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राजपाट: बिहारी कालीदास

आलाकमान को अंदाज हो गया कि पार्टी के 72 में से कम से कम चार दर्जन विधायक वसुंधरा के इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं। वसुंधरा की शिकायत गैर वाजिब थी भी नहीं। अगर मध्यप्रदेश में शिवराज चौहान और कर्नाटक में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाया तो राजस्थान में लीक से कैसे हट सकती है पार्टी।

लोक जनशक्ति पार्टी नेता एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में केन्द्रीय मंत्री तथा बीजेपी नेता और राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे।

चुनाव की घोषणा तो अभी तक नहीं हुई पर बिहार के सभी राजनीतिक दल पूरे चुनावी मूड में दिख रहे हैं। विपक्ष के मुकाबले सत्तारूढ़ राजग अलबत्ता ज्यादा सक्रिय लगता है। पर घटक दलों की तनातनी देख हर कोई हैरान है। जनता दल (एकी) जहां रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को अपना सहयोगी स्वीकार करने को तैयार नहीं वहीं लोजपा के मुखिया सांसद चिराग पासवान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना का कोई मौका नहीं चूक रहे।

पहला विवाद तो चुनाव कराने को लेकर ही है। चिराग पासवान चाहते हैं कि जब तक कोरोना का संक्रमण पूरी तरह नियंत्रित न हो जाए, सूबे में चुनाव आयोग को चुनाव की तारीखों का एलान नहीं करना चाहिए। जद (एकी) को चुनाव की जल्दी है। भाजपा अपने पत्ते नहीं खोल रही है। पर भाजपा की ओर से साफ किया जा चुका है कि चुनाव में गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। इसके उलट चिराग पासवान खुद भी मुख्यमंत्री पद की हसरत पाले हैं।

इसी चक्कर में वे अपनी पार्टी के लिए ज्यादा सीटें पाने की फिराक में लगे हैं। कह भी चुके हैं कि आलाकमान ने 243 में से लोजपा को 42 सीटें देने का भरोसा दे रखा है। उनके पिता रामविलास पासवान भी कह चुके हैं कि चिराग में मुख्यमंत्री बनने की योग्यता है। लालू और नीतीश को ही नहीं रामविलास तो खुद को भी बीते जमाने का नेता कह चुके हैं। रही नीतीश की बात तो खुद पर होने वाले चिराग पासवान के हमलों पर वे भले चुप्पी साधे हों पर उनके सिपहसालारों ने मोर्चा संभाल रखा है।

मसलन केसी त्यागी कह चुके हैं कि लोजपा का समझौता भाजपा से है। लिहाजा वे अपने लिए सीटें भाजपा से मांगें। प्रधानमंत्री ने बिहार में कोरोना की जांच बढ़ाने पर जोर दिया तो चिराग ने भी समर्थन कर परोक्ष रूप से नीतीश सरकार पर हमला बोला। कानून व्यवस्था खराब होने की बात तो वे लगातार कर ही रहे हैं। इस बार जवाब नीतीश के खासमखास ललन सिंह ने दिया और चिराग को कालीदास बता दिया। यानि जिस डाली पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। आशय अपने ही गठबंधन की सरकार के प्रति विपक्षी दल जैसी भूमिका निभाने से होगा। जाहिर है कि बयानबाजी की तलवारें भांजने से तनाव चरम पर है।

उपेक्षा का दंश
किशोर उपाध्याय दुखी हैं। उत्तराखंड में कांग्रेस के सूबेदार थे। पार्टी एक तो वैसे ही विपक्ष में है, ऊपर से मौजूदा सूबेदार प्रीतम सिंह भाव नहीं दे रहे। लेकिन उपेक्षित उपाध्याय ने तनाव में होते हुए भी दार्शनिक अंदाज में मीडिया से साफ कहा कि चाहे जितना अपमान हो पर वे रहेंगे कांग्रेस में ही। तिरंगे से ऐसा मोह है कि दुनिया से विदाई भी तिरंगे में लिपटकर ही लेना चाहेंगे। प्रीतम सिंह से ज्यादा शिकायत उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से है। वादा तो बकौल किशोर राज्यसभा में उन्हें भेजने का किया था पर भेज दिया अपने चहेते प्रदीप टम्टा को। बेचारे किशोर विधानसभा का चुनाव क्या हारे, पार्टी ने हाशिए पर ही धकेल दिया।

राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो किशोर का बड़ा जलवा था। उत्तराखंड के तमाम कांग्रेसी नेता उनकी जी-हुजूरी करते थे। किशोर ने खुद भी तो चूक कर दी थी। हरीश रावत को अंधेरे में रख हरिद्वार के जयराम आश्रम के संचालक ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी से हाथ मिला लिया था। ऋषिकेश में राहुल गांधी का 2017 में कार्यकर्ता सम्मेलन करा अपना कद ऊंचा उठाने का खेल खेला था। पर हरीश रावत की तरह किशोर और ब्रह्मचारी दोनों ही विधानसभा चुनाव हार गए। इंदिरा हृदेश और प्रीतम ंिसंह तब तो भिन्नाकर रह गए थे। अब उनके दिन फिरे तो किशोर को किनारे लगा दिया।

दमदारी वसुंधरा की
सचिन पायलट की पार्टी में वापसी के बाद गहलोत ने कह दिया कि पायलट और उनके समर्थक विधायक वापस नहीं भी आते तो भी वे विधानसभा में बहुमत साबित कर देते। लेकिन पायलट का बना-बनाया खेल तो महारानी ने बिगाड़ा। वसुंधरा राजे सिंधिया ने एक बार फिर अपने पार्टी आलाकमान को जता दिया कि उनकी अनदेखी फिलहाल तो संभव नहीं। आलाकमान सूबेदार सतीश पूनिया और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को वसुंधरा के विकल्प के रूप में उभार रहा था। वसुंधरा शुरू में तो सारा तमाशा चुपचाप देखती रहीं और जब पानी सिर से उतरता दिखा तो दिल्ली पहुंच शिखर नेतृत्व को अपने तेवर दिखा दिए। उनके समर्थक विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के गुजरात जाकर प्रवास करने के निर्देश को धता बता दिया।

आलाकमान को अंदाज हो गया कि पार्टी के 72 में से कम से कम चार दर्जन विधायक वसुंधरा के इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं। वसुंधरा की शिकायत गैर वाजिब थी भी नहीं। अगर मध्यप्रदेश में शिवराज चौहान और कर्नाटक में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाया तो राजस्थान में लीक से कैसे हट सकती है पार्टी। वहीं पायलट को गहलोत खेमा तो लगातार यही कहेगा कि लौट के बुद्धू घर को आए। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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