहेंगे। हरीश रावत इसमें अवरोध बने हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत का प्रभुत्व इसी तरह बरकरार रहा तो बहुगुणा व हरक सिंह रावत जैसों को भाजपा में अंधकारमय ही दिखेगा अपना सियासी भविष्य।

नक्षत्र दोष
ग्रह नक्षत्र ही खराब चल रहे हैं कांग्रेस पार्टी के। पार्टी को अपने किए कामों का श्रेय नहीं मिलता। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते 1989 में अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी थी। पर सारा श्रेय भाजपा ने लूट लिया। मनमोहन सिंह ने आधार कार्ड की योजना लागू की। पर सबसिडी की रकम पात्रों के बैंक खातों में सीधे भेजकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में आधार काम आया मोदी सरकार के। जाते-जाते कितनी तेजी से आंध्र का विभाजन किया था यूपीए सरकार ने 2014 में।

तेलंगाना को अलग राज्य भी बनाया और उसका कोई फायदा भी नहीं मिला। अलबत्ता कभी कांग्रेस का सबसे पुख्ता दुर्ग रहे दक्षिण के इस राज्य का बंटवारा हो जाने के बाद कांग्रेस का सफाया ही हो गया। तेलंगाना को राज्य बनवाने का श्रेय मिला तेलंगाना राष्टÑ समिति को। अब हैदराबाद में नगर निगम चुनाव हुआ तो ओवैसी की एआइएमआइएम को चुनौती देती दिखी भाजपा। योगी आदित्यनाथ से लेकर अमित शाह तक गए प्रचार करने। पर कांग्रेस की चर्चा इस चुनाव में दूर तक नहीं सुनाई दी। साफ है कि राज्य का बंटवारा भी किया और हाथ पल्ले फिर भी कुछ नहीं पड़ा। खुदा ही मिला न विसाले सनम। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।