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राजपाट: सियासी खेल

पांच बार चुनाव जीते दोरजी शेरिंग लेप्चा की अगुआई में हुआ यह दल-बदल। अभी तक चामलिंग विपक्ष के नेता थे लेकिन अब भाजपा के लेप्चा बन गए।

Author Updated: August 17, 2019 4:00 AM
इमेज क्रेडिट-फेसबुक

सियासत में अब न मूल्यों के प्रति किसी की निष्ठा बची है और न सिद्धातों-नीतियों से नाता ही मुकम्मिल रह गया है। हर कोई दावा करता है कि वह देश और समाज की सेवा के लिए राजनीति में आया है। लेकिन हकीकत यह है कि सभी अपना भला पहले देखने लगे हैं। सिक्किम की सियासी उठापटक इसकी ताजा मिसाल है। जहां भाजपा को चुनाव में एक भी सीट नहीं मिल पाई थी। 25 साल से सत्ता भोग रहे सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता पवन चामलिंग पिछले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गए थे। उनकी पार्टी को 32 सदस्यीय विधानसभा में 15 सीटों पर कामयाबी मिल पाई थी। सत्रह सीटें जीत कर सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चे ने प्रेम सिंह तमांग के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। पर 32 में से तीन नेता एक के बजाए दो-दो सीटों से चुने गए।

लिहाजा जब उन्होंने दूसरी सीट छोड़ी तो सदन की वास्तविक सदस्य संख्या 29 ही रह गई। यानी मोर्चे के 16 और एसडीएफ के 13 सदस्य ही बचे। पर इसी हफ्ते भाजपा ने बड़ा दांव खेल दिया। चामलिंग की पार्टी के 13 में से दस विधायक भाजपा में शामिल हो गए। नियमानुसार दल विभाजन के लिए पार्टी की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो तिहाई सदस्यों का अलग होना जरूरी है। यानी आठ सदस्य भी होते तो भी दल-बदल की कार्रवाई से बच जाते। वे तो दस थे सो बेखटके भगवा पहन लिया।

पांच बार चुनाव जीते दोरजी शेरिंग लेप्चा की अगुआई में हुआ यह दल-बदल। अभी तक चामलिंग विपक्ष के नेता थे लेकिन अब भाजपा के लेप्चा बन गए। बेचारे चामलिंग अभी अपनी पार्टी को लगे झटके से उबर भी नहीं पाए थे कि उनके दो बचे सहयोगी विधायक भी दल-बदल कर सत्तारूढ़ सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चे में जा मिले और सत्तारूढ़ दल की सदस्य संख्या को 18 तक पहुंचा दिया।

दरअसल भाजपा की कोशिश यहां होने वाले तीन सीटों के उपचुनाव को जीतने की है। ताकि अपनी ताकत को दस से बढ़ा कर 13 कर सके। अब चामलिंग अपने दल के इकलौते सदस्य हैं सदन में। जिन्होंने दल-बदल किया है, उनके पास अपने फैसले को सही ठहराने के लिए तर्क भी हैं। मसलन जो भाजपा में गए वे अपने फैसले को वक्त का तकाजा बता रहे हैं। जबकि उन्हीं के जो दो साथी सत्तारूढ़ दल में शामिल हुए हैं उन्होंने भाजपा की आलोचना की है।

उनका तर्क है कि भाजपा ने अरुणाचल और असम में भी अपनी सरकार इसी खेल से बनाई थी। वे चाहे जो आलोचना करें पर भाजपा के लिए तो यह उपलब्धि ही मानी जाएगी कि जिस त्रिपुरा में उसका पहले कोई नाम लेवा भी न था, वहां अब उसकी सरकार है। असम में भी भाजपा की सरकार पहली बार ही बनी है। त्रिपुरा तो ठहरा छोटा राज्य। अगर पार्टी अपनी सरकार बनाने पर उतारू हो गई तो सत्तारूढ़ दल में सेंध लगाना भी अब असंभव कहां रह जाएगा। गोवा में भी तो पिछले दिनों कांग्रेस के दस विधायकों को थोक के भाव अपना कर क्षेत्रीय दलों और निर्दलियों के दबाव से मुक्त किया था पार्टी ने अपनी सरकार को।

अनिल बंसल

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