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राजपाटः हाल बेहाल

ज्योतिरादित्य सिंधिया खुली बगावत पर उतारू हैं। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते हैं। फिलहाल कमलनाथ ही मुख्यमंत्री और पार्टी की सूबेदारी दोनों संभाले हैं। दिग्विजय सिंह भी इस गुटबाजी को हवा दे रहे हैं। लोकसभा चुनाव में दिग्गी और सिंधिया दोनों ही हार गए थे।

राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तो दे दिया पर पार्टी के नेता उनके इतर किसी को नेतृत्व सौंपने को तैयार नहीं। कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी को अनिच्छा के बावजूद नेतृत्व संभालना पड़ रहा है।

देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी में लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही अजीबोगरीब उठापटक जारी है। जैसे नेतृत्व विहीन हो गई हो देश में सबसे ज्यादा दिनों तक राज करने वाली यह पार्टी। राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तो दे दिया पर पार्टी के नेता उनके इतर किसी को नेतृत्व सौंपने को तैयार नहीं। कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी को अनिच्छा के बावजूद नेतृत्व संभालना पड़ रहा है। सूबों में गुटबाजी शिखर पर है। अनुशासन का कोई नामोनिशान नहीं।

पार्टी के नेता नेहरू गांधी परिवार के बाहर किसी को कमान सौंपन के मूड में नहीं लगते। राहुल तैयार नहीं। वे अपनी हरकतों से उपहास का पात्र बनते जा रहे हैं। या तो उन्हें जिद छोड़ पार्टी जनों की अनुनय-विनय स्वीकार कर अध्यक्ष पद संभाल लेना चाहिए। अन्यथा प्रियंका गांधी साहस कर यह जिम्मा संभालें। सोनिया गांधी की सेहत अब पहले जैसी रही नहीं। सो नुकसान पार्टी का हो रहा है। मजबूत विपक्ष का होना स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत मानी जाती है। कांग्रेस की कमजोरी ने भाजपा को बाहुबली बना दिया है। सबसे ज्यादा खस्ता हालत मध्यप्रदेश की है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया खुली बगावत पर उतारू हैं। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते हैं। फिलहाल कमलनाथ ही मुख्यमंत्री और पार्टी की सूबेदारी दोनों संभाले हैं। दिग्विजय सिंह भी इस गुटबाजी को हवा दे रहे हैं। लोकसभा चुनाव में दिग्गी और सिंधिया दोनों ही हार गए थे। हताशा में ज्योतिरादित्य अपनी ही सरकार पर लगातार इस अंदाज में वार कर रहे हैं, जैसे वे विपक्ष के नेता हों। पर सोनिया गांधी अध्यक्ष की उलझन सुलझाने को तैयार नहीं। कर्नाटक की गुटबाजी भी किसी से छिपी नहीं। इस गुटबाजी का फायदा उठाकर ही तो भाजपा वहां सरकार बना पाई थी। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के बीच छत्तीस का आंकड़ा है।

सिद्धू इसी हफ्ते दिल्ली आकर सोनिया से मिले थे। वे पार्टी में हैसियत नहीं मिलने की दशा में पार्टी छोड़ भी सकते हैं। लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर कैप्टन को बगावत के लिए उकसाने का जोखिम आलाकमान उठा नहीं सकता। उत्तराखंड में भी पार्टी नेताओं की गुटबाजी के कारण त्रिवेंद्र रावत की भाजपा सरकार बेफिक्र है। दिल्ली चुनाव की हार के बाद तो अनुशासनहीनता सारी हदें पार कर गर्इं। बयानबाजी के हमाम में शशि थरूर जैसे सुलझे हुए नेता भी कूद पड़े हैं। कोई चमत्कार ही बचा सकता है अब इस पार्टी को और डूबने से।

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