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राजपाट: नेता और सत्ता

चिराग ने अपनी पार्टी की बैठक में 143 सीटों पर लोजपा उम्मीदवार उतारने के संकेत दिए थे। जद (एकी) ने इसे गीदड़ भभकी से ज्यादा भाव नहीं दिया। नीतीश कह चुके हैं कि लोजपा का गठबंधन भाजपा से है। बिहार में 2015 का चुनाव लालू, नीतीश और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाकर लड़ा था।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और हरियाणआ के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला।

हाथी के दांत
बिहार में नेता रंग बदलने के मामले में गिरगिट को भी मात दे रहे हैं। कल तक नीतीश कुमार की हिमायत में लोजपा को धमकी दे रहे हिंदुस्तानी अवाम पार्टी के नेता जीतन राम माझी ने बुधवार को अचानक पलटी मारी। फरमाया कि बिहार में रामविलास पासवान दलितों के सबसे बड़े नेता हैं। चिराग को घर का बच्चा बताते हुए माझी ने पासवान के साथ पारिवारिक संबंध होने की दुहाई भी दी। लोजपा अगर बिहार में भाजपा के मोहरे की तरह बर्ताव कर रही थी तो माझी की पार्टी जद (एकी) की हिमायत में थी। पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के पटना आकर नीतीश कुमार के साथ मंत्रणा के बाद राजग में असंतोष के सुर कुछ मद्धिम पड़ गए। नड्डा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि राजग में सीटों के बंटवारे को लेकर कोई दरार नहीं है। चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। चिराग पासवान भी मान जाएंगे।

चिराग ने अपनी पार्टी की बैठक में 143 सीटों पर लोजपा उम्मीदवार उतारने के संकेत दिए थे। जद (एकी) ने इसे गीदड़ भभकी से ज्यादा भाव नहीं दिया। नीतीश कह चुके हैं कि लोजपा का गठबंधन भाजपा से है। बिहार में 2015 का चुनाव लालू, नीतीश और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाकर लड़ा था। पासवान, उपेंद्र कुशवाह और जीतन राम माझी भाजपा के साथ थे। राजद को सबसे ज्यादा 81 और जद (एकी) को उसके बाद 71 सीटों पर सफलता मिली थी। भाजपा 53 पर सिमटी थी। पासवान और कुशवाह को दो-दो व माझी को एक सीट से ही सब्र करना पड़ा था।

लोकसभा में लोजपा को छह सीटें मिली थीं। पार्टी के नेता सूरजभान सिंह ने शायद इसी फार्मूले के हिसाब से 36 से कम सीटें नहीं लेने की बात कही है। हालांकि नड्डा की तरफ से चिराग को अभी तक 23 सीटें देने की बात सामने आई है। चिराग चाहते हैं कि भाजपा नीतीश से ज्यादा सीटें रखे। लोकसभा में भी उसने एक सीट ज्यादा जीती थी। सुशील मोदी को छोड़ बिहार के ज्यादातर भाजपा नेता भी पार्टी के जद (एकी) से ज्यादा सीटों पर लड़ने की मांग कर रहे हैं। उनकी दलील है कि गठबंधन को वोट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर पड़ेंगे। नीतीश की लोकप्रियता तो घटी है। फिर भी संकेत लोजपा को साथ रखने के मोह के चलते भाजपा को अंतत: जद (एकी) के अग्रज के बजाए अनुज बन कम सीटों पर सब्र करने के ही मिल रहे हैं।

संप्रभु है सत्ता
सत्ता में बड़ी ताकत होती है। विरोधियों को अपने पाले में करने के लिए लोभ लालच का हथियार पलक झपकते असंभव को भी संभव बना देता है। यह सियासी चतुराई दिखाने में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी बाजी मार ली। पार्टी में अपने विरोधियों को लामबंद होते देख रावत चौकस हो गए। जेपी नड्डा से शिकायत करने पहुंचे बिशन सिंह चौपाल का साथ दे रहे विधायकों को अपने कौशल से पटा लिया। आदेश चौहान, संजय गुप्ता, स्वामी यतीश्वरानंद व सुरेश राठौर आदि विधायक देहरादून लौटते ही बदल गए।

रावत के करीबियों का कहना है कि असंतोष को बेवजह हवा देने के पीछे केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और सांसद अजय भट्ट सूत्रधार हैं। अजय भट्ट ने चार धाम बोर्ड को लेकर भी मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

कभी त्रिवेंद्र सिंह रावत के खास थे भट्ट। पार्टी के सूबेदार थे तो मुख्यमंत्री ने देहरादून में उन्हें कैबिनेट मंत्री वाला बंगला आबंटित किया था। लेकिन निशंक खेमे के बंशीधर भगत उनकी जगह सूबेदार बने तो त्रिवेंद्र सिंह रावत का रुझान बदल गया। भट्ट को आबंटित बंगला उन्होंने भगत को देने में देर नहीं लगाई। नतीजतन भट्ट बेदखल हो गए। सांसद होकर भी उन्हें बंगला खाली करना पड़ा। उधर रावत ने भगत को उपकृत कर उनसे रिश्ते मधुर बना लिए। अब निशंक, भट्ट और चुफाल का खेमा अपने विधायकों के पाला बदलने से मिले जख्म सहला रहा है। जबकि त्रिवेंद्र सिंह रावत अपनी कुर्सी को लेकर और बेफिक्र हो गए हैं।

संकट में दुष्यंत
हरियाणा के लोग लाग लपेट में भरोसा नहीं रखते। साफगोई से बोलते हैं। जैसे जन नायक जनता पार्टी के विधायक देवेंद्र सिंह बबली ने अपनी व्यथा-कथा पत्रकारों से कह डाली। फरमाया कि दुष्यंत चौटाला अगर हरियाणा की सरकार में उप मुख्यमंत्री हैं तो बाकी नौ विधायकों की बदौलत। हरियाणा में भाजपा और जजपा की साझा सरकार है। जजपा के दस विधायक विजयी हुए थे। बबली टोहाना से जीते थे। मंगलवार को बबली, नारनौंद के रामकुमार गौतम और नरवाना के रामनिवास तीनों जजपा विधायकों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात की थी।

उसके बाद ही बबली ने दुष्यंत चौटाला पर हमला बोला। कहा कि जब भाजपा का समर्थन करने का प्रस्ताव पारित कराया था तो दुष्यंत ने चार मंत्री पद और कुछ दूसरे लालबत्ती वाले पद मिलने की बात कही थी। लेकिन खुद उप मुख्यमंत्री बन उन्होंने पार्टी विधायकों की अनदेखी करा दी। कैप्टन अभिमन्यु को पटखनी देने वाले रामकुमार गौतम तो मंत्री पद न मिलने से पहले से ही बागी हैं। जाहिर है कि दुष्यंत दोधारी तलवार पर चल रहे हैं।

एक तरफ किसानों के बारे में मोदी सरकार के अध्यादेश का हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा किया जा रहा विरोध उन्हें गठबंधन से निकलने को उकसा रहा है। तो दूसरी तरफ उनकी पार्टी के विधायक भाजपा की शह पर कभी भी बगावत कर पार्टी तोड़ सकते हैं, इसका खतरा सिर पर मंडरा रहा है। जो भी हो बबली ने पद की चाह की अपनी लालसा छिपाई नहीं। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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