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राजपाट: सियासी चर्चा और लोकतंत्र

सैयद शाहनवाज हुसेन का सियासी वनवास भी खत्म हो गया। पिछले सात साल से बेचारे पैदल थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। अब केंद्र से बिहार की सियासत में वापसी के लिए मजबूर हुए हैं।

political discussionबिहार के सीएम नीतीश कुमार और उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत।

उस्तादी नीकु की
आखिर नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया। सरकार गठन को हालांकि करीब दो महीने हो चुके हैं। इस बार के विस्तार में नीतीश भाजपा पर हिस्सेदारी के मामले में इक्कीस साबित होते दिखे हैं। कुल सत्रह नए मंत्रियों को शामिल करने के बाद अब मुख्यमंत्री सहित मंत्री परिषद का आंकड़ा 31 हो गया है। सत्रह में नौ भाजपा के हैं तो सात जद (एकी) के। एक निर्दलीय को भी जद (एकी) के कोटे में ही माना जाएगा। इस विस्तार ने भाजपा के भीतर असंतोष को बढ़ाया है। पार्टी विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू तो आपा ही खो बैठे। मंत्रिपद की आस लगाई थी। पर निराशा हाथ लगी। तभी तो फरमाया कि उनसे कम अनुभव वालों को मंत्रिपद दे दिया गया। अगड़ों की अनदेखी हुई है। वैश्य और यादव वर्ग को तरजीह मिली है। ज्ञानू ने पार्टी के दर्जन भर नाराज विधायकों के अपने संपर्क में होने का दावा भी कर दिया।

सैयद शाहनवाज हुसेन का सियासी वनवास भी खत्म हो गया। पिछले सात साल से बेचारे पैदल थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। अब केंद्र से बिहार की सियासत में वापसी के लिए मजबूर हुए हैं। पार्टी ने पहले तो उन्हें सुशील मोदी के इस्तीफे से खाली हुई सीट के उपचुनाव में उम्मीदवार बनाकर विधान परिषद भेजा और अब मंत्रिपद सौंपकर मुसलिम विरोधी पार्टी होने की धारणा को तोड़ने की कोशिश की। यह बात अलग है कि शाहनवाज हुसेन को उद्योग मंत्रालय दिया गया है। उद्योगों की बिहार में क्या स्थिति है, किसी से छिपा नहीं है। पर मंत्री तो बन ही गए।

इस विस्तार के साथ ही नीतीश ने भाजपा को यह जताने की कोशिश की है कि विधायक भले उनकी पार्टी के कम जीतकर आए हों पर बिहार में गठबंधन के असली बास तो वही हैं। गृह, कार्मिक, शिक्षा, ग्रामीण विकास और जल संसाधन जैसे ज्यादातर अहम मंत्रालय नीतीश ने जद (एकी) के अधीन ही रखे हैं। भाजपा के सोलह मंत्रियों के पास कुल विभाग 22 हैं तो जद (एकी) के 13 मंत्रियों के पास इक्कीस। जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी की पार्टी को भी मंत्रिपद मिले हैं। भाजपा की रेणु देवी बेशक उपमुख्यमंत्री हैं पर विभाग तो उन्हें आपदा प्रबंधन का मिला है। जद (एकी) को 43 और भाजपा को 74 सीटें मिली थीं। एक तरफ बिहार में अपना कद छोटा नहीं होने का संदेश दिया है तो दूसरी तरफ केंद्र में भी राजग की बैठक में लोजपा के चिराग पासवान को बुलाने पर एतराज जताकर नीतीश ने उन्हें हल्के में लेने की भाजपा की कोशिश को नाकाम बनाया है।

चर्चा में चेनम्मा
लंबे दौर तक जयललिता की सबसे निकट सहयोगी रही शशिकला आय से ज्यादा संपत्ति जुटाने के आरोप में चार साल कैद की सजा काटने के बाद बंगलूर की जेल से रिहा हुई तो कोरोना की चपेट में आ गई। आखिर बंगलूर से जानबूझकर चेन्नई तक का लंबा सफर उन्होंने सड़क मार्ग से तय किया। तेईस घंटे के सफर के बाद मंगलवार को चेन्नई पहुंची। रास्ते में जिस अंदाज में उनका स्वागत हुआ उससे सियासत में फिर कदम बढ़ाने का उनका अरमान हिलोरे जरूर ले रहा होगा।

जयललिता के जीवित रहते जो पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी उनकी आरती उतारते थे, उन्होंने तय किया कि चिनम्मा यानी शशिकला अम्मा से जुड़े किसी भी स्थल तक न जा पाएं। पलानीस्वामी ही समझौते के तहत सूबे की अन्ना द्रमुक सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। पनीरसेल्वम ने चिनम्मा को रोकने के लिए पलानीस्वामी से हाथ मिला लिया था। केंद्र सरकार के वरदहस्त के चलते जयललिता की मौत के बाद तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक की सरकार तमाम अंतरविरोधों के बाद भी पांच साल पूरे कर जाएगी। यह बात अलग है कि अम्मा की विरासत को लेकर अब चिनम्मा और पलानीस्वामी व पनीरसेल्वम की जोड़ी के बीच जंग जरूर छिडेग़ी। इस जोड़ी ने चिनम्मा को पार्टी से निकाल दिया था।

दूसरा पहलू
सोशल मीडिया ने प्रभावी तौर पर तो देश में सकारात्मक भूमिका पहली बार निभाई। उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर फटने के कारण हुई तबाही ज्यादा नुकसान नहीं कर पाई। खासकर लोगों की जान के मामले में। बिजली परियोजनाओं में काम कर रहे लोग तो जरूर हताहत हुए पर आम लोग सोशल मीडिया पर हादसे की सूचना वक्त रहते प्रसारित हो जाने से संभल गए। सरकारी एजंसियां भी समय पर सूचना मिल जाने के कारण बेहतर भूमिका अदा कर पाई।

उसी का नतीजा रहा कि मलबे में दबे और सुरंग में फंसे कुछ लोगों को तो बचाया जा सका। अन्यथा 2013 की उत्तराखंड की आपदा ने तो समूचे तंत्र को ही पंगु बना दिया था। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भाग्यशाली रहे। हादसे से उनकी छवि पर बहुगुणा की तरह बट्टा नहीं लगा। सरकार और उसकी एजंसियां सभी मुस्तैद थे तो आपदा के कारण न ज्यादा नुकसान हुआ और न ही अफरातफरी या अनिश्चितता का माहौल बना। रावत के हादसे वाली जगह पर पहुंचने का भी अच्छा संदेश गया। मुख्य भूमिका बेशक आइटीबीपी और आपदा मोचन बल के जांबाज जवानों की ही थी। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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