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राजपाट: राम भरोसे

पंचायत चुनाव के नतीजों से कांग्रेस को झटका लगा है। भाजपा को यह कहने का मौका मिल गया है कि ग्रामीण भारत यानी किसान-मजदूर पार्टी के साथ हैं। गहलोत फिर आशंकित हैं कि भाजपा उनकी सरकार गिराने में जुटी है। दिल्ली में सोनिया गांधी की सेहत ठीक नहीं और राहुल गांधी ने नेतृत्व से किनारा कर रखा है।

राजपाट:कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा।

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी यकीकन भगवान भरोसे ही है। अहमद पटेल के निधन ने कांग्रेस में पहले से चल रहे नेतृत्व के संकट को और विकट बना दिया है। जैसे आलाकमान का कोई वजूद है ही नहीं। पार्टी में निराशा और भगदड़ की मुख्य वजह भी यही है कि दिल्ली में नेताओं के शिकवे शिकायत सुनने वाला कोई है ही नहीं। मध्यप्रदेश की बगावत से भी पार्टी ने सबक नहीं सीखा। कमलनाथ अगर जोड़तोड़ की सरकार चला रहे थे तो पार्टी में असंतोष रोकना उन्हीं का जिम्मा था। उन्होंने और दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को इतना बेबस बना दिया कि अपनी पार्टी ही उन्हें पराई लगने लगी। नतीजतन सरकार तो गई ही, कमलनाथ और दिग्विजय की भी कोई हैसियत नहीं बची। अशोक गहलोत ने उस वक्त तो अपनी सरकार बचा ली पर वे भूल रहे हैं कि सचिन पायलट को और अपमानित कर वे अपना ही नुकसान कर रहे हैं।

पंचायत चुनाव के नतीजों से कांग्रेस को झटका लगा है। भाजपा को यह कहने का मौका मिल गया है कि ग्रामीण भारत यानी किसान-मजदूर पार्टी के साथ हैं। गहलोत फिर आशंकित हैं कि भाजपा उनकी सरकार गिराने में जुटी है। दिल्ली में सोनिया गांधी की सेहत ठीक नहीं और राहुल गांधी ने नेतृत्व से किनारा कर रखा है। ऐसे में अगर भाजपा इस बार सचिन पायलट समर्थक विधायकों से इस्तीफे दिलाने में सफल हो गई तो गहलोत का भी कमलनाथ सरीखा हश्र तय है।

गुजरात में पार्टी के कुछ विधायक इस्तीफे न देते तो राज्य सभा की दूसरी सीट मिल जाती। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी पार्टी की हालत कमजोर हुई है। ले देकर पंजाब की सरकार है। जो स्थिरता से चल रही है। पश्चिम बंगाल में अब चुनाव में ज्यादा वक्त नहीं है। पर कांग्रेस की तैयारी सिफर है। वह यही तय नहीं कर पा रही है कि अकेले लड़ेगी या गठबंधन करेगी। करेगी तो किससे? पार्टी को नेतृत्व संकट हल किए बिना न गतिशील बनाया जा सकता है और न धारदार।

असंतोष की चिनगारी
तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने में जुटी भाजपा को अपने घर की भी फिक्र करनी चाहिए। मसलन कर्नाटक और त्रिपुरा में पार्टी के भीतर सब कुछ सहज नहीं है। गुटबाजी और असंतोष बढ़ रहा है। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा पार्टी के गले की फांस बन गए हैं। उगलते बनता है न निगलते। अधिकतम उम्र सीमा पार कर जाने के बावजूद मजबूरी में उन्हें मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। अब पार्टी उन्हें अपने हिसाब से चलाना चाहती है तो वे परवाह नहीं कर रहे। वे वंशवाद की राजनीति पर आमादा हैं। एक बेटा सांसद है तो दूसरा पार्टी में पदाधिकारी। एक तरह से सरकार वही चला रहा है।

आलाकमान चाहता है कि येदियुरप्पा परिवार मोह से बाहर निकलें। पर अपनी जात के बल पर येदियुरप्पा किसी को भाव नहीं दे रहे। उल्टे विपक्षी देवगौड़ा की जद (एस) उनका गुणगान कर रही है। जेपी नड्डा ने अब तेज तर्रार महासचिव अरुण सिंह को कर्नाटक का प्रभारी बना दिया है। वे रविवार को बंगलूरू पहुंचे तो पार्टी दफ्तर में विधायकों ने उनसे मुख्यमंत्री की जमकर शिकायतें की। उनके बेटे विजयेंद्र के भ्रष्टाचार के किस्से बताए। अरुण सिंह ने पार्टी के सूबेदार नलिन कुमार कटील से कहा कि वे विधायकों की बैठक बुलाकर उनकी शिकायतों का समाधान कराएं।

वहीं त्रिपुरा में भी कांग्रेस से आए सुदीप राय बर्मन ने मुख्यमंत्री बिप्लव देव के खिलाफ मुहिम चला रखी है। बर्मन अपने साथ बीस विधायक होने का दावा कर रहे हैं। दुखी बिप्लव देव ने जनसमर्थन दिखाने के लिए तेरह दिसंबर को एक रैली करने की धमकी दे डाली। नड्डा ने प्रभारी विनोद सोनकर को अगरतला दौड़ाया। उनकी मौजूदगी में ही बिप्लव हटाओ, भाजपा बचाओ के नारे कार्यकर्ताओं ने लगाए। सोनकर ने एक तरफ देव को दिलासा दिया कि फिलहाल उन्हें हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। तो दूसरी तरफ असंतुष्ट खेमे को आश्वासन दिया कि उनकी शिकायतें दूर की जाएंगी। देव को भी निजी ताकत नहीं दिखाने की हिदायत दी सोनकर ने।

मेहनती नड्डा
यूपी और उत्तराखंड के चुनाव में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त है। पर अपने संगठन कौशल के बूते भाजपा अभी से तैयारी में जुटी है। खुद अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का उत्तराखंड जैसे छोटे सूबे में लगातार चार दिन गुजारना उनकी गंभीरता का प्रमाण है। विधानसभा चुनाव की तैयारी से लेकर पार्टी के विधायकों, सांसदों व कार्यकर्ताओं के अलावा तमाम साधू-संतों से सत्संग का वक्त निकाला भाजपा अध्यक्ष ने। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों से मुलाकात कर सरकार के रंग ढंग को भी जांचा परखा। अपनी मिलनसारिता, मृदुभाषी मिजाज और बिंदास अंदाज से वे हरिद्वार के साधू संतों पर अच्छी छाप छोड़ गए।

हरिद्वार में चार दिसंबर को गंगा पूजन कर अपने 120 दिन का देशव्यापी अभियान शुरू किया। हैरान तो उन्होंने कनखल के जगद गुरू आश्रम में अचानक पहुंचकर वहां के पीठाधीश्वर शंकराचार्य राज राजेश्वराश्रम महाराज को कर दिया। जो संघी अतीत वाले तो हैं ही, संघ के मुखिया मोहन भागवत और सह महासचिव कृष्ण गोपाल के चितेरे हैं। काली पीठ में पूजन करना नहीं भूले क्योंकि हरिद्वार से कोलकाता जो पहुंचना था। जहां काली ही बंगालियों की सबसे बड़ी इष्टदेवी ठहरी। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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