ताज़ा खबर
 

राजपाटः सियासी दांवपेच

यूपी में जहां सांसद संजय सिंह जुटे हैं वहीं उत्तराखंड को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने संभाला है। पिछले दिनोंं देहरादून की कई यात्राएं कर आए। कांग्रेस के बजाय सत्तारूढ़ भाजपा पर वार कर रहे हैं।

Raajpatआम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया तथा बिहार की पूर्व सीएम और राजद नेता राबड़ी देवी। (फाइल फोटो)

दिल्ली और पंजाब के बाद अब आम आदमी पार्टी की नजर उत्तराखंड पर टिकी है। कोशिश तो उत्तर प्रदेश में भी पहले से ही करती रही है पार्टी पर सूबा बड़ा है और पार्टी का ढांचा कमजोर। लिहाजा यहां दाल गलना सरल नहीं। वैसे भी भाजपा के खिलाफ इस सूबे में सपा और बसपा जैसे दल पहले से सक्रिय हैं। उत्तराखंड में भी बेशक कांग्रेस उतनी कमजोर नहीं है पर केजरीवाल की पार्टी को यहां संभावना दिख रही है।

यूपी में जहां सांसद संजय सिंह जुटे हैं वहीं उत्तराखंड को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने संभाला है। पिछले दिनोंं देहरादून की कई यात्राएं कर आए। कांग्रेस के बजाय सत्तारूढ़ भाजपा पर वार कर रहे हैं। सूबे की भाजपा सरकार के असरदार मंत्री और प्रवक्ता मदन कौशिक को अपने जाल में ऐसा फंसाया कि बाहर निकलने का रास्ता नहीं सूझा।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर नाकारा होने का आरोप लगाया था तो कौशिक ने चुनौती दे डाली थी कि वे सिसोदिया से बहस को तैयार हैं। सिसोदिया ने चालाकी दिखाई। चुनौती स्वीकार कर देहरादून में बहस का कौशिक को चार जनवरी का न्यौता दे दिया। एक सभागार में मंच पर बैनर भी टंगवा दिया-सिसोदिया बनाम कौशिक। मंच पर दो कुर्सियां रखवाई। एक पर खुद विराजे और दूसरी कौशिक के लिए खाली रखी। मीडिया से कहा कि वे कौशिक के इंतजार में हैं। कौशिक नहीं आए तो आधा घंटा इंतजार कर सिसोदिया जा पहुंचे मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र डोईवाला के एक सरकारी स्कूल में।

स्कूल की बदहाली ने भाजपा सरकार पर हमले का और मौका दे दिया। बेचारे मदन कौशिक को तो जैसे सांप ही सूंघ गया। सिसोदिया ने फरमाया कि भाजपाई दिल्ली आकर वहां के सरकारी स्कूलों को देखें। फिर आरोप जड़ दिया कि भाजपा सरकार सूबे में प्राईवेट स्कूलों को बढ़ावा देने के चक्कर में जानबूझकर कर रही है सरकारी स्कूलों की अनदेखी। एक तरफ कौशिक ने भाजपा की किरकिरी कराई तो दूसरी तरफ पार्टी के सूबेदार बंशीधर भगत ने नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश के बारे में ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी कर डाली कि खुद मुख्यमंत्री को मांगनी पड़ गई माफी। विधानसभा चुनाव में तो अभी एक साल का वक्त है पर मोर्चेबंदी में अभी से जुट गए हैं तमाम दल।

नया प्रयोग
सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष के नाते निष्क्रिय नहीं बैठी हैं। इस साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, उनकी सोनिया गांधी को चिंता है। तभी तो असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव अभियान प्रबंधन व समन्वय के लिए वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं। पहली बार पार्टी ने मुख्यमंत्रियों को भी चुनाव का जिम्मा सौंपा है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल का उपयोग होगा। अहमद पटेल के निधन से पार्टी में खालीपन को महसूस तो किया जा रहा है पर केसी वेणुगोपाल फिलहाल अहम भूमिका में हैं। पश्चिम बंगाल में पार्टी वाम मोर्चे के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी तो तमिलनाडु में उसका गठबंधन पहले से ही द्रमुक के साथ है।

पुडुचेरी में पार्टी इस समय भी सत्ता में है तो केरल में उसे सत्ता पाने की उम्मीद है। राहुल गांधी केरल से ही लोकसभा सदस्य हैं। केरल और तमिलनाडु दोनों ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा का खास जनाधार नहीं। न उसकी जीत की संभावना है। असम में जरूर सत्तारूढ़ भाजपा को असली टक्कर कांगे्रस से ही मिलेगी। असम में भूपेश बघेल, मुकुल वासनिक और शकील अहमद, केरल में अशोक गहलोत और पश्चिम बंगाल में बीके हरिप्रसाद अहम भूमिका में होंगे। तमिलनाडु व पुडुचेरी में वीरप्पा मोइली, एमएम पल्लम राजू और नितिन राउत संभालेंगे। इस बीच महाराष्ट्र में पार्टी नया सूबेदार ला सकती है।

मौजूदा सूबेदार बाला साहेब थोराट सूबे की सरकार में राजस्व मंत्री हैं। दबी जुबान से ही सही एक व्यक्ति-एक पद की मांग सोनिया गांधी तक पहुंची है। विधायक दल के नेता भी थोराट ही हैं। सूबेदार की दौड़ में राजीव सातव, अमित देशमुख, विश्वजीत कदम और यशोमति ठाकुर शामिल बताए जा रहे हैं। सातव राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं और इस समय राज्यसभा के सदस्य हैं। उधर सोनिया गांधी ने बिहार के प्रभारी को बदल दिया है। शक्ति सिंह गोहिल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही खुद को मुक्त करने का आग्रह कर रहे थे।

बिहार में महागठबंधन को सत्ता नहीं मिल पाने के लिए कांगे्रस के खराब प्रदर्शन को ही कारण माना जा रहा है। पार्टी ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन कामयाबी महज 19 सीटों पर ही मिल पाई। सूबे का प्रभार अब भक्त चरणदास को सौंप दिया गया है। जो मिजोरम और मणिपुर के भी पार्टी प्रभारी पहले से हैं।

दलील में दम
तमाम ज्ञानी मानते आए हैं कि अनुभव व्यक्ति को योग्य बनाता है। राबड़ी देवी जब पति के जेल जाने के बाद बिहार की मुख्यमंत्री बनी थी तो हर किसी ने खिल्ली उड़ाई थी उनकी। लेकिन सियासत के दांवपेच सीखने में ज्यादा वक्त नहीं लगा उनको। अब तो आलम यह है कि उनकी हाजिर जवाबी के आगे खुद को तुर्रमखां समझने वालों की भी बोलती बंद हो जाती हैै। बेटे तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री नहीं बन पाने का मलाल तो राबड़ी देवी को होगा ही। ऐसे में कोई उन्हें चिढ़ाए तो भला वे चुप कैसे रह सकती हैं।

पिछले दिनों पटना में बिहार विधानसभा की एक समिति की बैठक में शामिल होने पहुंची तो किसी पत्रकार ने तेजस्वी यादव की शादी के बारे में सवाल पूछ लिया। राबड़ी ने तपाक से पहले तो हैरानी जताई कि उनसे बार-बार यह सवाल पूछा जाता है। जबकि अभी ऐसी कोई तैयारी नहीं है। फिर सवाल पूछने वाले को ही निरुत्तर कर दिया और कहा कि नीतीश जी हैं तेजस्वी की शादी में बाधा। जो तेजस्वी से बड़े हैं, पहले तो उनकी शादी होनी चाहिए। तेजस्वी की अभी उम्र ही क्या है।

नीतीश जी के बेटे की शादी तय हो गई क्या। चिराग पासवान की शादी तय हो गई क्या। नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत और रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी अभी तक अविवाहित हैं। दोनों ही उम्र में तेजस्वी से बड़े हैं। चिराग जहां 38 साल के हैं वहीं निशांत की उम्र 45 साल हो चुकी है। यानि राबड़ी ने अपने 31 साल के बेटे की शादी मेंं देरी का ठीकरा भी नीतीश कुमार के सिर ही फोड़ दिया। जहां तक चर्चित सियासी चेहरों की शादी का सवाल है, अभी तो 50 साल के राहुल गांधी भी कुंवारे ठहरे। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजपाट: खौफ किसानों का
2 राजपाटः अदालती नसीहत
3 राजपाट: गहराता संकट
कृषि कानून विवाद
X