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राजपाटः बनते बिगड़ते रिश्ते

नीतीश कुमार की दुविधा अब साफ है। वे सत्ता का मोह भी नहीं छोड़ पा रहे और अपने सिद्धांतों की दुहाई भी देते रहते हैं। मसलन संसद में सीएए को पारित करा दिया लेकिन बिहार में विरोध के स्वर दिखे तो तपाक से पलटी मार गए कि एनआरसी लागू नहीं होने देंगे।

बिहार सीएम नीतीश कुमार, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

जनता दल (एकी) में सब सामान्य नहीं है। होता तो पवन वर्मा और प्रशांत किशोर जैसे नीतीश भक्त बगावत पर न उतरते। दोनों को पार्टी से बाहर होना पड़ा। हालांकि इसकी भूमिका उन्होंने खुद ही लिखी थी। दोनों नीतीश कुमार पर हमला दर हमला बोल रहे थे। उन पर झूठ बोलने का आरोप भी जड़ दिया। फिर पार्टी में कैसे रह पाते। नीतीश कुमार की दुविधा अब साफ है। वे सत्ता का मोह भी नहीं छोड़ पा रहे और अपने सिद्धांतों की दुहाई भी देते रहते हैं। मसलन संसद में सीएए को पारित करा दिया लेकिन बिहार में विरोध के स्वर दिखे तो तपाक से पलटी मार गए कि एनआरसी लागू नहीं होने देंगे। एनपीआर के सवालों में बदलाव के लिए भी कहेंगे।

दरअसल लड़ाई पार्टी में दूसरे नंबर की हैसियत को लेकर है। रामचंद्र प्रसाद सिंह, राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह, पवन वर्मा और प्रशांत किशोर सभी में नीतीश का सबसे करीबी दिखने की जंग लंबे समय से चल रही थी। बेशक चारों में केवल ललन सिंह ही सियासी शख्सियत हैं। बाकी तीनों की पृष्ठभूमि तो गैर-राजनीतिक ठहरी। रामचंद्र प्रसाद सिंह आइएएस अफसर रहे हैं। काडर बेशक यूपी था पर डेपुटेशन लेकर बिहार में नीतीश कुमार के प्रमुख सचिव रहे। लोकलुभावन योजनाओं के आर्किटेक्ट के तौर पर पहचान उसी दौरान बनाई। नीतीश के बिरादरी भाई होने से अहमियत ज्यादा बढ़ी। पवन वर्मा विदेश सेवा के अफसर थे। जबकि प्रशांत किशोर को सभी जानते हैं कि वे चुनावी रणनीतिकार हैं। ललन सिंह जेपी आंदोलन से निकले नेता ठहरे। नीतीश से दोस्ती पुरानी है। तीसरी बार लोकसभा में हैं।

लोकसभा का 2014 का चुनाव हार गए थे तो नीतीश ने एमएलसी बनाकर अपनी सरकार में मंत्री पद दिया था। बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब दोनों में अनबन हुई थी। आरसीपी सिंह दूसरी बार राज्यसभा में हैं। मोदी सरकार में मंत्री बनने की दोनों की ही महत्वाकांक्षा थी। पर मोदी दो कैबिनेट मंत्री पद देने को राजी नहीं थे। नीतीश दुविधा में पड़ गए कि इकलौता कैबिनेट मंत्री पद आरसीपी सिंह को दिलाएं या ललन सिंह को। आखिर में उन्होंने केंद्र सरकार से बाहर रहने का ही फैसला लिया। ललन सिंह और आरसीपी सिंह ने इसका ठीकरा प्रशांत किशोर के सिर फोड़ा कि उन्होंने नीतीश को गुमराह किया होगा। जो भी हो अब पवन वर्मा और प्रशांत किशोर दोनों के बोल नीतीश के प्रति बिगड़े हैं और लब्बोलुआब यही है कि वे नीतीश को अवसरवादी और पदलोलुप कहने में कतई नहीं झिझक रहे।

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