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राजपाटः पैंतरों की सियासत

बकौल कमलनाथ भाजपा के कई विधायक और असंतुष्ट नेता उनके संपर्क में हैं। पाठकों को याद होगा कि कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के कारण मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार को मार्च में इस्तीफा देना पड़ा था। बगावत ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में हुई थी।

Author Published on: May 16, 2020 2:45 AM
बकौल कमलनाथ भाजपा के कई विधायक और असंतुष्ट नेता उनके संपर्क में हैं।

मध्यप्रदेश की सियासत में कोरोना वायरस के प्रकोप के बावजूद ठहराव नहीं दिख रहा। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार जारी है। अपनी सरकार गंवाने के सदमे से कांग्रेस अभी तक बाहर नहीं आ पाई है। तभी तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का दर्द जुबान पर आ गया। उन्होंने अचानक फरमाया-भाजपा का अंदरूनी घमासान इस सरकार को ले डूबेगा। उपचुनाव आने दीजिए। बकौल कमलनाथ भाजपा के कई विधायक और असंतुष्ट नेता उनके संपर्क में हैं। पाठकों को याद होगा कि कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के कारण मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार को मार्च में इस्तीफा देना पड़ा था। बगावत ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में हुई थी। बदले में सिंधिया समर्थकों को राज्य सरकार में और खुद सिंधिया को केंद्र सरकार में मंत्री पद मिलना था। पर पूर्णबंदी के कारण शिवराज चौहान अपने मंत्रिमंडल का गठन नहीं कर पाए। डेढ़ महीने बाद किया भी तो सीमित। इसमें सिंधिया खेमे के केवल दो- गोविंद सिंह राजपूत और तुलसी सिलावट ही मंत्री बन पाए। पूर्णबंदी के कारण राज्यसभा चुनाव तो टला ही मध्यप्रदेश की 24 विधानसभा सीटों के उपचुनाव की घोषणा भी नहीं हो सकी है। दो सीटें भाजपा विधायकों के निधन से खाली हुई हैं। नतीजतन सिंधिया न अभी राज्यसभा सदस्य बन पाए न केंद्र में मंत्री। ऊपर से अटकलें अलग शुरू हो गईं कि भाजपा बगावत कर पार्टी में आए सभी 22 सिंधिया समर्थकों को उपचुनाव में टिकट देने के मूड में नहीं है क्योंकि कुछ के खिलाफ उनके क्षेत्रों में गुस्सा है और वे उपचुनाव हार सकते हैं। भाजपा की दुविधा यह है कि उसे 24 में से कम से कम 16 सीटों पर सफलता न मिली तो बहुमत का संकट होगा। उधर 22 बागियों वाली विधानसभा सीटों पर भाजपा के वे नेता बेचैन हैं जो 2018 में हारे थे। इन्हीं में से एक दीपक जोशी तो डंके की चोट पर धमकी दे रहे हैं कि पार्टी ने उन्हें सम्मान न दिया तो वे अन्य विकल्प तलाशेंगे। भाजपा के मुख्यमंत्री रहे कैलाश जोशी के बेटे हैं दीपक। वे शिवराज चौहान की पिछली सरकार में मंत्री थे। भाजपा के इस असंतोष का कांग्रेस भी फायदा जरूर उठाना चाहेगी। रही ज्योतिरादित्य सिंधिया की बात, तो वे अभी चुप हैं। न दिग्गी और उनके बेटे जयवर्द्धन के हमलों का जवाब दे रहे हैं और न अपनी नई पार्टी के प्रति अपनी बेचैनी का इजहार कर रहे हैं। अलबत्ता अपने लिए केंद्र में मंत्रिपद, इस्तीफा देने वाले अपने सभी 22 समर्थकों को उपचुनाव में टिकट और चौहान सरकार में एक दर्जन मंत्री पद का वादा जरूर भाजपा नेताओं को याद दिला रहे होंगे।

कोरोना के बहाने
खेल कोई भी हो, राजनीति में हर दल दूसरे को सियासत न करने की नसीहत देता है। पर सियासी दलों का तो काम ही सियासत ठहरा। वे भजन कीर्तन क्यों करेंगे। राजस्थान में भी दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा आपस में कोरोना-कोरोना खेल रहे हैं। पर तोहमत ऐसा करने की अपने विरोधी पर लगाते हैं। इसमें दो राय नहीं कि कोरोना से निपटने के राजस्थान सरकार के प्रयासों की हर स्तर पर सराहना हुई है। खासकर भीलवाड़ा में संक्रमण पर काबू पाने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अशोक गहलोत की पीठ ठोंकी। दूसरे राज्यों को उनसे सीखने की सलाह भी दी। यह बात अलग है कि राजस्थान के भाजपा नेता गहलोत सरकार पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे। वैसे गहलोत को जमीनी व सुलझा नेता माना जाता है। प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी के लिए ट्रेन चलाने की मांग सबसे पहले उन्होंने ही की थी। यही नहीं उनकी बाकी मांगों को भी केंद्र ने बेहिचक माना। मोदी सरकार ने आर्थिक पैकेज का एलान किया तो दलगत विरोध छोड़ गहलोत ने स्वागत किया। रही राजनीति की बात तो भाजपा और केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति वे हमेशा मुखर दिखते हैं। इसका बदला लेते हैं भाजपा के सूबेदार सतीश पूनिया और नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया। सूबे के सांसदों-विधायकों से हाल में गहलोत ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए वार्ता की तो गहलोत और कटारिया ने आपस में खूब चिकोटी काटी। गहलोत ने कटारिया को बेवजह आलोचना के लिए टोका तो कटारिया ने भी तपाक से कहा- आप मोदी जी की आलोचना छोड़ दीजिए। गहलोत ने जैसे ही कहा- आपसे अलग से बात करूंगा तो वार्ता में शामिल कांग्रेस-भाजपा दोनों के नेताओं ने ठहाके लगाए।

साख पर आंच
बलात्कार का मामला पुलिस में दर्ज हो जाने के बाद डाक्टर प्रणव पंडया खासे परेशान हैं। हरिद्वार स्थित चर्चित शांति कुंज मिशन के मुखिया हैं पंडया। इसके अलावा अपने देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, ‘अखंड ज्योति’ पत्रिका के संपादक और गायत्री परिवार के प्रमुख भी हैं। गायत्री परिवार की स्थापना आचार्य श्रीराम शर्मा ने की थी। पंडया श्रीराम शर्मा के शिष्य भी हैं और दामाद भी। गायत्री परिवार अध्यात्मवाद का पोषक है। इसके दुनिया भर में दस करोड़ से ज्यादा सदस्य होने का दावा किया जाता है। पंडया की सियासी गलियारों में भी अच्छी पैठ है। तभी तो भाजपा सरकार ने उन्हें राज्यसभा का नामित सदस्य बनाने की पेशकश की थी जो उन्होंने स्वीकार नहीं की थी। इतनी बड़ी हैसियत वाले व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगे तो हैरानी हर किसी को होगी। आरोप उन्हीं के आश्रम की एक सेविका ने लगाया है। साथ में उनकी पत्नी को भी संलिप्त बताया है। दिल्ली के विवेक विहार थाने में पांच मई को दर्ज इस मामले को हरिद्वार पुलिस के पास भेज दिया गया है क्योंकि घटना वहीं की बताई गई है। घटना दस साल पुरानी बताई गई है और आरोप लगाने वाली छत्तीसगढ़ की महिला तब नाबालिग थी। चूंकि मामला प्रतिष्ठित व्यक्ति से जुड़ा है, सो उत्तराखंड के डीजीपी ने तीन सदस्यीय जांच दल बना दिया ताकि सच्चाई सामने आ सके। पंडया की पीड़ा दोहरी है। एक तो यही कि उच्च राजनीतिक संपर्कों के बावजूद मामला उनके खिलाफ दर्ज कैसे हो गया। वे इसे सफेद झूठ बता रहे हैं। दूसरी यह कि गायत्री परिवार के करोड़ों सदस्यों में से पंडया के निर्दोष होने का भरोसा कितने करेंगे। अभी सिर्फ आरोप लगे हैं और मामले की जांच होनी बाकी है। जांच के बाद क्या सामने आएगा यह हम नहीं कह सकते हैं। लेकिन इतने गंभीर आरोप के बाद उनकी साख पर बट्टा तो लग ही गया है।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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