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राजपाटः लड़ाई लाडलों की

राजस्थान में लोकसभा का चुनाव दो बड़े नेताओं के लाडलों की मौजूदगी से खासा रोचक हो गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत जोधपुर से पहली बार चुनावी जंग में कूदे हैं।

Author Published on: April 6, 2019 3:13 AM
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत जोधपुर से पहली बार चुनावी जंग में कूदे हैं। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह लगातार चौथी जीत के लिए झालावाड़ में डटे हैं।

राजस्थान में लोकसभा का चुनाव दो बड़े नेताओं के लाडलों की मौजूदगी से खासा रोचक हो गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत जोधपुर से पहली बार चुनावी जंग में कूदे हैं। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह लगातार चौथी जीत के लिए झालावाड़ में डटे हैं। समानता यह है कि जोधपुर से खुद अशोक गहलोत पांच बार सांसद रह चुके हैं तो झालावाड़ की संसद में वसुंधरा ने भी पांच बार ही नुमाइंदगी की। गहलोत और वसुंधरा अब सूबे की सियासत में रम चुके हैं तो उनके उत्तराधिकारी संसद की राह पर हैं। जोधपुर में वैभव का मुकाबला केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से है। शेखावत को संघी खेमे का भी समर्थन है। तो भी सामने मुख्यमंत्री का बेटा हो तो घबराहट स्वाभाविक है। आलाकमान के भी चहेते माने जाते हैं शेखावत। यह बात अलग है कि वसुंधरा उन्हें ज्यादा भाव नहीं देतीं। उलटे उनका विरोध ही करती रही हैं। उनके वीटो ने ही तो शेखावत को भाजपा का सूबेदार नहीं बनने दिया था। वसुंधरा की अदावत शेखावत को चुनाव में भी नुकसान तो करेगी ही।

वसुंधरा के समर्थकों की जोधपुर में कमी नहीं। जबकि मुख्यमंत्री का बेटा होने के कारण कांग्रेसियों की पूरी ताकत वैभव के पीछे नजर आ रही है। सादगी और शालीनता के बल पर नौजवान वैभव का पार्टी में कोई विरोध नहीं कर रहा। चुनाव भले पहली बार लड़ रहे हों पर पार्टी का काम तो वे डेढ़ दशक से कर रहे हैं। अभी भी प्रदेश कांग्रेस के महासचिव ठहरे। उधर झालावाड़ भी जनसंघ के जमाने से ही संघ परिवार की पकड़ वाला क्षेत्र रहा है। दुष्यंत सिंह को मुकाबले में कांग्रेस का कमजोर उम्मीदवार होने का भी फायदा मिलता दिख रहा है।

प्रमोद शर्मा पिछले दिनों ही भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। हालांकि पहले सूबे के खनिज मंत्री प्रमोद जैन भाया की पत्नी उर्मिला जैन का नाम चर्चा में था। लेकिन कांग्रेस ने वैश्य के बजाए इस बार दांव ब्राह्मण पर लगाना ठीक समझा। इससे ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप भी नहीं लगेगा। भले कुछ ब्राह्मण संगठनों ने इस पर भी मुंह बनाया है कि उन्हें कमजोर सीट पर टिकट दे दिया गया। पिछले साल अलवर और अजमेर में उपचुनाव की नौबत आई तो कांग्रेस ने भाजपा को हरा कर अपनी वापसी का संकेद दे दिया था। बदले हुए हालात में 2014 जैसे परिणाम की आस तो आलाकमान को भी नहीं होगी।

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