ताज़ा खबर
 
  • राजस्थान

    Cong+ 95
    BJP+ 81
    RLM+ 0
    OTH+ 23
  • मध्य प्रदेश

    BJP+ 102
    Cong+ 117
    BSP+ 5
    OTH+ 6
  • छत्तीसगढ़

    Cong+ 59
    BJP+ 22
    JCC+ 9
    OTH+ 0
  • तेलांगना

    TRS-AIMIM+ 87
    TDP-Cong+ 22
    BJP+ 2
    OTH+ 8
  • मिजोरम

    MNF+ 29
    Cong+ 6
    BJP+ 1
    OTH+ 4

* Total Tally Reflects Leads + Wins

राजपाट: बेढब चाल

सीबीआइ निदेशक ने खुद अपने नंबर दो हैसियत वाले अस्थाना पर गंभीर आरोप लगाए हैं तो अचानक पूर्व विशेष निदेशक आरके दत्ता ने सतर्कता आयोग को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

Author October 13, 2018 5:35 AM
राकेश अस्थाना (बाएं) और आलोक वर्मा (दाएं) के बीच विवाद।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को सरकारी पिंजरे में कैद तोता बता कर देश की सबसे प्रतिष्ठित समझी जाने वाली जांच एजंसी को झकझोर दिया था। भाजपा सरकार के कार्यकाल में विरोधियों के राजनीतिक आधार पर कार्रवाई के आरोप भी सहने पड़े इस केंद्रीय जांच एजंसी को। लेकिन पिछले कुछ महीनों से तो इस एजंसी की एक तरह से जग हंसाई ही हो रही है। इसके दो आला अफसरों की अनबन की खबरों से हर कोई हैरान है। अगर नहीं है तो सरकार। निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना एक-दूसरे को फूटी आंखों देखना पसंद नहीं कर रहे। नतीजतन सिरदर्द इसकी निगरानी का जिम्मा संभाल रहे केंद्रीय सर्तकता आयोग का बढ़ गया है। सीबीआइ निदेशक ने खुद अपने नंबर दो हैसियत वाले अस्थाना पर गंभीर आरोप लगाए हैं तो अचानक पूर्व विशेष निदेशक आरके दत्ता ने सतर्कता आयोग को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

दत्ता को मलाल है कि सरकार ने अनिल सिन्हा के रिटायर होने के बाद उन्हें एजंसी का निदेशक क्यों नहीं बनाया। सिन्हा की जगह आलोक वर्मा आ गए जो दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे। दत्ता को विशेष सचिव बना कर दूसरी जगह चलता कर दिया गया था। उन्हें मलाल है कि सतर्कता आयोग आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के विवाद की पड़ताल तो कर रहा है पर जब उनके साथ नाइंसाफी हुई थी तो चुप्पी साध गया था। दत्ता की आलोचना मुख्य सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी चुपचाप सह गए। दो अफसरों के इस झगड़े को तो सरकार सुलटा नहीं पाई थी कि निदेशक आलोक वर्मा ने एक और गुल खिला दिया। रफाल सौदे के खिलाफ पूर्व मंत्री अरुण शौरी और वकील प्रशांत भूषण को मुलाकात का वक्त दे दिया। यह मुलाकात मीडिया की सुर्खियां बनी तो सरकार की भृकुटि तनी। यह तो सीबीआइ निदेशक ने एकदम नई परंपरा जो डाल दी। पर आलोक वर्मा भी परवाह क्यों करें? सीबीआइ निदेशक को तो दो साल का निर्धारित कार्यकाल मिलता है। सरकार हटाना भी चाहेगी तो सुप्रीम कोर्ट का कोपभाजन बनेगी।

बम बम दीदी

ममता बनर्जी का हर फैसला जाने-अनजाने विवादास्पद हो जाता है। पश्चिम बंगाल की 28 हजार दुर्गापूजा समितियों को उन्होंने दस-दस हजार रुपए के आर्थिक अनुदान का एलान क्या किया, उनका सिरदर्द बढ़ा दिया इस फैसले ने। विरोध की शुरुआत इस बार मस्जिदों के इमामों की तरफ से हुई। भगवा ब्रिगेड तो विरोध कर नहीं सकती थी। उसके बाद एक वकील ने कोलकाता हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस मुद्दे को कानूनी जंग में फंसा दिया। दलील दी कि यह फैसला संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे का उल्लंघन है। ममता ने फैसला तो दस सितंबर को किया था। पर याचिका नौ दिन बाद दायर हुई। तृणमूल कांग्रेस को तो इस याचिका के पीछे भी भाजपा का हाथ दिखाई दे रहा है। जो ममता बनर्जी पर मुसलिम तुष्टिकरण का आरोप लगा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे अपनी जमीन तलाश रही है।

इस दांव से मुसलिम तुष्टिकरण का आरोप तो धुलेगा ही, सूबे के सबसे बड़े धार्मिक उत्सव के साथ सरोकार भी साबित होगा। हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि वह दुर्गा पूजा के लिए सरकारी खजाने का पैसा किस आधार पर खर्च करेगी। शुरू में अंतरिम रोक भी लगा दी थी पर राज्य सरकार ने दलील दी कि पूजा समितियों को अनुदान देने का सरकार को अधिकार है। सूबे के एडवोकेट जनरल किशोर दत्त की पैरवी चल गई और हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। लेकिन गुरुवार को याचिका दायर करने वाले वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दे दी। हाई कोर्ट के आदेश से दीदी ने राहत की सांस ली थी कि फिर अटका दी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सांस। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर एकतरफा रोक लगाने से इनकार कर विरोधियों के हौसलेपस्त कर दिए यानी अंतत: दीदी की ही हुई बम-बम।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App