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राजपाट : लालू की दुनियादारी

मसखरेपन में लालू के मुकाबले कोई टिक ही नहीं सकता। ऊपर से हाजिर जबावी ऐसी कि किसी भी मौके पर चूकते ही नहीं।

Author नई दिल्ली | August 22, 2016 5:43 AM
RJD प्रमुख लालू यादव (फाइल फोटो)

मसखरेपन में लालू के मुकाबले कोई टिक ही नहीं सकता। ऊपर से हाजिर जबावी ऐसी कि किसी भी मौके पर चूकते ही नहीं। बिहार में आजकल शराबबंदी ही सबसे बड़ा मुद्दा बना है। लालू अपने मजाकिया अंदाज में सलाह दे रहे हैं कि शराबबंदी है तो लोगों को अब ताड़ी पी कर काम चलाना चाहिए। पर लोग तो जहरीली शराब पीने लगते हैं। ऐसी शराब तो जान ले लेती है। जबकि उससे ताड़ी ज्यादा ठीक है। बिहार में जहरीला शराब पीने से पिछले कुछ दिनों में 18 लोगों की जान चली गई। इससे नीतीश सरकार की छीछालेदर तो हुई ही है। लालू अपने छोटे भाई की फजीहत कैसे सहन कर सकते हैं। फिर बिहार सरकार तो उनकी अपनी भी है। छोटे भाई का बचाव तो करना ही पड़ता है। शराबियों को गुस्सा है कि सरकार शराबबंदी न करती तो जहरीली शराब क्यों बिकती और क्यों लोग उसे पीकर बेमौत मरते। नीतीश तो लगातार यही दम भर रहे थे कि शराबबंदी का उनका अभियान कामयाब है। जिसका असर दूसरे सूबों पर भी पड़ रहा है। लेकिन जहरीली शराब से हुई मौतों की घटना ने उनके दावे की कलई खोल दी। शराबियों को तो लालू डांट-डपट नहीं सकते। वे भी अपने ही हैं। गैर तो हैं नहीं। लालू उनका दुख-दर्द भी समझते हैं। तभी तो सलाह दे डाली कि शराब की जगह ताड़ी क्यों नहीं पी लेते। भले पाबंदी तो ताड़ी पर भी है। बेशक जहां ताड़ का पेड़ है, वहीं कोई पियक्कड़ ताड़ी उतार कर अपनी तलब मिटा सकता है। ताड़ के बगीचों से नहीं। नहीं तो वैसी ही आपराधिक धाराएं लगेंगी जैसी शराब के मामले में लगती हैं। कम से कम कानून तो नीतीश का यही कहता है।

दारू पाप दारूबाज नहीं
शराबबंदी के मामले में नीतीश ने दरियादिली दिखाई है। वे पाप से घृणा करो, पापी से नहीं की तर्ज पर शराब के विरोधी हैं, शराबियों के नहीं। होते तो जहरीली शराब पीकर मौत की नींद सो जाने वाले लोगों के परिवारों की आर्थिक मदद का एलान कतई न करते। जिन मामलों में साबित हो जाएगा कि मौत का कारण जहरीली शराब है, हर मृतक के आश्रितों को बिहार सरकार चार लाख रुपए देगी। हालांकि नीतीश की सरकार दावा यही कर रही थी कि मौतें जहरीली शराब के सेवन से नहीं हुई हैं। भले मरने वालों के परिवारजन जहरीली शराब के सेवन को ही मौत की वजह बता रहे थे। देर से ही सही नीतीश ने मान लिया कि वे लोग झूठ नहीं बोल रहे। तो भी वे ऐसी मौतों की जांच भी करा रहे हैं। यह बात दीगर है कि नीतीश जोर देकर कहते रहे हैं कि शराबबंदी कड़ाई से लागू रहेगी। खमियाजा कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े। नीतीश से अगर कोई पूछ ले कि अपने सूबे में चल रहे शराब बनाने के कारखानों को उन्होंने बंद क्यों नहीं किया? तो क्या जवाब देंगे? इन 18 कारखानों में बनी 11 लाख लीटर शराब दूसरे सूबों में सप्लाई हो रही है। शराबबंदी भी लागू करेंगे और जहरीली शराब पीकर मरने वालों के परिवार को चार लाख रुपए का मुआवजा भी देंगे तो विरोधाभास नहीं हुआ? इससे तो दूसरे गरीब परिवारों के मुखिया भी लालच में आ सकते हैं। जहरीली शराब पीकर मर जाओ। गरीबी में जीना भी तो मौत से कम नहीं। पीकर मरेंगे तो कम से कम परिवार का तो कल्याण हो ही जाएगा। नीतीश दूरदृष्टा हैं, देखना है क्या रणनीति रहेगी अब उनकी। लक्ष्य तो बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का कीर्तिमान कायम करना है उनका।

बदले समीकरण
वीपी सिंह बदनौर की अनाम शख्सियत को देखते हुए तो लाटरी ही खुल गई उनकी। बेशक राजस्थान में बड़ा कद रहा है भीलवाड़ा जिले के बदनौर गांव के निवासी इस राजपूत नेता का। पर कई बार संसद में रहने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर कभी ख्याति नहीं मिली। वजह भाजपा संगठन में कोई जिम्मा नहीं संभालना भी मान सकते हैं। पर ज्यादा हैरान तो राजस्थान के लोग भी हुए होंगे। आजकल वसुंधरा राजे से छत्तीस का रिश्ता चल रहा है उनका। तभी तो दूसरी बार राज्यसभा नहीं मिल पाई। एक तरह से हाशिए पर चल रहे थे बेचारे। अब पंजाब जैसे बड़े सूबे का राजभवन बन गया है उनका आशियाना। सपना तो रामदास अग्रवाल देख रहे होंगे। अरसे तक सूबे में भाजपा के लिए कारगर भूमिका निभाई थी उन्होंने। वीपी सिंह का भाग्योदय कराने में भाजपा उपाध्यक्ष और मोदी की तरह ही संघी प्रचारक ओम माथुर की भूमिका अहम मानी जा रही है। यों राजपूत वोट बैंक को सकारात्मक संदेश दे यूपी विधानसभा चुनाव से भी जोड़ा जा रहा है सियासी हलकों में इस नियुक्ति को। औपचारिक घोषणा होते ही वीपी सिंह ने सबसे पहले माथुर के दर पर मत्था टेका। राजस्थान से ही है माथुर का नाता। भाईलोग अब उन्हें वसुंधरा के विकल्प के तौर पर भी देखने लगे हैं। वसुंधरा की माथुर को लगातार हाशिए पर रखने की कोशिश को अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों झटका दे दिया था। राजस्थान से ही राज्यसभा भेज कर हैसियत बढ़ा दी थी माथुर की। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का प्रभारी तो बना ही रखा है अमित शाह ने। लिहाजा राजस्थान की भाजपाई सियासत के समीकरण भी अब बदलने लगे हैं। सक्रियता बढ़ गई है माथुर समर्थकों की। वीपी सिंह के राज्यपाल बन जाने से आलाकमान में अपनी पैठ का प्रमाण दे दिया माथुर ने। अब पार्टी की अपनी कार्यकारिणी बनाते समय वसुंधरा के कठपुतली सूबेदार अशोक परनामी के लिए आसान नहीं होगा माथुर खेमे की अनदेखी करना।

संस्कृति का फूहड़ संस्करण
ममता बनर्जी लगातार दावे करती रहीं हैं कि अपने सूबे, देश और लोगों के लिए वे जान की बाजी लगा सकती हैं। पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया अपनी पार्टी के लोगों को तो देशभक्ति का पाठ पढ़ा नहीं पाईं। अभी तो उनकी पार्टी से जुड़ी ट्रेड यूनियन ने स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति का जश्न कुछ अलग अंदाज में मनाया। एक अश्लील डांस पार्टी का आयोजन करके। जिसकी फुटेज स्थानीय टीवी चैनलों ने चलाई तो खलबली मच गई पार्टी के शिखर नेतृत्व में। लाज बचाने के फेर में आयोजकों की जम कर क्लास लगाई। पार्टी से बाहर कर देने तक की धमकी दी। पर छवि पर जो बट्टा लग सकता था, वह तो लग ही गया। इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके में किया था सांस्कृतिक समारोह का आयोजन। लेकिन हकीकत दूसरी निकली। कम कपड़ों वाली लड़कियां भोजपुरी गीतों पर भौंड़े अंदाज में थिरकीं तो पोल खुल गई। टीवी चैनलों ने धज्जियां उधेड़ीं तो ममता के तेवर तीखे हो गए। आयोजकों को खूब फटकारा। उधर, उनके बिजली मंत्री और ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सरपरस्त शोभनदेव चटर्जी भी आग बबूला हो गए। आयोजन की तो निंदा की ही, भौंड़ेपन का कभी समर्थन नहीं करने का दावा भी करना पड़ा। देखना है कि आयोजकों को पार्टी से बाहर कर देने के दावे पर अमल करते हैं या नहीं।

अब उड़ा हिमाचल
चर्चा तो सारे देश में ड्रग्स के इस्तेमाल को लेकर पंजाब की हो रही है। पर अछूता उससे जुड़ा हिमाचल प्रदेश भी नहीं है इस बीमारी से। चर्चित फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में भी एक जगह जो संवाद आया है उसमें नशे की गोलियां हिमाचल के बरोटीवाला में बनने का उल्लेख है। हालांकि फिल्म के प्रसारण के बाद सूबे के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने दावा किया कि जांच में तो ऐसी बात सामने नहीं आई। हालांकि सूबे के राज्यपाल ने पिछले साल नशे पर चिंता जताई थी। आला अफसरों को तलब कर उनकी क्लास तो ली ही थी, नशे को रोकने का रोडमैप भी तैयार कराया था। भले राज्यपाल की इस कवायद को सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप बताया गया। नशे के खिलाफ तो खास कदम उठे ही नहीं। अब पर्यटन विभाग के चेयरमैन और पूर्व मंत्री विजय सिंह मनकोटिया ने खोल दी है हकीकत। अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर विपक्ष को हमले का मौका भी दे डाला। फरमाया कि पर्यटन बढ़ने के साथ ही पर्यटक स्थलों पर ड्रग माफिया भी सक्रिय हो गया है। जिसे रोकना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने तो यह खुलास भी कर डाला कि अगर पंजाब में 72 फीसद युवा नशे की चपेट में हैं तो हिमाचल में भी पचास फीसद से कम नहीं। मनकोटिया के बयान को आधार बना भाजपा नेता राजीव बिंदल मैदान में कूद पड़े। कहा कि वीरभद्र सरकार ड्रग माफिया को काबू करने में नाकाम रही है। इस गैरकानूनी धंधे पर लीपापोती ही करती नजर आती है सरकार।

सीमित पर हंगामी
विधानसभा का मानसून सत्र हंगामी हो सकता है हिमाचल में। कहने को महज पांच बैठकें ही तय हुई हैं सोमवार से शुरू हो रहे इस सत्र की। पर काम तो पांचों दिन शायद ही हो पाए। पिछले सत्र के बाद दो बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। एक तो आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में वीरभद्र के बीमा एजंट को प्रवर्तन निदेशालय गिरफ्तार कर चुका है। दूसरे वीरभद्र और उनकी पत्नी प्रतिभा से कई केंद्रीय एजंसियों ने पूछताछ की है। उसी आधार पर इस्तीफा मांग रहा है उनसे विपक्ष। तो फिर सदन में हंगामा तो करेगा ही। भले विधानसभा अध्यक्ष ब्रज बिहारी लाल बुटेल ने सर्वदलीय बैठक बुला सदन के सुचारू रूप से चलने की गुहार लगा दी। पर विपक्ष तो सदन के संचालन को सत्तारूढ़ पार्टी का दायित्व बता अपना पल्ला झाड़ रहा है। उसे तो उलटी यही शिकायत है कि सरकार उसे विश्वास में ले ही नहीं रही। यह सत्र कांग्रेस ही नहीं भाजपा के कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल के लिए भी तो कम अहम नहीं। भाजपा के पंद्रह विधायकों ने जिस तरह पिछले दिनों आलाकमान तक लिखित सुझाव भिजवाया कि अगला चुनाव जगत प्रकाश नड्Þडा की अगुआई में लड़ा जाए, उससे भाजपा के अंदरूनी समीकरण प्रभावित हुए हैं। अब धूमल के कट्टर समर्थक माने जाने वाले विधायक भी बिदक रहे हैं। लिहाजा सत्र के दौरान अपने विधायकों को गोलबंद कर सत्तापक्ष पर हमला करना चाहेंगे धूमल। इससे यह संदेश तो दे ही पाएंगे कि विधायक उन्हीं के साथ हैं। दरअसल, धूमल 73 के हो चुके हैं। 75 पार वालों के लिए संन्यास का मोदी का फार्मूला उनके भविष्य को अंधकार में बना दे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। फिर भाजपा आलाकमान अब लीक से हट कर सियासी समीकरण भी तो बना रहा है। मसलन, गुजरात में गैरपटेल, महाराष्ट्र में गैर मराठा और हरियाणा में गैर जाट को बनाया उसने मुख्यमंत्री। झारखंड में भी महज आदिवासी को ही नेतृत्व सौंपने की मजबूरी को इस बार नहीं ढोया उसने। तो क्या हिमाचल में भी राजपूत की जगह किसी ब्राह्मण या दूसरे गैरराजपूत नेता को मिल सकता है मौका। ऐसा हुआ तो नड्डा की तो लाटरी ही लग जाएगी। सो मानसून सत्र में धूमल को दिखाना होगा कि विधायक तो उन्हीं के साथ हैं।

ग्रहों का कोप
लगता है कि ग्रह दशा ठीक नहीं चल रही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की। लंबी कानूनी जंग के बाद सरकार तो जरूर बच गई पर दूसरी मुसीबतों ने पीछा नहीं छोड़ा है। पहले स्टिंग आपरेशन की जांच के बहाने सीबीआइ ने खूब रुलाया। अब फिर अपनों की ही बगावत ने नींद उड़ा दी है। उन्हीं के मंत्री यशपाल आर्य और हरीश रावत को बचाने के फेर में अपनी विधानसभा सदस्यता गंवाने वाले भाजपाई से कांग्रेसी बने भीमलाल आर्य पीछे पड़ गए हैं। विधायक जीतराम भी बागी तेवर दिखा रहे हैं। हरीश रावत ने सूबे की इकलौती राज्यसभा सीट पूर्व दलित सांसद प्रदीप टमटा को दे दी। फिर भी तीनों दलित नेता उनसे रूठे हैं। भीमलाल तो पिछले कई दिन से रावत के खिलाफ उन्हीं के घर के बाहर बेमियादी धरने पर बैठे हैं। रावत पर वादाखिलाफी का आरोप जड़ा है। अपने विधानसभा क्षेत्र घनसाली में विकास के कामकाज ठप होने जाने की शिकायत है। नवप्रभात को मंत्री बनाया तो कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह ने मुंह फुला लिया। भीमलाल आर्य को पीड़ा है कि जब मतलब था तो हरीश रावत उनकी चिरौरी करते रहे। मतलब निकल गया तो निचुड़े हुए नीबू की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया। कांग्रेस की अंदरुनी सिर फुटौव्वल से विरोधी भाजपा की बांछे भी खिल गई हैं। पर्दाफाश रैली के बहाने भाजपाई हरीश रावत पर स्वार्थी और भ्रष्ट होने का आरोप लगा रहे हैं। पर बेचारे भीमलाल आर्य के साथ बुरा हुआ। घर के रहे न घाट के। हरीश रावत के चक्कर में भाजपा विधायक होते हुए भी सदन के भीतर भाजपा के खिलाफ ही मतदान किया। रावत ने वादा किया था कि विधानसभा अध्यक्ष से कह कर दल बदल के तहत सदस्यता नहीं जाने देंगे उनकी। पर अदालती चाबुक के डर से अध्यक्ष ने उनकी सदस्यता खत्म कर दी। इसके बाद तो हरीश रावत ने भी कर लिया उनसे किनारा। भाजपाई मुख्यमंत्री को कितना भी उकसाएं पर वे इस्तीफा देने से रहे। पर्दाफाश रैली में पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंड़ूड़ी तो कुछ ज्यादा ही आवेश में नजर आए। कह दिया कि रावत जैसे भ्रष्टाचार के आरोप अगर उन पर लगे होते तो खुदकुशी कर लेते वे। रावत की तरह कुर्सी पर जमे रहने की बेशर्मी कतई न दिखाते।

बेखौफ बाबू
बेकाबू हो रही है अब हिमाचल में नौकरशाही। खुद ही आरोपों से जूझ रहे मुख्यमंत्री भला उस पर नकेल कस भी कैसे सकते हैं। ऊपर से वरिष्ठता लांघ कर जब से वीसी फारखा को उन्होंने मुख्य सचिव बनाया है, आइएएस अफसरों की एक लाबी नाराज है सरकार से। ऊपर से कैबिनेट की बैठक में मंत्री जीएस बाली ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। एक टेंडर को दोबारा आमंत्रित करने के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे बाली। पर खाद्य विभाग के प्रधान सचिव आरडी धीमान ने प्रस्ताव को वाजिब ठहराने की कोशिश की। नतीजतन आग बबूला हो गए बाली। धीमान भी हार मानने को तैयार नहीं थे। वे मंत्री से बहस करने लगे तो दूसरे मंत्रियों को भी नागवार गुजरा। वे भी आईएएस अफसरों की नाफरमानी से त्रस्त ठहरे। मुख्यमंत्री की ही सुनते हैं बड़े अफसर। मंत्रियों की तो परवाह ही नहीं करते। बात बढ़ी तो मुख्यमंत्री ने धीमान से खाद्य व आपूर्ति विभाग छीन लिया। हालांकि वजह यही बताई कि उन पर बोझ ज्यादा था। दरअसल रिटायर हो चुके कई अफसरों को अब तक उनकी पेंशन और दूसरे सेवा लाभ नहीं मिल पाए हैं। सरकार ने जांचों के बहाने लगा रखा है अड़ंगा। तभी तो जो रिटायर होने वाले हैं वे भी डरे हैं कि कहीं उनकी भी न अटक जाए पेंशन। इस असुरक्षा के माहौल में कोई कर ही नहीं रहा सूबे के विकास की फिक्र।

आत्ममुग्ध गवर्नर
महज एक पखवाड़ा ही बचा है अब राम नरेश यादव के कार्यकाल में। कांग्रेसी राज के वही इकलौते राज्यपाल बचे थे मोदी सरकार में। हालांकि व्यापं घोटाले के वक्त मुसीबत में वे भी कम नहीं फंसे थे। उनके ओएसडी धनराज यादव को तो पकड़ा ही गया था, आरोप उनके बेटे शैलेश पर भी थे ही। तभी तो खुदकुशी कर ली थी उसने लखनऊ के अपने घर में। बहरहाल, भोपाल के राजभवन से अपनी विदाई से पहले अपनी पुस्तक ‘मेरी कहानी’ का उन्होंने विमोचन जरूर करा लिया। वह भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर और भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के हाथों। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल का तो खूब बखान किया है इस किताब में यादव ने। पर मध्यप्रदेश के राज्यपाल के नाते लगे व्यापं के छींटों का जिक्र तक नहीं। हां, आखिरी पन्ने पर यह जरूर लिख दिया कि राज्यपाल बनने के बाद का लेखा-जोखा वे अगली किताब में देंगे। किताब का प्रकाशन भी उनके बेटे अजय नरेश यादव ने ही किया है। आत्म प्रशंसा से बुरी तरह अभिभूत लगते हैं अपनी किताब में यादव। तभी तो दावा कर रहे हैं कि हमेशा नैतिकता और चरित्र की राजनीति की। मध्यप्रदेश के लोगों को तो निराश ही किया उनकी किताब ने। अपनी पांच साल की लाटसाहबी का अनुभव साझा करते तो मजा आता सूबे के लोगों को।

संघी टोटका
संघी अतीत वाले भाजपा नेता कुछ न कुछ नया भले अटपटा क्यों न हो, गढ़ते हैं। अनिल माधव दवे भी ऐसे ही नेता ठहरे। मध्यप्रदेश के दवे मोदी सरकार में पिछले दिनों ही न केवल मंत्री बने बल्कि पर्यावरण जैसा संवेदनशील विभाग भी पा गए। उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर शब्द पर एतराज है। उनके हिसाब से तो इस इलाके को पीओके की जगह पीओआई बोलना चाहिए। भाजपा की तिरंगा यात्रा के सिलसिले में भोपाल आए थे दवे। संगठन कौशल के नाते पहचान बना रखी है उन्होंने। भोपाल के विश्व हिंदी सम्मेलन और उज्जैन के सिंहस्थ में हुए अंतरराष्ट्रीय वैचारिक महाकुंभ के पीछे भी उन्हीं का दिमाग था। पत्रकारों से बातचीत में यूं तो ज्यादा जानकारी अपने विभाग के बारे में ही देते रहे पर बात कश्मीर की छिड़ी तो पाक अधिकृत कश्मीर की जगह पाक अधिकृत इंडिया शब्द सुझा दिया उन्होंने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के कायल हैं दवे। बकौल दवे मोदी न खुद सोते हैं और न अपने सहयोगियों को सोने देते हैं। आधी रात के वक्त भी फोन करने से नहीं हिचकते वे।

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