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राजपाटः छवि की फिक्र

हर मामले में नाहक टीका टिप्पणी का मर्ज न पालें। विपक्षी दल के किसी भी आयोजन में पंगा न डालें। लोगों को यकीन दिलाएं कि वे लोकतंत्र में आस्था रखते हैं।

Author August 10, 2019 4:36 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (Photo: ANI)

लड़ाकू और जुझारू छवि तो ममता बनर्जी की शुरू से रही हैै। बगावती तेवर न होते तो उन्हें अग्नि कन्या नाम न मिलता। यह बात अलग है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव जीतने की चिंता ने ममता को मिजाज बदलने पर मजबूर कर दिया है। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवा ली है तो सलाह को मानना मजबूरी हो गई। प्रशांत अब ममता की छवि बदलने के जतन कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से ममता को समझ आ चुकी है कि वे अपराजेय नहीं हैं।

तृणमूल कांग्रेस की 22 सीटों की तुलना में भाजपा की 18 को कम नहीं आंका जा सकता। दो से एक झटके में अठारह। प्रशांत किशोर यानि पीके की सलाह है कि भाजपा से मुकाबले के लिए उसी की तरह मजबूत और आदर्शवादी तो बनना ही होगा, कारपोरेट ढांचा भी अपनाना पड़ेगा। पीके की पहली सलाह आई है कि विपक्षी दलों की आलोचना करते वक्त तृणमूल कांग्रेस के लोग सोच समझकर और संभलकर बोलें।

हर मामले में नाहक टीका टिप्पणी का मर्ज न पालें। विपक्षी दल के किसी भी आयोजन में पंगा न डालें। लोगों को यकीन दिलाएं कि वे लोकतंत्र में आस्था रखते हैं। लोकसभा चुनाव में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की रैलियों और रथ यात्राओं में व्यवधान से नुकसान ही हुआ था सत्तारूढ़ पार्टी का। भाजपा नेताओं ने तृणमूल नेता के अलोकतांत्रिक व्यवहार को बड़ा मुद्दा बना दिया था। पार्टी के किसी नेता की सलाह पर तो ममता बनर्जी ने कभी ध्यान दिया नहीं, शायद रणनीतिकार पीके की सलाह को मान खुद को बदल लें तो बेशक मिल जाएगा उसका फायदा।


(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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