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राजपाटः खुशफहमी काफूर

जब संक्रमण नहीं था तो ये कलेक्टर कोरोना के नायक बन गए थे। अब उनकी हालत खस्ता है। कई जगह तो संक्रमितों का आंकड़ा सौ को पार कर चुका है और स्थिति बेकाबू ही है।

Author Published on: May 9, 2020 2:26 AM
राजस्थान को ही लें। जो जिले कल तक संक्रमण मुक्त होने पर इठला रहे थे, वे ही अचानक कोराना के मकड़जाल में फंस गए हैं।

कोराना अभी भी एक रहस्यमय वायरस ही बना हुआ है। कौन कब संक्रमित हो जाए, कोई नहीं जानता। यही बात प्रभावित इलाकों पर भी लागू होती है। राजस्थान को ही लें। जो जिले कल तक संक्रमण मुक्त होने पर इठला रहे थे, वे ही अचानक कोराना के मकड़जाल में फंस गए हैं। इस समय 33 में से 29 जिले कोरोना की चपेट में है। ज्यादातर जिलों में कोरोना ने दस्तक देर से दी। कई में तो पूर्णबंदी के आखिरी दौर में। कोरोना को लेकर जब पूर्णबंदी का पहला दौर शुरू हुआ तो राजधानी में बैठ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और आला अफसर लगातार वीडियो कांफेंसिंग के जरिए जिला कलेक्टरों से उनके जिलों का हाल लेते रहे। पूर्णबंदी के शुरुआती दौर में कई जिलों में एक भी मामला नहीं आया तो संबंधित कलेक्टर फूल कर कुप्पा हो गए और अपने इंतजामों को लेकर बढ़-चढ कर ऐसे दावे कर दिए कि सरकार की चिंता घट गई। पर कोरोना के कारण खुशफहमी ज्यादा दिन न रह पाई। जब संक्रमण नहीं था तो ये कलेक्टर कोरोना के नायक बन गए थे। अब उनकी हालत खस्ता है। कई जगह तो संक्रमितों का आंकड़ा सौ को पार कर चुका है और स्थिति बेकाबू ही है। सरकार के आला अफसर अब ऐसे कलेक्टरों को उनकी पुरानी वीडियो क्लिप दिखा कर पूछ रहे हैं कि बताओ कहां गए तुम्हारे इंतजाम। अब अचानक मरीज क्यों बढ़ रहे हैं। दरअसल प्रदेश के कोटा, अजमेर, भरतपुर, पाली, टोंक, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ, नागौर ऐसे जिले हैं जो शुरुआती दौर में पूरी तरह संक्रमण मुक्त थे। अब भीलवाड़ा और जयपुर में तो स्थिति सुधर रही है पर इन जिलों को लेकर सरकार की नींद उड़ी है। सरकार को हालात संभालने के लिए जयपुर से आला अफसरों को भेजना पड़ रहा है। रही आत्ममुग्ध कलेक्टरों की बात तो बेचारे पानी पी-पीकर कोरोना को कोस रहे हैं।

रुतबा बेमिसाल
उत्तराखंड में पिछले दिनों राज्य सरकार और नौकरशाहों की अच्छी खासी फजीहत देखने को मिली। यूपी के बाहुबली विधायक अमन मणि त्रिपाठी पर सूबे के आला अफसर ऐसे मेहरबान हुए कि पूर्णबंदी के केंद्र सरकार के प्रोटोकाल को ही धता बता दिया। बेशक चार में से तीन धाम के कपाट खुल गए हैं। पर श्रद्धालुओं को जाने की इजाजत तो नहीं। फिर बदरीनाथ के कपाट तो 15 मई को खुलेंगे। इसके बावजूद अमन मणि त्रिपाठी ही नहीं उनके काफिले में शामिल ग्यारह और लोगों को भी चार धाम की यात्रा के पास जारी कर दिए। सिफारिश राज्य के अपर मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की नाक के बाल समझे जाने वाले ओम प्रकाश ने की। फिर बेचारे देहरादून के कलेक्टर आशीष कुमार क्या करते? इससे पहले शनिवार को विधायक जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिवंगत पिता की तेरहवीं के रस्म में शामिल होने उनके घर गए थे। यानी यात्रा गोपनीय नहीं थी। अगले दिन काफिला योगी के पिता की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने के नाम पर बदरीनाथ धाम के लिए कूच कर गया। पर कर्ण प्रयाग में अफसरों ने अड़ंगा लगा दिया। विधायक को बदरीनाथ के कपाट नहीं खुले होने का वास्ता देकर समझाया। पर वे लगे यूपी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों की धौंस देने। अपर मुख्य सचिव का सिफारिशी पत्र काफी हो सकता था। पर एसडीएम भी अड़ियल निकले। विधायक को न केवल काफिले समेत वापस लौटा दिया बल्कि मीडिया में खबर भी प्रचारित करा दी। अमन मणि त्रिपाठी कहने को तो निर्दलीय हैं पर योगी आदित्यनाथ से निकटता का दम भरते हैं। महाराजगंज और गोरखपुर एक ही तो ठहरे। विधायक का अतीत भी कम चौंकाने वाला नहीं। पिता अमर मणि त्रिपाठी की दबंगई भी जगजाहिर थी। एक कवियत्री की हत्या के अपराध में वे उम्र कैद भुगत रहे हैं। पिता के चुनाव लड़ने में कानूनी अड़चन आई तो बेटा अमन मणि मैदान में कूद पड़ा और जीत भी गया। हालांकि उस पर भी अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है। सीबीआई अदालत में मुकदमा चल रहा है। फिलहाल जमानत पर हैं विधायक जी। बहरहाल उत्तराखंड से वापसी हुई तो बिजनौर में यूपी की सीमा में आए। यहां तीनों गाड़ियों को अफसरों ने आगे नहीं बढ़ने दिया और पूरे काफिले को गिरफ्तार कर लिया। बदनामी हुई तो उत्तर प्रदेश सरकार की सफाई भी आ गई कि मुख्यमंत्री ने नहीं भेजा था विधायक को बदरीनाथ। मुख्यमंत्री के बड़े भाई मानवेंद्र बिष्ट भी तैश में आ गए कि त्रिपाठी कौन होते हैं उनके पिता का कर्मकांड करने वाले। जो भी हो उत्तराखंड सरकार की छवि पर तो बट्टा लग ही गया। लीपापोती के अंदाज में सूबे के मंत्री मदन कौशिक ने बयान दिया है कि मामले की जांच होगी और जो दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सरकार कार्रवाई करेगी। कौन भरोसा करेगा इस दावे पर। सिफारिश करने वाले नौकरशाह ओम प्रकाश ठहरे मुख्यमंत्री के खासमखास। मौजूदा मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह जुलाई में रिटायर हो जाएंगे। उनकी कुर्सी के सबसे बड़े दावेदार 1987 बैच के ओम प्रकाश ही बताए जा रहे हैं। पर ओम प्रकाश विरोधी आइएएस लाबी खुश है कि इस विवाद में फंसने से हो सकता है कि उनका सपना अधूरा ही रह जाए।

कंधा भी नहीं मयस्सर
कोरोना जैसी क्रूर बीमारी पिछले पचास साल में तो नहीं दिखी। प्रकृति को चुनौती देने के विज्ञान के दंभ को इसने तोड़ा है। नवजात से लेकर नौजवानों और बुजुर्गों तक किसी को नहीं छोड़ा इस विषाणु ने। गनीमत है कि डेढ़ महीने की पूर्णबंदी के बाद उत्तराखंड सरकार ने तीर्थ पुरोहितों की मांग मान ली और हरिद्वार में हर की पैड़ी पर अस्थि विसर्जन व कर्मकांड की इजाजत दे दी। अन्यथा कोरोना ने तो जिंदगी को दूभर कर दिया है। संक्रमण से मरने वालों के परिवारजन या तो संक्रमित हैं या अलगाव में। लिहाजा अस्पताल में शव लेने को परिवारजन पहुंच ही नहीं पा रहे। चार लोगों का कंधा तक मयस्सर नहीं। मुखाग्नि देना तो दूर प्रियजनों के शवों को छूने तक से डर रहे हैं परिवार वाले। अंतिम संस्कार के तीसरे दिन अस्थियां जमा कर उन्हें नदी में प्रवाहित करने की न रस्म हो पा रही है, न दसवें, हवन और तेरहवीं जैसे कर्मकांडी संस्कार। आचार्य संजय त्रिपाठी कहते हैं कि तमाम धार्मिक और शास्त्र उन्मुख परंपराओं के निर्वाह से भी वंचित कर दिया है एक विषाणु ने सर्वशक्तिमान इंसान को। डर के मारे ब्राह्मण भी मृत्युभोज से बचने के लिए नए-नए बहाने बनाने को मजबूर हैं।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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