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राजपाटः दीदी का दम और हारे को हरिनाम

दीदी को भिड़ने के लिए कोई न कोई मुद्दा मिल ही जाता है। तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अब पार्टी के अपने विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

Author Published on: January 6, 2018 2:15 AM
दीदी को भिड़ने के लिए कोई न कोई मुद्दा मिल ही जाता है। तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अब पार्टी के अपने विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

दीदी को भिड़ने के लिए कोई न कोई मुद्दा मिल ही जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके जुझारू तेवरों के कारण ही उनके समर्थक बंगाल की शेरनी बताते हंै। ताजा मुद्दा असम से मिला है। वहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का पहला मसविदा प्रकाशित होते ही ममता ने बंगाली बनाम असमिया राग छेड़ दिया। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने की कवायद के पीछे केंद्र की भाजपा सरकार के साजिशाना इरादों का आरोप जड़ दिया। यही कि इस मसविदे से बंगालियों के नाम बाहर कर भाजपा असम से उन्हें खदेड़ना चाहती है। सो, केंद्र को चेतावनी दे डाली कि वह आग से न खेले। दरअसल 1951 में तैयार रजिस्टर को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में दुरुस्त किया जा रहा है ताकि असम के मूल नागरिकों की पहचान हो सके। 31 दिसंबर की आधी रात प्रकाशित हुए पहले मसविदे में 3.29 करोड़ आवेदकों में से महज 1.9 करोड़ के नाम ही नजर आए। ममता की मानें तो रोजगार की तलाश में बंगाली असम गए हैं। उन्हें वहां से खदेड़ने की योजना बन रही है। केंद्र की मोदी सरकार को बांटो व राज करो की नीति नहीं अपनाने के लिए आगाह भी कर दिया ममता ने। बात है भी एक हद तक ठीक कि रोजगार की तलाश में अपने देश में लोगबाग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं और फिर वहीं बस भी जाते हैं। पश्चिम बंगाल में भी दूसरे राज्यों के लाखों ऐसे ही प्रवासी काम कर रहे हैं। ममता ने लगे हाथ श्रेय भी ले लिया कि तृणमूल कांग्रेस आम आदमी के हित में बोलने वाली इकलौती पार्टी है और वह चुप नहीं रहेगी। असम में उपद्रव हुआ तो बंगाल उससे कैसे अछूता रह पाएगा। हालांकि उनकी सरकार अपने सूबे में रहने वाले असमिया लोगों के हितों और जान-माल की मुकम्मिल हिफाजत करेगी।

हारे को हरिनाम
हार कर भी उत्तराखंड के कांग्रेसी क्षत्रप चैन से बैठने को राजी नहीं। अपनी अनदेखी से आहत पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अब पार्टी के अपने विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। निशाने पर पार्टी के सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदयेश ठहरे। हरीश आजकल कुमाऊं का दौरा कर रहे हैं। इंदिरा हृदयेश के विधानसभा क्षेत्र हल्द्वानी और जिले ऊधमसिंह नगर में सक्रियता बढ़ा दी है। अपने समर्थकों को लामबंद कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व को विश्वास में लिए बिना धरने-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। एक तरह से अपनी समानांतर गतिविधियां चलाने वाली हरकत। पार्टी की फूट सड़क पर आए तो आए। दौरे की शुरुआत ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के आश्रम से की। वही ब्रह्मचारी जो हरिद्वार में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव में करारी हार का जायका ले चुके हैं। आश्रम में हरीश रावत की प्रेस कांफ्रेंस हुई तो पार्टी के जिला अध्यक्ष ही नहीं बाकी पदाधिकारियों ने भी मुंह मोड़ लिया। अलबत्ता पुरुषोत्तम शर्मा, राजेश शिवपुरी व पूर्व विधायक अंबरीश कुमार नजर आए। और तो और अब पूर्व सूबेदार किशोर उपाध्याय भी हरीश रावत के साथ आने को तैयार नहीं। हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़े और दोनों जगह ही हार गए। सो, उनके गुट में हारे हुए हताश नेताओं का जमावड़ा दिखता है। इसके उलट मौजूदा सूबेदार प्रीतम सिंह एक तो चकरोता सीट से लगातार चार चुनाव जीत चुके हैं। ऊपर से छवि भी साफगोई वाले मिलनसार और ईमानदार नेता की बना रखी है। शायद इन्हीं कारणों से राहुल गांधी के चहेते बन गए हैं। नहीं होते तो हरीश रावत के विरोध के बावजूद उन्हें सूबे में पार्टी की कमान भला क्यों सौंपते राहुल गांधी।

अनिल बंशल

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